युगों का दौर (भारत की खोज) कक्षा-8वीं

सांची स्तूप
प्रस्तुति- गुलाब चंद जैसल
200 के नोट पर सांची स्तूप

पाठ – 4 युगों का दौर 
गुप्त शासन में राष्ट्रीयता और साम्राज्यवाद

मौर्य साम्राज्य का अवसान हुआ और उसकी जगह शुंग वंश ने ले ली जिसका शासन अपेक्षाकृत बहुत छोटे क्षेत्र पर था। दक्षिण में बड़े राज्य उभर रहे थे और उत्तर में काबुल से पंजाब तक बाख्त्री या भारतीय-यूनानी फैल गए थे। मेनांडर के नेतृत्व में उन्होंने पाटलीपुत्र तक पर हमला किया किंतु उनकी हार हुई। खुद मेनांडर पर भारतीय चेतना और वातावरण का प्रभाव पड़ा और वह बौद्ध हो गया। वह राजा मिलिंद के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बौद्ध आख्यानों में उसकी लोक-प्रसिद्धि लगभग एक सेत के रूप में हुई। भारतीय और यूनानी सेस्कृतियों के मेल से अफ़गानिस्तान और सरहदी सूबे के क्षेत्र में गांधार की यूनानी बौद्ध कला का जन्म हुआ।

भारत के मध्य प्रदेश में सांची के निकट बेसनगर में ग्रेनाइट पत्थर की एक लाट है जो हेलिओदो स्तंभ के नाम से प्रसिद्ध है। इसका समय ई.पू. पहली शताब्दी है और इस पर संस्कृत का एक लेख खुदा है। इससे हमें उन यूनानियों के भारतीयकरण की झलक मिलती है जो सरहद पर आए थे और भारतीय संस्कृति को जज़्ब कर रहे थे।

मेनांडर का सिक्का

मध्य-एशिया में शक (सीदियन) लोग ऑक्सस (अक्षु) नदी की घाटी में बस गए थे। यूइ ची सुदूर पूरब से आए और उन्होंने इन लोगों को उत्तर-भारत की धकेल दिया। ये शक बौद्ध और हिंदू हो गए। यूइ-चियों में से एक दल कुषाणों का था। उन्होंने सब पर अधिकार करके उत्तर-भारत तक अपना विस्तार कर लिया। उन्होंने शकों को पराजित करके उन्हें दक्षिण की ओर की ओर खदेड़ा। शक काठियावाड़ और दक्खिन की ओर चले गए। इसके बाद कुषाणों ने पूरे उत्तर भारत पर और गध्य एशिया के बहुत बड़ें भाग पर अपना व्यापक और मज़बूत साम्राज्य कायम किया। उनमें से कुछ ने हिंदू धर्म को अपना लिया लेकिन अधिकांश लोग बौद्ध हो गए। उनका सबसे प्रसिद्ध शासक कनिष्क उन बौद्ध कथाओं का भी नायक है, जिनमें उसके महान कारनामों और सार्वजनिक कामों का ज़िक्र किया गया है। तक्षशिला का पुराना विश्वविद्यालय भी उसके निकट था। वह बहुत से राष्ट्रों से आने वाले लोगों के मिलने का स्थान बन गया। इतिहास की दृष्टि से, इसी ज़माने में चीन और भारत के बीच पहले संपर्क हुए और 64 ई. में यहाँ चीनी राजदूत आए। उस समय चीन से भारत को जो तोहफ़े मिले उनमें आडू और नाशपाती के पेड़ थे। गोबी रेगिस्तान के ठीक किनारे-किनारे तूफ़ान और कूचा में भारतीय, चीनी  और ईरानी संस्कृतियों का अद्भुत मेल हुआ।

कुषाण काल में बौद्ध धर्म दो संप्रदायों में बँट गया-महायान और हीनयान। उन दोनों के बीच मतभेद उठ खड़े हुए। इन विवादों में एक नाम सबसे अलग और विशिष्ट दिखाई पड़ता है। यह नाम नागार्जुन का है जो ईसा की पहली शताब्दी में हुए। उनका व्यक्तित्व महान था। वे बौद्ध शास्त्रों और भारतीय दर्शन दोनों के बहुत बड़े विद्वान थे। उन्हीं के कारण भारत में महायान की विजय हुई। महायान के ही सिद्धांतों का प्रचार चीन में हुआ। लंका और बर्मा (वर्तमान श्रीलंका और म्यांमार) हीनयान को मानते रहे। बाद में जब भारत में नयी जातियों का आगमन हुआ, तो ईसा की चौथी शताब्दी के आरंभ में विदेशियों का विरोध महान शासक ने, जिसका नाम भी चंद्रगुप्त था|

इस तरह ई. 320 में गुप्त साम्राज्य का युग आरंभ हुआ। इस साम्राज्य में एक के बाद एक कई महान शासक हुए, जो युद्ध और शांति, दोनों कलाओं में सफल हुए।

जिस बौद्ध धर्म का जन्म भारतीय विचार से हुआ था, उसके लिए भारत वह पुण्य भूमि थी जहाँ बुद्ध ने जन्म लिया, उपदेश दिया और वहीं उनका निर्वाण हुआ। पर बौद्ध धर्म मूल रूप में अंतरराष्ट्रीय था, विश्वधर्म था। जैसे-जैसे उनका विकास और विस्तार हुआ वैसे-वैसे उसका यह रूप और विकसित होता गया। इसलिए पुराने ब्राह्मण धर्म के लिए स्वाभाविक था कि वह बार-बार राष्ट्रीय पुनर्जागरण का प्रतीक बने।

हर्षवर्धन

यह धर्म और दर्शन भारत के भीतरी धर्मों और जातीय तत्वों के प्रति तो सहनशील और उदार था पर विदेशियों के प्रति उसकी उग्रता बराबर बढ़ती जाती थी और वह अपने आपको उनके प्रभाव से बचाने की कोशिश करता था। गुप्त शासकों का समय बहुत प्रबुद्ध, शक्तिशाली, अत्यंत सुसंस्कृत और तेजस्विता से भरपूर था। फिर भी उसमें साम्राज्यवादी प्रवृत्तियाँ विकसित हो गई। इनके बहुत बड़े शासक समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा गया है।

चौथी शताब्दी के आरंभ से लेकर डेढ़ सौ वर्ष तक गुप्त वंश ने उत्तर में एक बड़े शक्तिशाली और समृद्ध राज्य पर शासन किया। इसके बाद लगभग डेढ़ सौ वर्ष तक उनके उत्तराधिकारी अपने बचाव में लगे रहे और साम्राज्य सिकुड़कर लगातार छोटा होता चला गया। फिर हूणों का शासन हुआ| उत्तर भारत में हूणों का शासन बहुत थोड़े समय रहा-लगभग आधी-शताब्दी। उनमें से बहुत से लोग देश में छोटे-छोटे सरदारों के रूप में यहीं रह गए। वे कभी-कभी परेशानी पैदा करते थे और भारतीय जन समुदाय के सागर में जज़्ब होते जाते थे। इनमें से कुछ सरदार सातवीं शताब्दी के आरंभ में आक्रमणकारी हो गए।

उनका दमन करके कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने उत्तर से लेकर मध्य भारत तक एक बहुत शक्तिशाली राज्य की स्थापना की। वे कट्टर बौद्ध थे। उनका महायान संप्रदाय  अनेक रूपों में हिंदूवाद से मिलता-जुलता था। उन्होंने बौद्ध और हिंदू दोनों धर्मों को बढ़ावा दिया। उन्हीं के समय में प्रसिद्ध चीनी यात्री हुआन त्सांग (या युआन चान) भारत आया था (629 ई. में)। हर्षवर्धन कवि और नाटककार था। उसने अपने दरबार में बहुत से कलाकारों और कवियों को इकट्ठा किया और अपनी राजधानी उज्जयिनी को सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रसिद्ध केंद्र बनाया था। हर्ष की मृत्यु 648 ई. में हुई थी।

दक्षिण भारत

दक्षिण भारत में मौर्य साम्राज्य के सिमटकर अंत हो जाने के एक हज़ार साल से भी ज़्यादा समय तक बड़े-बड़े राज्य फूले-फले।

दक्षिण भारत अपनी बारीक दस्तकारी और समुद्री व्यापार के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था। उसकी गिनती समुद्री ताकतों में होती थी और इनके जहाज़ दूर देशों तक माल पहुँचाया करते थे। वहाँ यूनानियों की बस्तियाँ थीं और रोमन सिक्के भी वहाँ पाए गए।

उत्तरी भारत पर बार-बार होने वाले हमलों का सीधा प्रभाव दक्षिण पर नहीं पड़ा। इसका परोक्ष प्रभाव यह ज़रूर हुआ कि बहुत से लोग उत्तर से दक्षिण में जाकर बस गए। इन लोगों में राजगीर, शिल्पी और कारीगर भी शामिल थे। इस प्रकार दक्षिण पुरानी कलात्मक परंपरा का केंद्र बन गया और उत्तर उन नयी धाराओं से अधिक प्रभावित हुआ, जो आक्रमणकारी अपने साथ लाते थे।

शांतिपूर्ण विकास और युद्ध के तरीके

बार-बार हमलों और एक के बाद दूसरे साम्राज्य की स्थापना का जो संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत किया गया, उसके बीच देश में शांतिपूर्ण और व्यवस्थित शासन के लंबे दौर रहे हैं।

मौर्य, कुषाण, गुप्त और दक्षिण में आंध्र, चालुक्य, राष्ट्रकूट के अलावा और भी राज्य ऐसे हैं जो दो-दो, तीन-तीन सौ वर्षों तक कायम रहे। इनमें लगभग सभी राजवंश देशी थे। कुषाणों जैसे लोगों ने भी जो उत्तरी सीमा पार से आए थे, जल्दी अपने आपको इस देश और इसकी सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप ढाल लिया।

जब कभी दो राज्यों के बीच युद्ध या कोई आंतरिक राजनीतिक आंदोलन होता था, तो आम जनता की जीवनचर्या में बहुत कम हस्तक्षेप किया जाता था।

इस इतिहास के व्यापक सर्वेक्षण से इस बात का सेकेत मिलता हैं कि यहाँ शांतिपूर्ण और व्यवस्थित जीवन के लंबे दौर यूरोप की तुलना में कहीं अधिक हैं। यह धारणा भ्रामक है कि अंग्रेज़ी राज ने पहली बार भारत में शांति और व्यवस्था कायम की। अलबत्ता यह सही हैं कि जब भारत में अंग्रेज़ी शासन कायम हुआ, उस समय देश अवनति की पराकाष्ठा पर था। राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था टूट चुकी थी। वास्तव में यही कारण था कि वह राज यहाँ कायम हो सका।

प्रगति बनाम सुरक्षा

भारत में जिस सभ्यता का निर्माण किया गया उसका मूल आधार स्थिरता और सुरक्षा की भावना थी। इस दृष्टि से वह उन तमाम सभ्यताओं से कहीं अधिक सफल रही जिनका उदय पश्चिम में हुआ था। वर्ण-व्यवस्था और सेयुक्त परिवारों पर आधारित सामाजिक ढाँचे ने इस उद्देश्य को पूरा करने में सहायता की। यह व्यवस्था अच्छे-बुरे के भेद को मिटाकर सबको एक स्तर पर ले आती है और इस तरह व्यक्तिवाद की भूमिका इसमें बहुत कम रह जाती है। यह दिलचस्प बात है कि जहाँ भारतीय दर्शन अत्यधिक व्यक्तिवादी है और उसकी लगभग सारी चिंता व्यक्ति के विकास को लेकर है वहाँ भारत का सामाजिक ढाँचा सामुदायिक था और उसमें सामाजिक और सामुदायिक रीति-रिवाज़ों का कड़ाई से पालन करना पड़ता था।

इस सारी पाबंदी के बावजूद पुरे समुदाय को लेकर बहुत लचीलापन भी था। ऐसा कोई कानून या सामाजिक नियम नहीं था, जिसे रीति-रिवाज़ से बदला न जा सके। यह भी सेभव था कि नए समुदाय अपने अलग-अलग रीति-रवाज़ों, विश्वासों और जीवन व्यवहार को बनाए रखकर बड़े सामजिक संगठन के अंग बने रहें। इसी लचीलेपन ने विदेशी तत्वों को आत्मसात करने में सहायता की।

समन्वय केवल भारत में बाहर से आने वाले विभिन्न तत्वों के साथ नहीं किया गया, बल्कि व्यक्ति के बाहरी और भीतरी जीवन तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच भी समन्वय करने का प्रयास दिखाई पड़ता है। इस सामान्य सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ने भारत का निर्माण किया और इस पर विविधता के बावजूद एकता की मोहर लगाई। राजनीतिक ढाँचे के मूल में स्वशासी ग्राम व्यवस्था थी। राजा आते-जाते रहे पर यह व्यवस्था नींव की तरह कायम रही। बाहर से आने वाले नए लोग इस ढाँचे में सिर्फ सतही हलचल पैदा कर पाते थे। राज सत्ता चाहे देखने में कितनी निरंकुश लगती हो, रीति रिवाज़ों और वैधानिक बंधनों से कुछ इस तरह नियंत्रित रहती थी कि कोई शासक ग्राम समुदाय के सामान्य और विशेषाधिकारों में आसानी से दखल नहीं दे सकता था। इन प्रचलित अधिकारों के तहत समुदाय और व्यक्तित्व दोनों की स्वतंत्रता एक हद तक सुरक्षित रहत थी।

ऐसा लगता है कि ऐसे हर तत्व ने जो बाहर से भारत में आया और जिसे भारत ने जज़्ब कर लिया, भारत को कुछ दिया और उससे बहुत कुछ लिया। जहाँ वह अलग-थलग रहा, वहाँ वह अंततः नष्ट हो गया और कभी-कभी इस प्रक्रिया में उसने खुद को या भारत को नुकसान पहुँचाया।

भारत का प्राचीन रंगमच

भारतीय रंगमंच अपने मूल में, संबद्ध विचारों में और अपने विकास में पूरी तरह स्वतंत्र था। इसका मूल उद्गम ऋग्वेद की उन ऋचाओं और संवादों में खोजा जा सकता है जिनमें एक हद तक नाटकीयता है। रामायण और महाभारत में  नाटकों का उल्लेख मिलता हैं। कृष्ण-लीला से संबंधित गीत, संगीत और नृत्य में इसने आकार ग्रहण करना आरंभ कर दिया था। ई. पूर्व छठी या सातवीं शताब्दी के महान वैयाकरण पाणिनि ने कुछ नाट्य-रूपों का उल्लेख किया है।

रंगमंच की कला पर रचित नाट्यशास्त्र को ईसा की तीसरी शताब्दी की रचना कहा जाता है। ऐसे ग्रंथ की रचना तभी हो सकती थी, जब नाट्य कला पूरी तरह विकसित हो चुकी हो और नाटकों की सावर्जनिक प्रस्तुति आम बात हो।

अब यह माना जाने लगा है कि नियमित रूप से लिखे गए संस्कृत नाटक ई.पू. तीसरी शताब्दी तक पूरी तरह प्रतिष्ठित ही चुके थे। जो नाटक हमें मिले हैं उनमें पहले के ऐसे रचनाकारों और नाटकों का अक्सर हवाला दिया गया है जो अभी तक नहीं मिले हैं। ऐसे नाटककारों में एक भास था। इस शताब्दी के आरंभ में उसके तेरह नाटकों का एक संग्रह खोज में मिला हैं। अब तक मिले संस्कृत नाटकों में प्राचीनतम नाटक अश्वघोष के हैं। वह ईसवी सन् के आरंभ के ठीक पहले या बाद में हुआ था। ये ताड़ पत्र पर लिखित पांडुलिपियों के अंश मात्र हैं और आश्चर्य की बात यह कि ये गोबी रेगिस्तान की सरहदों पर तुर्फ़ान में मिले हैं। अश्वघोष धर्मपरायण बौद्ध हुआ। उसने बुद्धचरित नाम से बुद्ध की जीवनी लिखी। यह ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध हुआ और बहुत समय पहले भारत, चीन और तिब्बत में बहुत लोकप्रिय हुआ।

यूरोप की प्राचीन भारतीय नाटक के बारे में पहली जानकारी 1789 ई. में तब हुई जब कालिदास के शकुंतला का सर विलियम जोंस कृत अनुवाद प्रकाशित हुआ। सर विलियम जोंस के अनुवाद के आधार पर जर्मन, फ्रेंच, डेनिश और इटालियन में भी इसके अनुवाद हुए। गेटे पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा और उसने शकुंतला की अत्यधिक प्रशंसा की।

कालिदास को संस्कृत साहित्य का सबसे बड़ा कवि और नाटककार माना गया है। उसका समय अनिश्चित हैं, पर संभावना यही है कि वह चौथी शताब्दी के अंत में गुप्त वंश के चंद्रगुप्त (द्वितीय) विक्रमादित्य के शासन-काल में उज्जयिनी में था। माना जाता है कि वह दरबार के नौ रत्नों में से एक था। उसकी रचनाओं में जीवन के प्रति प्रेम और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति आवेग का भाव मिलता हैं।

कालिदास की एक लंबी कविता है मेघदूत। एक प्रेमी, जिसे बंदी बनाकर उसकी प्रेयसी से अलग कर दिया गया हैं, वर्षा ऋतु में, एक बादल से अपनी तीव्र चाहत का संदेश उस तक पहुँचाने के लिए कहता है।

कालिदास से काफी पहले संभवतः एक बहुत प्रसिद्ध नाटक की रचना हुई थी शूद्रक का मृच्छकटिकम् यानी मिट्टी की गाड़ी। यह एक कोमल और एक हद तक बनावटी नाटक हैं। लेकिन इसमें ऐसा सत्य हैं जो हमें प्रभावित करता है और हमारे सामने उस समय की मानसिकता और सभ्यता की झाँकी प्रस्तुत करता है।

400 ई. के लगभग, चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में एक और प्रसिद्ध नाटक लिखा गया। यह विशाखदत्त का नाटक मुद्राराक्षस था। यह विशुद्ध राजनीतिक नाटक था, जिसमें प्रेम या किसी पौराणिक कथा को आधार नहीं बनाया गया है। कुछ अर्थों में यह नाटक वर्तमान स्थिति में बहुत प्रासंगिक है।

राजा हर्ष, जिसने सातवीं सदी ई. में एक नया साम्राज्य कायम किया, नाटककार भी था। हमें उसके लिखे हुए तीन नाटक मिलते हैं। सातवीं सदी के आसपास ही भवभूति हुआ, जो संस्कृत साहित्य का चमकता सितारा था। वह भारत में बहुत लोकप्रिय हुआ और केवल कालिदास का ही स्थान उसके ऊपर माना जाता हैं।

संस्कृत नाटकों की यह धारा सदियों तक बहती रही लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में गुणात्मक दृष्टि से स्पष्ट रूप से उसमें ह्रास दिखाई देने लगा।

प्राचीन नाटकों की (कालिदास तथा अन्य लोगों के) भाषा मिली-जुली है-संस्कृत और उसके साथ एक या एकाधिक प्राकृत, यानी संस्कृत के बोलचाल में प्रचलित रूप। उसी नाटक में शिक्षित पात्र संस्कृत बोलते हैं और सामान्य अशिक्षित जन समुदाय, प्रायः स्त्रियाँ प्राकृत, हालाँकि उनमें अनुवाद भी मिलते हैं। यह साहित्यिक भाषा और लोकप्रिय कला के बीच समझौता था। फिर भी प्राचीन नाटक अक्सर राज-दरबारों या उसी प्रकार के अभिजात दर्शकों के लिए अभिजात्यवादी कला की प्रस्तुत करते हैं।

इस ऊँचे दर्जे के साहित्यिक रंगमंच के अलावा हमेशा एक लोकमंच भी रहा है। इसका आधार भारतीय पुराकथाएँ और महाकाव्यों से ली गई कथाएँ होती थीं। दर्शकों को इन विषयों की अच्छी तरह जानकारी रहती थी और इनका सरोकार नाटकीय तत्व से कहीं अधिक प्रस्तुति पर रहता था। ये अलग-अलग क्षेत्रों की बोलियों में रचे जाते थे, अतः उस क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रहते थे। दूसरी ओर संस्कृत नाटकों का चलन पूरे भारत में था क्योंकि उनकी भाषा पूरे भारत के शिक्षित समुदाय की भाषा थी।

संस्कृत भाषा की जीवंतता और स्थायित्व

संस्कृत अद्भुत रूप से समृद्ध भाषा हैं अत्यंत विकसित और नाना प्रकार से अलंकृत। इसके बावजूद वह नियत और व्याकरण के उस ढाँचे में सख्ती से जकड़ी है जिसका निर्माण 2600 वर्ष पहले पाणिनि ने किया था। इसका प्रसार हुआ, संपन्न हुई, भरी-पूरी और अलंकृत हुई, पर इसने अपने मूल को नहीं छोड़ा। संस्कृत साहित्य के पतन के काल में भाषा ने अपनी कुछ शक्ति और शैली की सादगी खो दी।

सर विलियम जोंस ने 1784 में कहा था-“ संस्कृत भाषा चाहे जितनी पुरानी होम उसकी बनावट अद्भुत है, यूनानी भाषा के मुकाबले यह अधिक पूर्ण है, लातीनी के मुकाबले अधिक उत्कृष्ट है और दोनों के मुकाबले अधिक परिष्कृत है। पर दोनों के साथ वह इतनी अधिक मिलती जुलती हैं कि यह संयोग आकस्मिक नहीं हो सकता। यह साफ़ पहचाना जा सकता है कि इन सभी भाषाओं का स्रोत एक ही हैं, जो शायद अब मौजूद नहीं रहा है।”

संस्कृत आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी है उनका अधिकांश शब्दकोश और अभिव्यक्ति का ढंग संस्कृत की दें है। सेस्कृत काव्य और दर्शन के बहुत से सार्थक और महत्त्वपूर्ण शब्द, जिनका विदेशी भाषाओं में अनुवाद नहीं किया जा सकता, आज भी हमारी लोक प्रचलित भाषाओं में जीवित हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय उपनिवेश और सेस्कृति

रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा था, “मेरे देश को जानने के लिए उस युग की यात्रा करनी होगी जब भारत ने अपनी आत्मा को पहचानकर अपनी भौतिक सीमाओं का अतिक्रमण किया।”

हमें केवल बीते हुए समय में जाने की ही ज़रूरत नहीं हैं, बल्कि तन से नहीं तो मन से एशिया के विभिन्न देशों की यात्रा करने की ज़रूरत हैं जहाँ भारत ने अनेक रूपों में अपना विस्तार किया था।

पिछली चौथाई सदी के दौरान दक्षिण-पूर्वी एशिया के इस दूर तक फैले क्षेत्र के इतिहास पर बहुत प्रकाश डाला गया है। इसे कभी कभी वृहत्तर भारत कहा गया है। लेकिन अब भी बहुत-सी कड़ियाँ नहीं मिलतीं। बहुत से अंतर्विरोध भी हैं। किंतु सामान्य रूप से सामग्री की कोई कमी नहीं है। भारतीय पुस्तकों के हवाले मिलते हैं, अरब यात्रियों के लिखे हुए वृत्तांत हैं और इन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है चीन से प्राप्त ऐतिहासिक विवरण। इसके अलावा बहुत से पुराने शिलालेख और ताम्र-पत्र हैं। जावा और बाली में भारतीय स्रोतों पर आधारित समृद्ध साहित्य है जिसमें अक्सर भारतीय महाकाव्यों और पुराकथाओं का भावानुवाद किया गया है। यूनानी और लातीनी स्रोतों से भी कुछ सूचनाएँ मिली हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर प्राचीन इमारतों के विशाल खंडहर हैं-विशेषकर अंगकोर और बोरोबुदुर में।

ईसा की पहली शताब्दी से लगभग 900 ईसवी तक उपनिवेशीकरण की चार प्रमुख लहरें दिखाई पड़ती हैं। इनके बीच-बीच में पूरब की ओर जाने वाले लोगों का सिलसिला अवश्य रहा होगा। इन साहसिक अभियानों की सबसे विशिष्ट बात यह थी कि इनका आयोजन स्पष्टतः राज्य द्वारा किया जाता था। दूर-दूर तक फैले इन उपनिवेशों की शुरुआत लगभग एक साथ होती थी और ये उपनिवेश युद्ध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थानों पर और भारतीय नामों के आधार पर किया गया। इस तरह जिसे अब कंबोडिया कहते हैं, उस समय कंबोज कहलाया।

जावा स्पष्ट रूप से ‘यवद्वीप’ या जी का टापू है। यह आज भी एक अन्न विशेष का नाम है। प्राचीन पुस्तकों में आए हुए नामों का सेबंध भी प्रायः खनिज, धातु या किसी उद्योग या खेती की पैदावार से होता है। इस नामकरण से खुद-ब-खुद ध्यान व्यापार की ओर जाता है।

यह व्यापार ईसा पूर्व तीसरी और दूसरी शताब्दियों में धीरे-धीरे बढ़ गया। इन साहसिक व्यवसायियों और व्यापारियों के बाद धर्म प्रचारकों का जाना शुरू हुआ होगा, क्योंकि यह समय अशोक के ठीक वाद का समय था। सेस्कृत की प्राचीन कथाओं से और यूनानी और अरबी दोनों में प्राप्त वृत्तांतों से पता लगता है कि भारत और सुदूर पूरब के देशों के बीच कम से कम ईसा की पहली शताब्दी में नियमित समुद्री व्यापार होता था।

यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में जहाज़ बनाने का उद्योग बहुत विकसित और उन्नति पर था। उस समय में बनाए गए जहाज़ों का कुछ व्यौरेवार वर्णन मिलता है। बहुत से भारतीय बंदरगाहों का उल्लेख मिलता है। दूसरी और तीसरी शताब्दी के दक्षिण भारतीय (आंध्र) सिक्कों पर दोहरे-पाल वाले जहाज़ों का चिह्न अंकित हैं। अजंता के भित्ति चित्रों में लंका-विजय और हाथियों को ले जाते हुए जहाज़ों के चित्र हैं।

महाद्वीप के देशों बर्मा, स्याम और हिंद-चीन पर चीन का प्रभाव अधिक था, टापुओं और मलय प्रायद्वीप पर भारत की छाप अधिक थी। आमतौर पर शासन-पद्धति और सामान्य जीवन-दर्शन चीन ने दिया और धर्म और कला भारत ने।

इन भारतीय उपनिवेशों का इतिहास तकरीबन तेरह सौ साल या इससे भी कुछ अधिक का है-ईसा की पहली या दूसरी शताब्दी से आरंभ होकर पंद्रहवीं शताब्दी के अंत तक।

विदेशों पर भारतीय कला का प्रभाव

भारतीय सभ्यता ने विशेष रूप से दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में अपनी जड़ें जमाई। इस बात का प्रमाण आज वहाँ सब जगह मिलता है, चंपा, अंगकोर, श्रीविजय, भज्जापहित और दूसरे स्थानों पर संस्कृत के बड़े-बड़े अध्ययन केंद्र थे। वहाँ जिन राज्यों का उदय हुआ उनके शासकों के नाम विशुद्ध भारतीय और संस्कृत नाम हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे विशुद्ध भारतीय थे, पर इसका अर्थ यह अवश्य है कि उनका भारतीयकरण किया गया था। राजकीय समारोह भारतीय ढंग से संस्कृत में संपन्न किए जाते थे। राज्य के सभी कर्मचारियों के पास संस्कृत की प्राचीन पदवियाँ थीं और इनमें से कुछ पदवियाँ और पदनाम न केवल थाईलैंड में बल्कि मलाया की मुस्लिम रियासतों में भी अभी तक चले आ रहे हैं। इंडोनेशिया के इन स्थानों के प्राचीन साहित्य भारतीय पुराकथाओं और गाथाओं से भरे हुए हैं। जावा और बाली के मशहूर नृत्य भारत से लिए गए हैं। बाली के छोटे से टापू ने अपनी भारतीय संस्कृति को अभी तक बहुत सीमा तक कायम रखा है, यहाँ तक कि हिंदू धर्म भी वहाँ चला आ रहा हैं। फिलिपीन द्वीपों में लेखन-कला भारत से ही गई है।

कंबोडिया में वर्णमाला दक्षिण भारत से ली गई हैं और बहुत से सेस्कृत शब्दों को थोड़े से हरे-फेर के साथ ले लिया गया हैं। दीवानी और फ़ौजदारी के कानून भारत के प्राचीन स्मृतिकार मनु के कानूनों के आधार पर बनाए गए हैं और इन्हें बौद्ध प्रभाव के कारण कुछ परिवर्तनों के साथ संहिताबद्ध करके कंबोडिया की आधुनिक कानून व्यवस्था में ले लिया गया है।

लेकिन भारतीय प्रभाव सबसे अधिक प्रकट रूप से प्राचीन भारतीय बस्तियों की भव्य कला और वास्तुकला में दिखाई पड़ता है। इस प्रभाव से अंगकोर और बोरोबुदुर की इमारतें और अद्भुत मंदिर तैयार हुए। जावा में बोरोबुदुर में बुद्ध की जीवन-कथा पत्थरों में उत्कीर्ण हैं। दूसरे स्थानों पर नक्काशी करके विष्णु, राम और कृष्ण की कथाएँ अंकित की गई हैं।

अंगकोरवट के विशाल मंदिर के चारों तरफ़ विशाल खंडहरों का विस्तृत क्षेत्र हैं। उसमें बनावटी झीलें, पोखरें और नहरें हैं जिनके ऊपर पुल बने हैं और एक बहुत बड़ा फाटक हैं जिस पर एक वृद्धाकार सिर पत्थर में खुदा है। यह एक आकर्षक मुस्कराता हुआ किंतु रहस्मय कंबोडियाई देवतुल्य चेहरा है। इस चेहरे की मुस्कान अद्भुत रूप से मोहक और विचलित करने वाली हैं।

अंगकोर की प्रेरणा भारत से मिली पर उसका विकास ख्मेर प्रतिभा ने किया, या कि दोनों के परस्पर मेल से यह अजूबा पैदा हुआ। कंबोडिया के जिस राजा ने इसे बनवाया उसका नाम जयवर्मन (सप्तम) था, जो ठेठ भारतीय नाम हैं।

भारतीय कला का भारतीय धर्म और दर्शन से इतना गहरा रिश्ता हैं कि जब तक किसी को उन आदर्शो की जानकारी न हो जिनसे भारतीय मानस शासित होता है तब तक उसके लिए इसको पूरी तरह सराहना सेभव नहीं है। भारतीय कला में हमेशा एक धार्मिक प्रेरणा होती हैं, एक पारदृष्टि होती हैं, कुछ वैसी ही जिसने सेभवतः यूरोप के महान गिरजाघरों के निर्माताओं को प्रेरित किया था। सौंदर्य की कल्पना आत्मनिष्ठ रूप में की गई है, वस्तुनिष्ठ रूप में नहीं; वह आत्मा से सेबंध रखने वाली चीज है, भले ही वह रूप या पदार्थ में भी आकर्षक आकार ग्रहण कर ले। यूनानियों ने सौंदर्य से निस्वार्थ भाव से प्रेम किया। उन्हें सौंदर्य में केवल आनंद ही नहीं मिलता था, वे उसमें सत्य के दर्शन भी करते थे। प्राचीन भारतीय भी सौंदर्य से प्रेम करते थे, पर वे हमेशा अपनी रचनाओं में कोई गहरा अर्थ भरने का प्रयत्न करते थे।

भारतीय कविता और सेगीत की तरह कला में भी कलाकार से यह उम्मीद की जाती थी कि वह प्रकृति की सभी मनोदशाओं से तादात्म्य स्थापित करे ताकि वह प्रकृति और विश्व के साथ मनुष्य के मूलभूत और स्थापत्य में हैं, जिस तरह चीन और जापान की विशेषता उनकी चित्रकला में हैं।

भारतीय संगीत, जो यूरोपीय सेगीत से बहुत भिन्न हैं, अपने ढंग से बहुत विकसित था। इस दृष्टि से भारत का बहुत विशिष्ट स्थान है और सेगीत के क्षेत्र में चीन और सुदूर पूर्व के अलावा उसने एशियाई सेगीत को बहुत दूर तक प्रभावित किया था।

एशिया के दूसरे देशों की तरह भारत में भी कला के विकास पर, गढ़ी हुई मूर्तियों के विरुद्ध धार्मिक पूर्वाग्रह का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। वेद मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे और बौद्ध धर्म में भी अपेक्षाकृत बाद के समय में ही बुद्ध की मूर्तियाँ और चित्र बनाए जा सके। मथुरा के संग्रहालय में बोधिसत्व की एक विशाल शक्तिशाली और प्रभावशाली पाषाण प्रतिमा हैं। इसका निर्माण ईसवी सन् के आरंभ के आस-पास कुषाण युग में हुआ था।

भारतीय कला अपने आरंभिक काल में प्रकृतिवाद से भरी हैं, जो कुछ अशों में चीनी प्रभाव के कारण हो सकता है। भारतीय कला के इतिहास की विभिन्न अवस्थाओं पर चीनी प्रभाव दिखाई पड़ता हैं।

चौथी से छठी शताब्दी ईसवी में गुप्तकाल के दौरान, जिसे भारत का स्वर्ग युग कहा जाता है, अजंता की गुफ़ाएँ खोदी गईं और उनमें भित्ति चित्र बनाए गए। बाग और बादामी की गुफ़ाएँ भी इसी काल की हैं।

अजंता हमें किसी स्वप्न की तरह दूर किंतु असल में एकदम वास्तविक दुनिया में ले जाती है। इन भित्ति चित्रों को बौद्ध भिक्षुओं ने बनाया था। बहुत समय पहले उनके स्वामी ने कहा था स्त्रियों से दूर रहीं, उनकी तरफ़ देखो भी नहीं, क्योंकि वे खतरनाक हैं। इसके बावजूद इन चित्रों में स्त्रियों की कमी नहीं है-सुंदर स्त्रियाँ, राजकुमारियाँ, गायिकाएँ, नर्तकियाँ, बैठी और खड़ी, शृंगारकरती हुईं या शोभा यात्रा में जाती हुईं। ये चित्रकार भिक्षु संसार को और जीवन के गतिशील नाटक को कितनी अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने ये चित्र उतने ही प्रेम से बनाए हैं जितने प्रेम से उन्होंने बोधिसत्व को उनकी शांत, लोकोत्तर गरिमा में चित्रित किया हैं।

सातवीं आठवीं शताब्दियों में ठोस चट्टान को काटकर एलोरा की विशाल गुफ़ाएँ तैयार हुईं, जिनके बीच में कैलाश का विशाल मंदिर है। यह अनुमान करना कठिन है कि इंसान ने इसकी कल्पना कैसे की होगी या कल्पना को रूपाकार कैसे दिया होगा। एलिफ़ेंटा की गुफ़ाएँ भी इसी समय की हैं जहाँ प्रभावशाली और रहस्मयी त्रिमूर्ति बनी है। दक्षिण भारत में महाबलीपुरम् की इमारतों का निर्माण भी इसी समय हुआ था।

एलिफेंटा की गुफ़ाओं में नटराज शिव की एक खंडित मूर्ति हैं, जिसमें शिव नृत्य की मुद्रा में हैं। हैवल का कहना है कि इस क्षत-विक्षत अवस्था में भी यह मूर्ति भीमाकार शक्ति का मूर्त रूप है और इसकी कल्पना अत्यंत विशाल हैं।

ब्रिटिश सेग्रहालय में विश्व का सृजन और नाश करते हुए नटराज शिव की एक और मूर्ति है। एप्सटीन न लिखा हैं कि उनकी विशाल लयात्मकता काल के विराट युगों का आह्वान करती हैं।

जावा में बॉरीबुदुर से बोधिसत्व का एक सिर कोपेनहेगन के ग्लिपटोटेक लें जाया गया है। रूपगत सौंदर्य की दृष्टि से तो यह सिर सुदर है ही, इसमें कुछ और गहरी बात है जो बोधिसत्व की शुद्ध आत्मा को इस तरह उद्घाटित करती है जैस दर्पण में प्रतिबिंब। वह एक ऐसा चेहरा है, जिसमें समुद्र की गहराइयों की प्रशांति, निरभ्र नीले आकाश की स्वच्छता और इंसानी पहुँच से परे का परम सौंदर्य मूर्तिमान हुआ है।

ईसवी सन् के पहले एक हज़ार वर्षों के दौरान, भारत का व्यापार दूर-दूर तक फैला हुआ था और बहुत से विदेशी बाज़ारों पर भारतीय व्यापारियों का नियंत्रण था। पूर्वी समुद्र के देशों में तो उनका प्रभुत्व था ही, उधर वह भूमध्य सागर तक भी फैला हुआ था।

भारत में बहुत प्राचीन काल से कपड़े का उद्योग बहुत विकसित हो चुका था। भारतीय कपड़ा दूर दूर के देशों में जाता था। रेशमी कपड़ा भी यहाँ काफ़ी समय से बनता रहा हैं। लेकिन वह शायद उतना अच्छा नहीं होता था जितना चीनी रेशम, जिसका आयात यहाँ ई.पू. चौथी शताब्दी से ही किया जाता था। भारतीय रेशम उद्योग ने बाद में विकास किया, लेकिन बहुत नहीं। कपड़े को रँगने की कला में उल्लेखनीय प्रगति हुई और पक्के रंग तैयार करने के खास तरीके खोज निकाले गए। इनमें से एक नील का रंग था, जिसे अंग्रेज़ी में ‘इंडिगों’ कहते हैं। यह शब्द इंडिया से बना है और अंग्रेज़ीं में यूनान के माध्यम से आया है।

ईसवीं सन् की आरंभिक शताब्दियों में भारत में रसायनशास्त्र का विकास और देशों की तुलना में शायद अधिक हुआ था। भारतीय, प्राचीन काल से ही फ़ौलाद को ताव देना जानते थे। भारतीय फ़ौलाद और लोहें की दूसरे देशों में बहुत कद्र की जाती थी, विशेष रूप से युद्ध के कामों में। भारतीयों को और बहुत-सी धातुओं की भी जानकारी थी और उनका इस्तेमाल किया जाता था। औषधियों के लिए धातुओं के मिश्रण तैयार किए जाते थे। आसव और भस्म बनाना ये लोग खूब जानते थे। औषध-विज्ञान काफ़ी विकसित था। मध्य युग तक प्रयोगों में काफ़ी विकास किया जा चुका था, गरचे ये प्रयोग मुख्य रूप से प्राचीन ग्रंथों पर आधारित थे। शरीर-रचना और शरीर-विज्ञान का अध्ययन किया जाता था और हार्वे से बहुत पहले रक्त-संचार की बात सुझाई जा चुकी थी।

खगोलशास्त्र, जो विज्ञानों में प्राचीनतम हैं, विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम का नियमित विषय था और फलित ज्योतिष की इससे मिला दिया जाता था। एक निश्चित पंचांग भी तैयार किया गया था जो लोग समुद्री-यात्रा पर निकलते थे, उनके लिए खगोलशास्त्र का ज्ञान व्यवहारिक दृष्टि से बहुत सहायक होता था।

यह कहना कठिन है कि उस समय तक यंत्रों ने कितनी प्रगति की थी, लेकिन जहाज़ बनाने का उद्योग खूब चलता था। इसके अलावा, विशेष रूप से युद्ध में काम आने वाली तरह-तरह की मशीनों के हवाले भी मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय भारत औज़ारों के निर्माण एवं प्रयोग में और रसायनशास्त्र एवं धातुशास्त्र संबंधी जानकारी में किसी देश से पीछे नहीं था। इसी कारण कई सदियों तक वह कई विदेशी मंडियों को अपने वश में रख सका।

प्राचीन भारत में गणितशास्त्र

यह माना जाता है कि आधुनिक अनगणित बीजगणित की नींव भारत में ही पड़ी थी। गिनती के चौखटे की इस्तेमाल करने की फूहड़ पद्धति, रोमन और उसी तरह की संख्याओं के इस्तेमाल ने बहुत समय तक प्रगति में बाधा दी, जबकि शून्यांक मिलाकर दस भारतीय संख्याओं ने मनुष्य की बुद्धि को इन बाधाओं से बहुत पहले मुक्त कर दिया था और अंकों के व्यवहार पर अत्यधिक प्रकाश डाला था। ये अंक चिह्न बेजोड़ थे और दूसरे देशों में प्रयोग किए जाने वाले तमाम चिह्नों से एकदम भिन्न थे।

भारत में ज्यामिति, अंकगणित और बीजगणित का आरंभ बहुत प्राचीन काल में हुआ था। शायद आरंभ में वैदिक वेदियों पर आकृतियाँ बनाने के लिए एक तरह के ज्यामितिक बीजगणित का प्रयोग किया जाता था। हिंदू संस्कारों में ज्यामितिक आकृतियाँ अब भी आमतौर पर काम में लाई जाती हैं। भारत में ज्यामिति का विकास अवश्य हुआ पर इस क्षेत्र में यूनान और सिकंदरिया आगे बढ़ गए। अंकगणित और बीजगणित में भारत आगे बना रहा। जिसे ‘शून्य’ या ‘कुछ नहीं’ कहा जाता हैं वह आरंभ में एक बिंदी या नुक्ते की तरह था। बाद में उसने एक छोटे वृत्त का रूप धारण कर लिया। उसे किसी भी और अंक की तरह एक अंक समझा जाता था।

शून्यांक और स्थान मूल्य वाली दशमलव विधि को स्वीकार करने के बाद अंकगणित और बीजगणित में तेज़ी से विकास करने की दिशा में कपाट खुल गए। बीजगणित पर सबसे प्राचीन ग्रंथ ज्योतिर्विद आर्यभट्ट का है, जिनका जन्म 427 ई. में हुआ था। भारतीय गणितशास्त्र में अगला महत्वपूर्ण नाम भास्कर (522 ई.) का और उसके बाद ब्रह्मपुत्र (628 ई.) का हैं। ब्रह्मपुत्र प्रसिद्ध खगोलशास्त्री भी था जिसने शून्य पर लागू होने वाले नियम निश्चित किए और इस क्षेत्र में और अधिक उल्लेखनीय प्रगति की। इसके बाद अंकगणित और बीजगणित पर लिखने वाले गणितज्ञों की परंपरा मिलती है। इनमें अंतिम महान नाम भास्कर द्वितीय का है, जिसका जन्म 1114 ई. में हुआ था। उसने खगोलशास्त्र, बीजगणित और अंकगणित पर क्रमशः तीन ग्रंथों की रचना की। अंकगणित पर उनकी पुस्तक का नाम लीलावती हैं, जो स्त्री का नाम होने के कारण गणित की पुस्तक के लिए विचित्र लगता है। विश्वास किया जाता है की लीलावती भास्कर की पुत्री थी गोकि इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। पुस्तक की शैली सरल और स्पष्ट हैं और छोटी उम्र के लोगों की समझ के लिए उपयुक्त है। इस पुस्तक का संस्कृत विद्यालयों में अब भी कुछ हद तक अपनी शैली के कारण इस्तेमाल किया जाता है।

आठवीं शताब्दी में खलीफ़ा अल्मंसूर के राज्यकाल में (753-774 ई.) कई भारतीय विद्वान बगदाद गए और अपने साथ वे जिन पुस्तकों को ले गए उनमें खगोलशास्त्र और गणित की पुस्तकें थीं। इन्होंने अरबी जगत में गणितशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र के विकास को प्रभावित किया और वहाँ भारतीय अंक प्रचलित हुए। बगदाद उस समय विद्याध्ययन का बड़ा केंद्र था और यूनानी और यहूदी विद्वान वहाँ एकत्र होकर अपने साथ यूनानी दर्शन, ज्यामिति और विज्ञान ले गए थे। मध्य एशिया से स्पेन तक सारी इस्लामी दुनिया पर बगदाद का सांस्कृतिक प्रभाव महसूस किया जा रहा था और अरबी अनुवादों के माध्यम से भारतीय गणित का ज्ञान इस व्यापक क्षेत्र में फैल गया था।

अरबी जगत से यह नया गणित, संभवतः स्पेन के मूर विश्वविद्यालयों के माध्यम से यूरोपीय देशों में पहुँचा और इससे यूरोपीय गणित की नींव पड़ी। यूरोप में इन नए अंकों का विरोध हुआ और इनके आमतौर पर प्रचलन में कई सौ वर्ष लग गए। इनका सबसे पहला प्रयोग, जिसकी जानकारी मिलती हैं, 1134 ई. में सिसली के एक सिक्के में हुआ। ब्रिटेन में इसका पहला प्रयोग 1490 ई. में हुआ।

विकास और ह्रास

ईसवी सन् के पहले हज़ार वर्षों में, भारत में आक्रमणकारी तत्वों और आंतरिक झगड़ों के कारण बहुत उतार-चढ़ाव आए। फिर भी यह समय ऊर्जा से उफनता और सभी दिशाओं में अपना प्रसार करते हुए कर्मठ राष्ट्रीय जीवन का समय रहा हैं। ईरान, चीन, यूनानी जगत, मध्य एशिया से उसका संपर्क बढ़ता है और इस सबसे बढ़कर पूर्वी समुद्रों की ओर बढ़ने की शक्तिशाली प्रेरणा पैदा होती है। परिणामस्वरूप भारतीय उपनिवेशों की स्थापना और भारतीय सीमाओं को पार कर दूर-दूर तक भारतीय संस्कृति का प्रसार होता हैं। इन हज़ार वर्षों के बीच के समय में यानी चौथी शताब्दी के आरंभ से लेकर छठी शताब्दी तक गुप्त साम्राज्य समृद्ध होता है। यह भारत का स्वर्ण युग कहलाता है। इस युग के संस्कृत साहित्य में एक प्रकार की प्रशांति, आत्मविश्वास और आत्मभिमान की दीप्ति और उमंग दिखाई पड़ती हैं।

स्वर्ण युग के समाप्त होने से पहले ही कमज़ोरी और ह्रास के लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं। उत्तर-पश्चिम से गोरे हूणों के दल के दल आते हैं और बार-बार वापस खदेड़ दिए जाते हैं। किंतु धीरे-धीरे वे उत्तर-भारत में अपनी राह बना लेते हैं और आधी शताब्दी तक पूरे उत्तर में अपने को राज सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित कर लेते हैं। इसके बाद, अंतिम गुप्त सम्राट मध्य भारत के एक शासक यशोवर्मन के साथ मिलकर, बहुत प्रयत्न करके हूणों को निकाल बाहर करता है।

इस लंबे संघर्ष ने भारत की राजनीतिक और सैनिक दोनों दृष्टियों से दुर्बल बना दिया। हूणों के उत्तर भारत में बस जाने के कारण लोगों में धीरे-धीरे एक अंदरूनी परिवर्तन घटित हुआ। हूणों के पुराने वृत्तांत कठोरता और बर्बर व्यवहार से भरे पड़े हैं। ऐसा व्यवहार जो युद्ध और शासन के भारतीय आदर्शा से एकदम भिन्न हैं।

सातवीं शताब्दी में हर्ष के शासनकाल में उज्जयिनी (आधुनिक उज्जैन), जो गुप्त शासकों की शानदार राजधानी थी, फिर से कला, संस्कृति और एक शक्तिशाली साम्राज्य का केंद्र बनती हैं। लेकिन आने वाली सदियों में वह भी कमज़ोर पड़कर धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। नौवीं शताब्दी में गुजरात का मिहिर भोज उत्तर और मध्य भारत में छोटे राज्यों को मिलाकर एक संयुक्त राज्य कायम करके कन्नौज को अपनी राजधानी बनाता है। एक बार फिर साहित्यिक पुर्जागरण होता है जिसके प्रमुख व्यक्तित्व राजशेखर हैं। ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में एक बार फिर, एक दूसरा भोज सामने आता हैं जो बहुत पराक्रमी और आकर्षक है और उज्जयिनी फिर एक बड़ी राजधानी बनती है। यह भोज बड़ा अद्भुत व्यक्ति था जिसने अनेक क्षेत्रों में प्रतिष्ठा हासिल की। वह वैयाकरण और कोशकार था। साथ ही उसकी दिलचस्पी भेषज और खगोलशास्त्र में थी। उसने इमारतों का निर्माण कराया और कला एवं साहित्य का संरक्षण किया। वह स्वयं कवि और लेखक था जिसके नाम से कई रचनाएँ मिलती हैं। उसका नाम महानता, विद्वता और उदारता के प्रतीक के रूप में लोक-कथाओं और किस्सों का हिस्सा बन गया हैं।

इन तमाम चमकदार टुकड़ों के बावजूद एक भीतरी कमज़ोरी ने भारत को जकड़ रखा है, जिससे उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा ही नहीं, बल्कि उसके रचनात्मक क्रियाकलाप भी प्रभावित होते दिखाई पड़ते हैं। यह प्रक्रिया बहुत धीमी गति से चलती रही और इसने दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत को जल्द प्रभावित किया। वस्तुतः दक्षिण, आक्रमणकारियों के लगातार हमलों का मुकाबला करने के दबाव से बचा रहा। उत्तर भारत की अनिश्चित स्थिति से बचाव के लिए बहुत से लेखक, कलाकार और वास्तुशिल्पी दक्षिण में जाकर बस गए। दक्षिण के शक्तिशाली राज्यों ने इन लोगों की रचनात्मक कार्य के लिए ऐसा अवसर दिया होगा जो उन्हें दूसरी जगह नहीं मिला।

गरचे उत्तरी भारत छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था, पर जीवन वहाँ समृद्ध था और वहाँ कई केंद्र सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से सक्रिय थे। हमेशा की तरह बनारस धार्मिक और दार्शनिक विचारों का गढ़ था। लंबे समय तक कश्मीर भी बौद्धों और ब्राह्मणों के संस्कृत ज्ञान का बहुत बड़ा केंद्र रहा। भारत में बड़े-बड़े विश्वविद्यालय रहे। इनमें सबसे प्रसिद्ध नालंदा था, जिसके विद्वानों का पूरे भारत में आदर किया जाता था। यहाँ चीन, जापान और तिब्बत से विद्यार्थी आते थे, बल्कि कोरिया, मंगोलिया और बुखारा से भी। धार्मिक और दार्शनिक विषयों (बौद्ध और ब्राह्मण दोनों के अनुसार) के अलावा दूसरे विषयों की शिक्षा भी दी जाती थी। कला और वास्तुशिल्प के विभाग थे, वैद्यक का विद्यालय था, कृषि विभाग था, डेरी फार्म था और पशु थे। विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रसार ज़्यादातर नालंदा के विद्वानों ने किया हैं।

इसके अलावा बिहार में आजकल के भागलपुर के पास विक्रमशिला और काठियावाड़ में वल्लभी विश्वविद्यालय थे। गुप्त शासकों के समय में उज्जयिनी विश्वविद्यालय का उत्कर्ष हुआ। दक्षिण में अमरावती विश्वविद्यालय था।

ज्यों-ज्यों सहस्राब्दी समाप्ति पर आती हैं यह सब सभ्यता के तीसरे पहर जैसा लगने लगता है। दक्षिण में अब भी तेजस्विता और शक्ति शेष थी और वह कुछ और शताब्दियों तक बनी रही। पर ऐसा लगता था जैसे हृदय स्तंभित हो चला हो, उनकी धड़कनें मंद होने लगी हों। आठवीं शताब्दी में शंकर के बाद कोई महान दार्शनिक नहीं हुआ। शंकर भी दक्षिण भारतीय थे। ब्राह्मण और बौद्ध दोनों धर्मों का ह्रास होने लगता है और पूजा के विकृत रूप सामने आने लगते हैं, विशेषकर तांत्रिक पूजा और योग-पद्धति के भ्रष्ट रूप।

साहित्य में भवभूति (आठवीं शताब्दी) आखिरी बड़ा व्यक्ति था। गणित में आखिरी बड़ा नाम भास्कर द्वितीय (बारहवीं शताब्दी) का हैं। कला में ई. वी. हैवेल के अनुसार सातवी या आठवीं शताब्दी से चौदहवीं शताब्दी तक भारतीय कला का महान युग था। यही समय यूरोप में गाथिक कला के चरम स्पष्ट रूप से सोलहवीं शताब्दी में होने लगा। मेरा खयाल हैं कला के क्षेत्र में भी उत्तर की अपेक्षा दक्षिण भारत में ही पुरानी परंपरा ज़्यादा लंबे समय तक कायम रहीं।

उपनिवेशों में बसने के लिए आखिरी बड़ा दल दक्षिण से नवीं शताब्दी में गया था, लेकिन दक्षिण के चोलवंशी ग्यारहवीं शताब्दी में तब तक एक बड़ी समुद्री शक्ति बने रहे जब तक उन्हें श्रीविजय ने परास्त करके उन पर विजय नहीं प्राप्त कर ली।

समय के साथ भारत क्रमशः अपनी प्रतिभा और जीवन शक्ति को खोता जा रहा था। यह प्रक्रिया बहुत धीमी थी और कई सदियों तक चलती रही। इसका आरंभ उत्तर में हुआ और अंत में यह दक्षिण पहुँच गई। इस राजनीतिक पतन और सांस्कृतिक गतिरोध के कारण क्या थे? राधाकृष्णन का कहना हैं कि भारतीय दर्शन ने अपनी शक्ति राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ खो दी।

यह सही हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता खो जाने से सांस्कृतिक ह्रास अनिवार्य रूप से शुरू हो जाता है। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता तभी छिनती है जब उससे पहले किसी तरह का ह्रास शुरू हो जाता है। भारत जैसा विशाल, अति विकसित और अत्यंत सभ्य देश बाह्य आक्रमण के सामने तभी हार मानेगा जब या तो भीतर से खुद पतनशील हो या आक्रमणकारी युद्धकौशल में उससे आगे हो। भीतरी ह्रास भारत में इन हज़ार वर्षों के अंत में बिलकुल स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

हर सभ्यता के जीवन में ह्रास और विघटन के दौर बार-बार आते हैं पर भारत ने उनसे बचकर नए सिरे से अपना कायाकल्प कर लिया। उसमें एक ऐसा सक्रिय अंतस्तल रहा जो नए संपर्को से अपने को हमेशा ताज़ा रूप देकर फिर से अपना विकास करता रहा। भारत में हमेशा से व्यवहार में रुढिवादिता और विचारों में विस्फोट का विचित्र संयोग रहा है।

सभ्यताओं के ध्वस्त होने के हमारें सामने बहुत से उदाहरण हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय उदाहरण यूरोप की प्राचीन सभ्यता का है जिसका अंत रोम के पतन के साथ हुआ।

भारतीय सभ्यता का ऐसा नाटकीय अंत न उस समय हुआ और न बाद में, किंतु उत्तरोतर पतन साफ़ दिखाई पड़ता है। शायद यह भारतीय समाज-व्यवस्था के बढ़ते हुए कट्टरपन और गैरमिलनसारी का अनिवार्य परिणाम था जिसे यहाँ की जाति-व्यवस्था में देखा जा सकता है। जहाँ भारतीय विदेश चले गए, जैसे दक्षिण पूर्वी एशिया में, वहाँ उनकी मानसिकता, रीति-रिवाज़ और अर्थव्यवस्था किसी में इतना कट्टरपन दिखाई नहीं पड़ता। अगले चार-पाँच सौ वर्ष तक वे इन उपनिवेशों में फले-फूले और उन्होंने तेजस्विता और रचनात्मक शक्ति का परिचय दिया। स्वयं भारत में गैरमिलनसारी की भावना ने उनकी रचनात्मकता को नष्ट कर दिया। जीवन निश्चित चौखटों में बँट गया, जहाँ हर आदमी का धंधा स्थायी और नियत हो गया। देश की सुरक्षा के लिए युद्ध करना क्षत्रियों का काम हो गया। ब्राह्मण और क्षत्रिय वाणिज्य-व्यापार को नीची नज़र से देखते थे। नीची जाति वालों को शिक्षा और विकास के अवसरों से वंचित रखा गया और उन्हें अपने से ऊँची जाति के लोगों के अधीन रहना सिखाया गया।

भारत के सामाजिक ढाँचे ने भारतीय सभ्यता को अद्भुत दृढ़ता दी थी। उसने गुटों को शक्ति दी और उन्हें एकजुट किया, लेकिन यह बात बृहत्तर एकता और विकास के लिए बाधक हुई। इसने दस्तकारी, शिल्प, वाणिज्य और व्यापार का विकास किया, लेकिन हमेशा अलग-अलग समुदायों के भीतर। इस तरह खास ढंग के धंधे पुश्तैनी बन गए और नए ढंग के कामों से बचने और पुरानी लकीर पीटते रहने की प्रवृत्ति पैदा हुई। इससे बड़ी संख्या में लोगों को विकास के अवसरों से वंचित करते हुए, उन्हें स्थायी रूप से समाज की सीढ़ी में नीचा दर्जा देकर यह मूल्य चुकाया गया।

इसी कारण हर तरफ़ ह्रास हुआ – विचारों में, दर्शन में, राजनीति में, युद्ध की पद्धति में, बाहरी दुनिया के बारे में जानकारी और उसके साथ संपर्क में। साथ ही क्षेत्रीयता के भाव बढ़ने लगे, भारत की अखंडता की अवधारणा के स्थान पर सामंतवाद और गिरोहबंदी की भावनाएँ बढ़ने लगीं अद्भुत दृढ़ता बची हुई थी और इसके साथ लचीलापन एवं अपने को ढालने की क्षमता। इसीलिए वह बचा रह सका, नए संपकों एवं विचारधाराओं का लाभ उठा सका और कुछ दिशाओं में प्रगति भी कर सका, लेकिन यह प्रगति अतीत के बहुत से अवशेषों से जकड़ी रही और बाधित होती रही।

पाठ – 4 युगों का दौर 
गुप्त शासन में राष्ट्रीयता और साम्राज्यवाद

मौर्य साम्राज्य का अवसान हुआ और उसकी जगह शुंग वंश ने ले ली जिसका शासन अपेक्षाकृत बहुत छोटे क्षेत्र पर था। दक्षिण में बड़े राज्य उभर रहे थे और उत्तर में काबुल से पंजाब तक बाख्त्री या भारतीय-यूनानी फैल गए थे। मेनांडर के नेतृत्व में उन्होंने पाटलीपुत्र तक पर हमला किया किंतु उनकी हार हुई। खुद मेनांडर पर भारतीय चेतना और वातावरण का प्रभाव पड़ा और वह बौद्ध हो गया। वह राजा मिलिंद के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बौद्ध आख्यानों में उसकी लोक-प्रसिद्धि लगभग एक सेत के रूप में हुई। भारतीय और यूनानी सेस्कृतियों के मेल से अफ़गानिस्तान और सरहदी सूबे के क्षेत्र में गांधार की यूनानी बौद्ध कला का जन्म हुआ।

भारत के मध्य प्रदेश में सांची के निकट बेसनगर में ग्रेनाइट पत्थर की एक लाट है जो हेलिओदो स्तंभ के नाम से प्रसिद्ध है। इसका समय ई.पू. पहली शताब्दी है और इस पर संस्कृत का एक लेख खुदा है। इससे हमें उन यूनानियों के भारतीयकरण की झलक मिलती है जो सरहद पर आए थे और भारतीय संस्कृति को जज़्ब कर रहे थे।

मध्य-एशिया में शक (सीदियन) लोग ऑक्सस (अक्षु) नदी की घाटी में बस गए थे। यूइ ची सुदूर पूरब से आए और उन्होंने इन लोगों को उत्तर-भारत की धकेल दिया। ये शक बौद्ध और हिंदू हो गए। यूइ-चियों में से एक दल कुषाणों का था। उन्होंने सब पर अधिकार करके उत्तर-भारत तक अपना विस्तार कर लिया। उन्होंने शकों को पराजित करके उन्हें दक्षिण की ओर की ओर खदेड़ा। शक काठियावाड़ और दक्खिन की ओर चले गए। इसके बाद कुषाणों ने पूरे उत्तर भारत पर और गध्य एशिया के बहुत बड़ें भाग पर अपना व्यापक और मज़बूत साम्राज्य कायम किया। उनमें से कुछ ने हिंदू धर्म को अपना लिया लेकिन अधिकांश लोग बौद्ध हो गए। उनका सबसे प्रसिद्ध शासक कनिष्क उन बौद्ध कथाओं का भी नायक है, जिनमें उसके महान कारनामों और सार्वजनिक कामों का ज़िक्र किया गया है। तक्षशिला का पुराना विश्वविद्यालय भी उसके निकट था। वह बहुत से राष्ट्रों से आने वाले लोगों के मिलने का स्थान बन गया। इतिहास की दृष्टि से, इसी ज़माने में चीन और भारत के बीच पहले संपर्क हुए और 64 ई. में यहाँ चीनी राजदूत आए। उस समय चीन से भारत को जो तोहफ़े मिले उनमें आडू और नाशपाती के पेड़ थे। गोबी रेगिस्तान के ठीक किनारे-किनारे तूफ़ान और कूचा में भारतीय, चीनी  और ईरानी संस्कृतियों का अद्भुत मेल हुआ।

कुषाण काल में बौद्ध धर्म दो संप्रदायों में बँट गया-महायान और हीनयान। उन दोनों के बीच मतभेद उठ खड़े हुए। इन विवादों में एक नाम सबसे अलग और विशिष्ट दिखाई पड़ता है। यह नाम नागार्जुन का है जो ईसा की पहली शताब्दी में हुए। उनका व्यक्तित्व महान था। वे बौद्ध शास्त्रों और भारतीय दर्शन दोनों के बहुत बड़े विद्वान थे। उन्हीं के कारण भारत में महायान की विजय हुई। महायान के ही सिद्धांतों का प्रचार चीन में हुआ। लंका और बर्मा (वर्तमान श्रीलंका और म्यांमार) हीनयान को मानते रहे। बाद में जब भारत में नयी जातियों का आगमन हुआ, तो ईसा की चौथी शताब्दी के आरंभ में विदेशियों का विरोध महान शासक ने, जिसका नाम भी चंद्रगुप्त था|

इस तरह ई. 320 में गुप्त साम्राज्य का युग आरंभ हुआ। इस साम्राज्य में एक के बाद एक कई महान शासक हुए, जो युद्ध और शांति, दोनों कलाओं में सफल हुए।

जिस बौद्ध धर्म का जन्म भारतीय विचार से हुआ था, उसके लिए भारत वह पुण्य भूमि थी जहाँ बुद्ध ने जन्म लिया, उपदेश दिया और वहीं उनका निर्वाण हुआ। पर बौद्ध धर्म मूल रूप में अंतरराष्ट्रीय था, विश्वधर्म था। जैसे-जैसे उनका विकास और विस्तार हुआ वैसे-वैसे उसका यह रूप और विकसित होता गया। इसलिए पुराने ब्राह्मण धर्म के लिए स्वाभाविक था कि वह बार-बार राष्ट्रीय पुनर्जागरण का प्रतीक बने।

यह धर्म और दर्शन भारत के भीतरी धर्मों और जातीय तत्वों के प्रति तो सहनशील और उदार था पर विदेशियों के प्रति उसकी उग्रता बराबर बढ़ती जाती थी और वह अपने आपको उनके प्रभाव से बचाने की कोशिश करता था। गुप्त शासकों का समय बहुत प्रबुद्ध, शक्तिशाली, अत्यंत सुसंस्कृत और तेजस्विता से भरपूर था। फिर भी उसमें साम्राज्यवादी प्रवृत्तियाँ विकसित हो गई। इनके बहुत बड़े शासक समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा गया है।

चौथी शताब्दी के आरंभ से लेकर डेढ़ सौ वर्ष तक गुप्त वंश ने उत्तर में एक बड़े शक्तिशाली और समृद्ध राज्य पर शासन किया। इसके बाद लगभग डेढ़ सौ वर्ष तक उनके उत्तराधिकारी अपने बचाव में लगे रहे और साम्राज्य सिकुड़कर लगातार छोटा होता चला गया। फिर हूणों का शासन हुआ| उत्तर भारत में हूणों का शासन बहुत थोड़े समय रहा-लगभग आधी-शताब्दी। उनमें से बहुत से लोग देश में छोटे-छोटे सरदारों के रूप में यहीं रह गए। वे कभी-कभी परेशानी पैदा करते थे और भारतीय जन समुदाय के सागर में जज़्ब होते जाते थे। इनमें से कुछ सरदार सातवीं शताब्दी के आरंभ में आक्रमणकारी हो गए।

उनका दमन करके कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने उत्तर से लेकर मध्य भारत तक एक बहुत शक्तिशाली राज्य की स्थापना की। वे कट्टर बौद्ध थे। उनका महायान संप्रदाय  अनेक रूपों में हिंदूवाद से मिलता-जुलता था। उन्होंने बौद्ध और हिंदू दोनों धर्मों को बढ़ावा दिया। उन्हीं के समय में प्रसिद्ध चीनी यात्री हुआन त्सांग (या युआन चान) भारत आया था (629 ई. में)। हर्षवर्धन कवि और नाटककार था। उसने अपने दरबार में बहुत से कलाकारों और कवियों को इकट्ठा किया और अपनी राजधानी उज्जयिनी को सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रसिद्ध केंद्र बनाया था। हर्ष की मृत्यु 648 ई. में हुई थी।

दक्षिण भारत

दक्षिण भारत में मौर्य साम्राज्य के सिमटकर अंत हो जाने के एक हज़ार साल से भी ज़्यादा समय तक बड़े-बड़े राज्य फूले-फले।

दक्षिण भारत अपनी बारीक दस्तकारी और समुद्री व्यापार के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था। उसकी गिनती समुद्री ताकतों में होती थी और इनके जहाज़ दूर देशों तक माल पहुँचाया करते थे। वहाँ यूनानियों की बस्तियाँ थीं और रोमन सिक्के भी वहाँ पाए गए।

उत्तरी भारत पर बार-बार होने वाले हमलों का सीधा प्रभाव दक्षिण पर नहीं पड़ा। इसका परोक्ष प्रभाव यह ज़रूर हुआ कि बहुत से लोग उत्तर से दक्षिण में जाकर बस गए। इन लोगों में राजगीर, शिल्पी और कारीगर भी शामिल थे। इस प्रकार दक्षिण पुरानी कलात्मक परंपरा का केंद्र बन गया और उत्तर उन नयी धाराओं से अधिक प्रभावित हुआ, जो आक्रमणकारी अपने साथ लाते थे।

शांतिपूर्ण विकास और युद्ध के तरीके

बार-बार हमलों और एक के बाद दूसरे साम्राज्य की स्थापना का जो संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत किया गया, उसके बीच देश में शांतिपूर्ण और व्यवस्थित शासन के लंबे दौर रहे हैं।

मौर्य, कुषाण, गुप्त और दक्षिण में आंध्र, चालुक्य, राष्ट्रकूट के अलावा और भी राज्य ऐसे हैं जो दो-दो, तीन-तीन सौ वर्षों तक कायम रहे। इनमें लगभग सभी राजवंश देशी थे। कुषाणों जैसे लोगों ने भी जो उत्तरी सीमा पार से आए थे, जल्दी अपने आपको इस देश और इसकी सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप ढाल लिया।

जब कभी दो राज्यों के बीच युद्ध या कोई आंतरिक राजनीतिक आंदोलन होता था, तो आम जनता की जीवनचर्या में बहुत कम हस्तक्षेप किया जाता था।

इस इतिहास के व्यापक सर्वेक्षण से इस बात का सेकेत मिलता हैं कि यहाँ शांतिपूर्ण और व्यवस्थित जीवन के लंबे दौर यूरोप की तुलना में कहीं अधिक हैं। यह धारणा भ्रामक है कि अंग्रेज़ी राज ने पहली बार भारत में शांति और व्यवस्था कायम की। अलबत्ता यह सही हैं कि जब भारत में अंग्रेज़ी शासन कायम हुआ, उस समय देश अवनति की पराकाष्ठा पर था। राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था टूट चुकी थी। वास्तव में यही कारण था कि वह राज यहाँ कायम हो सका।

प्रगति बनाम सुरक्षा

भारत में जिस सभ्यता का निर्माण किया गया उसका मूल आधार स्थिरता और सुरक्षा की भावना थी। इस दृष्टि से वह उन तमाम सभ्यताओं से कहीं अधिक सफल रही जिनका उदय पश्चिम में हुआ था। वर्ण-व्यवस्था और सेयुक्त परिवारों पर आधारित सामाजिक ढाँचे ने इस उद्देश्य को पूरा करने में सहायता की। यह व्यवस्था अच्छे-बुरे के भेद को मिटाकर सबको एक स्तर पर ले आती है और इस तरह व्यक्तिवाद की भूमिका इसमें बहुत कम रह जाती है। यह दिलचस्प बात है कि जहाँ भारतीय दर्शन अत्यधिक व्यक्तिवादी है और उसकी लगभग सारी चिंता व्यक्ति के विकास को लेकर है वहाँ भारत का सामाजिक ढाँचा सामुदायिक था और उसमें सामाजिक और सामुदायिक रीति-रिवाज़ों का कड़ाई से पालन करना पड़ता था।

इस सारी पाबंदी के बावजूद पुरे समुदाय को लेकर बहुत लचीलापन भी था। ऐसा कोई कानून या सामाजिक नियम नहीं था, जिसे रीति-रिवाज़ से बदला न जा सके। यह भी सेभव था कि नए समुदाय अपने अलग-अलग रीति-रवाज़ों, विश्वासों और जीवन व्यवहार को बनाए रखकर बड़े सामजिक संगठन के अंग बने रहें। इसी लचीलेपन ने विदेशी तत्वों को आत्मसात करने में सहायता की।

समन्वय केवल भारत में बाहर से आने वाले विभिन्न तत्वों के साथ नहीं किया गया, बल्कि व्यक्ति के बाहरी और भीतरी जीवन तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच भी समन्वय करने का प्रयास दिखाई पड़ता है। इस सामान्य सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ने भारत का निर्माण किया और इस पर विविधता के बावजूद एकता की मोहर लगाई। राजनीतिक ढाँचे के मूल में स्वशासी ग्राम व्यवस्था थी। राजा आते-जाते रहे पर यह व्यवस्था नींव की तरह कायम रही। बाहर से आने वाले नए लोग इस ढाँचे में सिर्फ सतही हलचल पैदा कर पाते थे। राज सत्ता चाहे देखने में कितनी निरंकुश लगती हो, रीति रिवाज़ों और वैधानिक बंधनों से कुछ इस तरह नियंत्रित रहती थी कि कोई शासक ग्राम समुदाय के सामान्य और विशेषाधिकारों में आसानी से दखल नहीं दे सकता था। इन प्रचलित अधिकारों के तहत समुदाय और व्यक्तित्व दोनों की स्वतंत्रता एक हद तक सुरक्षित रहत थी।

ऐसा लगता है कि ऐसे हर तत्व ने जो बाहर से भारत में आया और जिसे भारत ने जज़्ब कर लिया, भारत को कुछ दिया और उससे बहुत कुछ लिया। जहाँ वह अलग-थलग रहा, वहाँ वह अंततः नष्ट हो गया और कभी-कभी इस प्रक्रिया में उसने खुद को या भारत को नुकसान पहुँचाया।

भारत का प्राचीन रंगमच

भारतीय रंगमंच अपने मूल में, संबद्ध विचारों में और अपने विकास में पूरी तरह स्वतंत्र था। इसका मूल उद्गम ऋग्वेद की उन ऋचाओं और संवादों में खोजा जा सकता है जिनमें एक हद तक नाटकीयता है। रामायण और महाभारत में  नाटकों का उल्लेख मिलता हैं। कृष्ण-लीला से संबंधित गीत, संगीत और नृत्य में इसने आकार ग्रहण करना आरंभ कर दिया था। ई. पूर्व छठी या सातवीं शताब्दी के महान वैयाकरण पाणिनि ने कुछ नाट्य-रूपों का उल्लेख किया है।

रंगमंच की कला पर रचित नाट्यशास्त्र को ईसा की तीसरी शताब्दी की रचना कहा जाता है। ऐसे ग्रंथ की रचना तभी हो सकती थी, जब नाट्य कला पूरी तरह विकसित हो चुकी हो और नाटकों की सावर्जनिक प्रस्तुति आम बात हो।

अब यह माना जाने लगा है कि नियमित रूप से लिखे गए संस्कृत नाटक ई.पू. तीसरी शताब्दी तक पूरी तरह प्रतिष्ठित ही चुके थे। जो नाटक हमें मिले हैं उनमें पहले के ऐसे रचनाकारों और नाटकों का अक्सर हवाला दिया गया है जो अभी तक नहीं मिले हैं। ऐसे नाटककारों में एक भास था। इस शताब्दी के आरंभ में उसके तेरह नाटकों का एक संग्रह खोज में मिला हैं। अब तक मिले संस्कृत नाटकों में प्राचीनतम नाटक अश्वघोष के हैं। वह ईसवी सन् के आरंभ के ठीक पहले या बाद में हुआ था। ये ताड़ पत्र पर लिखित पांडुलिपियों के अंश मात्र हैं और आश्चर्य की बात यह कि ये गोबी रेगिस्तान की सरहदों पर तुर्फ़ान में मिले हैं। अश्वघोष धर्मपरायण बौद्ध हुआ। उसने बुद्धचरित नाम से बुद्ध की जीवनी लिखी। यह ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध हुआ और बहुत समय पहले भारत, चीन और तिब्बत में बहुत लोकप्रिय हुआ।

यूरोप की प्राचीन भारतीय नाटक के बारे में पहली जानकारी 1789 ई. में तब हुई जब कालिदास के शकुंतला का सर विलियम जोंस कृत अनुवाद प्रकाशित हुआ। सर विलियम जोंस के अनुवाद के आधार पर जर्मन, फ्रेंच, डेनिश और इटालियन में भी इसके अनुवाद हुए। गेटे पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा और उसने शकुंतला की अत्यधिक प्रशंसा की।

कालिदास को संस्कृत साहित्य का सबसे बड़ा कवि और नाटककार माना गया है। उसका समय अनिश्चित हैं, पर संभावना यही है कि वह चौथी शताब्दी के अंत में गुप्त वंश के चंद्रगुप्त (द्वितीय) विक्रमादित्य के शासन-काल में उज्जयिनी में था। माना जाता है कि वह दरबार के नौ रत्नों में से एक था। उसकी रचनाओं में जीवन के प्रति प्रेम और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति आवेग का भाव मिलता हैं।

कालिदास की एक लंबी कविता है मेघदूत। एक प्रेमी, जिसे बंदी बनाकर उसकी प्रेयसी से अलग कर दिया गया हैं, वर्षा ऋतु में, एक बादल से अपनी तीव्र चाहत का संदेश उस तक पहुँचाने के लिए कहता है।

कालिदास से काफी पहले संभवतः एक बहुत प्रसिद्ध नाटक की रचना हुई थी शूद्रक का मृच्छकटिकम् यानी मिट्टी की गाड़ी। यह एक कोमल और एक हद तक बनावटी नाटक हैं। लेकिन इसमें ऐसा सत्य हैं जो हमें प्रभावित करता है और हमारे सामने उस समय की मानसिकता और सभ्यता की झाँकी प्रस्तुत करता है।

400 ई. के लगभग, चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में एक और प्रसिद्ध नाटक लिखा गया। यह विशाखदत्त का नाटक मुद्राराक्षस था। यह विशुद्ध राजनीतिक नाटक था, जिसमें प्रेम या किसी पौराणिक कथा को आधार नहीं बनाया गया है। कुछ अर्थों में यह नाटक वर्तमान स्थिति में बहुत प्रासंगिक है।

राजा हर्ष, जिसने सातवीं सदी ई. में एक नया साम्राज्य कायम किया, नाटककार भी था। हमें उसके लिखे हुए तीन नाटक मिलते हैं। सातवीं सदी के आसपास ही भवभूति हुआ, जो संस्कृत साहित्य का चमकता सितारा था। वह भारत में बहुत लोकप्रिय हुआ और केवल कालिदास का ही स्थान उसके ऊपर माना जाता हैं।

संस्कृत नाटकों की यह धारा सदियों तक बहती रही लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में गुणात्मक दृष्टि से स्पष्ट रूप से उसमें ह्रास दिखाई देने लगा।

प्राचीन नाटकों की (कालिदास तथा अन्य लोगों के) भाषा मिली-जुली है-संस्कृत और उसके साथ एक या एकाधिक प्राकृत, यानी संस्कृत के बोलचाल में प्रचलित रूप। उसी नाटक में शिक्षित पात्र संस्कृत बोलते हैं और सामान्य अशिक्षित जन समुदाय, प्रायः स्त्रियाँ प्राकृत, हालाँकि उनमें अनुवाद भी मिलते हैं। यह साहित्यिक भाषा और लोकप्रिय कला के बीच समझौता था। फिर भी प्राचीन नाटक अक्सर राज-दरबारों या उसी प्रकार के अभिजात दर्शकों के लिए अभिजात्यवादी कला की प्रस्तुत करते हैं।

इस ऊँचे दर्जे के साहित्यिक रंगमंच के अलावा हमेशा एक लोकमंच भी रहा है। इसका आधार भारतीय पुराकथाएँ और महाकाव्यों से ली गई कथाएँ होती थीं। दर्शकों को इन विषयों की अच्छी तरह जानकारी रहती थी और इनका सरोकार नाटकीय तत्व से कहीं अधिक प्रस्तुति पर रहता था। ये अलग-अलग क्षेत्रों की बोलियों में रचे जाते थे, अतः उस क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रहते थे। दूसरी ओर संस्कृत नाटकों का चलन पूरे भारत में था क्योंकि उनकी भाषा पूरे भारत के शिक्षित समुदाय की भाषा थी।

संस्कृत भाषा की जीवंतता और स्थायित्व

संस्कृत अद्भुत रूप से समृद्ध भाषा हैं अत्यंत विकसित और नाना प्रकार से अलंकृत। इसके बावजूद वह नियत और व्याकरण के उस ढाँचे में सख्ती से जकड़ी है जिसका निर्माण 2600 वर्ष पहले पाणिनि ने किया था। इसका प्रसार हुआ, संपन्न हुई, भरी-पूरी और अलंकृत हुई, पर इसने अपने मूल को नहीं छोड़ा। संस्कृत साहित्य के पतन के काल में भाषा ने अपनी कुछ शक्ति और शैली की सादगी खो दी।

सर विलियम जोंस ने 1784 में कहा था-“ संस्कृत भाषा चाहे जितनी पुरानी होम उसकी बनावट अद्भुत है, यूनानी भाषा के मुकाबले यह अधिक पूर्ण है, लातीनी के मुकाबले अधिक उत्कृष्ट है और दोनों के मुकाबले अधिक परिष्कृत है। पर दोनों के साथ वह इतनी अधिक मिलती जुलती हैं कि यह संयोग आकस्मिक नहीं हो सकता। यह साफ़ पहचाना जा सकता है कि इन सभी भाषाओं का स्रोत एक ही हैं, जो शायद अब मौजूद नहीं रहा है।”

संस्कृत आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी है उनका अधिकांश शब्दकोश और अभिव्यक्ति का ढंग संस्कृत की दें है। सेस्कृत काव्य और दर्शन के बहुत से सार्थक और महत्त्वपूर्ण शब्द, जिनका विदेशी भाषाओं में अनुवाद नहीं किया जा सकता, आज भी हमारी लोक प्रचलित भाषाओं में जीवित हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय उपनिवेश और सेस्कृति

रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा था, “मेरे देश को जानने के लिए उस युग की यात्रा करनी होगी जब भारत ने अपनी आत्मा को पहचानकर अपनी भौतिक सीमाओं का अतिक्रमण किया।”

हमें केवल बीते हुए समय में जाने की ही ज़रूरत नहीं हैं, बल्कि तन से नहीं तो मन से एशिया के विभिन्न देशों की यात्रा करने की ज़रूरत हैं जहाँ भारत ने अनेक रूपों में अपना विस्तार किया था।

पिछली चौथाई सदी के दौरान दक्षिण-पूर्वी एशिया के इस दूर तक फैले क्षेत्र के इतिहास पर बहुत प्रकाश डाला गया है। इसे कभी कभी वृहत्तर भारत कहा गया है। लेकिन अब भी बहुत-सी कड़ियाँ नहीं मिलतीं। बहुत से अंतर्विरोध भी हैं। किंतु सामान्य रूप से सामग्री की कोई कमी नहीं है। भारतीय पुस्तकों के हवाले मिलते हैं, अरब यात्रियों के लिखे हुए वृत्तांत हैं और इन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है चीन से प्राप्त ऐतिहासिक विवरण। इसके अलावा बहुत से पुराने शिलालेख और ताम्र-पत्र हैं। जावा और बाली में भारतीय स्रोतों पर आधारित समृद्ध साहित्य है जिसमें अक्सर भारतीय महाकाव्यों और पुराकथाओं का भावानुवाद किया गया है। यूनानी और लातीनी स्रोतों से भी कुछ सूचनाएँ मिली हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर प्राचीन इमारतों के विशाल खंडहर हैं-विशेषकर अंगकोर और बोरोबुदुर में।

ईसा की पहली शताब्दी से लगभग 900 ईसवी तक उपनिवेशीकरण की चार प्रमुख लहरें दिखाई पड़ती हैं। इनके बीच-बीच में पूरब की ओर जाने वाले लोगों का सिलसिला अवश्य रहा होगा। इन साहसिक अभियानों की सबसे विशिष्ट बात यह थी कि इनका आयोजन स्पष्टतः राज्य द्वारा किया जाता था। दूर-दूर तक फैले इन उपनिवेशों की शुरुआत लगभग एक साथ होती थी और ये उपनिवेश युद्ध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थानों पर और भारतीय नामों के आधार पर किया गया। इस तरह जिसे अब कंबोडिया कहते हैं, उस समय कंबोज कहलाया।

जावा स्पष्ट रूप से ‘यवद्वीप’ या जी का टापू है। यह आज भी एक अन्न विशेष का नाम है। प्राचीन पुस्तकों में आए हुए नामों का सेबंध भी प्रायः खनिज, धातु या किसी उद्योग या खेती की पैदावार से होता है। इस नामकरण से खुद-ब-खुद ध्यान व्यापार की ओर जाता है।

यह व्यापार ईसा पूर्व तीसरी और दूसरी शताब्दियों में धीरे-धीरे बढ़ गया। इन साहसिक व्यवसायियों और व्यापारियों के बाद धर्म प्रचारकों का जाना शुरू हुआ होगा, क्योंकि यह समय अशोक के ठीक वाद का समय था। सेस्कृत की प्राचीन कथाओं से और यूनानी और अरबी दोनों में प्राप्त वृत्तांतों से पता लगता है कि भारत और सुदूर पूरब के देशों के बीच कम से कम ईसा की पहली शताब्दी में नियमित समुद्री व्यापार होता था।

यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में जहाज़ बनाने का उद्योग बहुत विकसित और उन्नति पर था। उस समय में बनाए गए जहाज़ों का कुछ व्यौरेवार वर्णन मिलता है। बहुत से भारतीय बंदरगाहों का उल्लेख मिलता है। दूसरी और तीसरी शताब्दी के दक्षिण भारतीय (आंध्र) सिक्कों पर दोहरे-पाल वाले जहाज़ों का चिह्न अंकित हैं। अजंता के भित्ति चित्रों में लंका-विजय और हाथियों को ले जाते हुए जहाज़ों के चित्र हैं।

महाद्वीप के देशों बर्मा, स्याम और हिंद-चीन पर चीन का प्रभाव अधिक था, टापुओं और मलय प्रायद्वीप पर भारत की छाप अधिक थी। आमतौर पर शासन-पद्धति और सामान्य जीवन-दर्शन चीन ने दिया और धर्म और कला भारत ने।

इन भारतीय उपनिवेशों का इतिहास तकरीबन तेरह सौ साल या इससे भी कुछ अधिक का है-ईसा की पहली या दूसरी शताब्दी से आरंभ होकर पंद्रहवीं शताब्दी के अंत तक।

विदेशों पर भारतीय कला का प्रभाव

भारतीय सभ्यता ने विशेष रूप से दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में अपनी जड़ें जमाई। इस बात का प्रमाण आज वहाँ सब जगह मिलता है, चंपा, अंगकोर, श्रीविजय, भज्जापहित और दूसरे स्थानों पर संस्कृत के बड़े-बड़े अध्ययन केंद्र थे। वहाँ जिन राज्यों का उदय हुआ उनके शासकों के नाम विशुद्ध भारतीय और संस्कृत नाम हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे विशुद्ध भारतीय थे, पर इसका अर्थ यह अवश्य है कि उनका भारतीयकरण किया गया था। राजकीय समारोह भारतीय ढंग से संस्कृत में संपन्न किए जाते थे। राज्य के सभी कर्मचारियों के पास संस्कृत की प्राचीन पदवियाँ थीं और इनमें से कुछ पदवियाँ और पदनाम न केवल थाईलैंड में बल्कि मलाया की मुस्लिम रियासतों में भी अभी तक चले आ रहे हैं। इंडोनेशिया के इन स्थानों के प्राचीन साहित्य भारतीय पुराकथाओं और गाथाओं से भरे हुए हैं। जावा और बाली के मशहूर नृत्य भारत से लिए गए हैं। बाली के छोटे से टापू ने अपनी भारतीय संस्कृति को अभी तक बहुत सीमा तक कायम रखा है, यहाँ तक कि हिंदू धर्म भी वहाँ चला आ रहा हैं। फिलिपीन द्वीपों में लेखन-कला भारत से ही गई है।

कंबोडिया में वर्णमाला दक्षिण भारत से ली गई हैं और बहुत से सेस्कृत शब्दों को थोड़े से हरे-फेर के साथ ले लिया गया हैं। दीवानी और फ़ौजदारी के कानून भारत के प्राचीन स्मृतिकार मनु के कानूनों के आधार पर बनाए गए हैं और इन्हें बौद्ध प्रभाव के कारण कुछ परिवर्तनों के साथ संहिताबद्ध करके कंबोडिया की आधुनिक कानून व्यवस्था में ले लिया गया है।

लेकिन भारतीय प्रभाव सबसे अधिक प्रकट रूप से प्राचीन भारतीय बस्तियों की भव्य कला और वास्तुकला में दिखाई पड़ता है। इस प्रभाव से अंगकोर और बोरोबुदुर की इमारतें और अद्भुत मंदिर तैयार हुए। जावा में बोरोबुदुर में बुद्ध की जीवन-कथा पत्थरों में उत्कीर्ण हैं। दूसरे स्थानों पर नक्काशी करके विष्णु, राम और कृष्ण की कथाएँ अंकित की गई हैं।

अंगकोरवट के विशाल मंदिर के चारों तरफ़ विशाल खंडहरों का विस्तृत क्षेत्र हैं। उसमें बनावटी झीलें, पोखरें और नहरें हैं जिनके ऊपर पुल बने हैं और एक बहुत बड़ा फाटक हैं जिस पर एक वृद्धाकार सिर पत्थर में खुदा है। यह एक आकर्षक मुस्कराता हुआ किंतु रहस्मय कंबोडियाई देवतुल्य चेहरा है। इस चेहरे की मुस्कान अद्भुत रूप से मोहक और विचलित करने वाली हैं।

अंगकोर की प्रेरणा भारत से मिली पर उसका विकास ख्मेर प्रतिभा ने किया, या कि दोनों के परस्पर मेल से यह अजूबा पैदा हुआ। कंबोडिया के जिस राजा ने इसे बनवाया उसका नाम जयवर्मन (सप्तम) था, जो ठेठ भारतीय नाम हैं।

भारतीय कला का भारतीय धर्म और दर्शन से इतना गहरा रिश्ता हैं कि जब तक किसी को उन आदर्शो की जानकारी न हो जिनसे भारतीय मानस शासित होता है तब तक उसके लिए इसको पूरी तरह सराहना सेभव नहीं है। भारतीय कला में हमेशा एक धार्मिक प्रेरणा होती हैं, एक पारदृष्टि होती हैं, कुछ वैसी ही जिसने सेभवतः यूरोप के महान गिरजाघरों के निर्माताओं को प्रेरित किया था। सौंदर्य की कल्पना आत्मनिष्ठ रूप में की गई है, वस्तुनिष्ठ रूप में नहीं; वह आत्मा से सेबंध रखने वाली चीज है, भले ही वह रूप या पदार्थ में भी आकर्षक आकार ग्रहण कर ले। यूनानियों ने सौंदर्य से निस्वार्थ भाव से प्रेम किया। उन्हें सौंदर्य में केवल आनंद ही नहीं मिलता था, वे उसमें सत्य के दर्शन भी करते थे। प्राचीन भारतीय भी सौंदर्य से प्रेम करते थे, पर वे हमेशा अपनी रचनाओं में कोई गहरा अर्थ भरने का प्रयत्न करते थे।

भारतीय कविता और सेगीत की तरह कला में भी कलाकार से यह उम्मीद की जाती थी कि वह प्रकृति की सभी मनोदशाओं से तादात्म्य स्थापित करे ताकि वह प्रकृति और विश्व के साथ मनुष्य के मूलभूत और स्थापत्य में हैं, जिस तरह चीन और जापान की विशेषता उनकी चित्रकला में हैं।

भारतीय संगीत, जो यूरोपीय सेगीत से बहुत भिन्न हैं, अपने ढंग से बहुत विकसित था। इस दृष्टि से भारत का बहुत विशिष्ट स्थान है और सेगीत के क्षेत्र में चीन और सुदूर पूर्व के अलावा उसने एशियाई सेगीत को बहुत दूर तक प्रभावित किया था।

एशिया के दूसरे देशों की तरह भारत में भी कला के विकास पर, गढ़ी हुई मूर्तियों के विरुद्ध धार्मिक पूर्वाग्रह का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। वेद मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे और बौद्ध धर्म में भी अपेक्षाकृत बाद के समय में ही बुद्ध की मूर्तियाँ और चित्र बनाए जा सके। मथुरा के संग्रहालय में बोधिसत्व की एक विशाल शक्तिशाली और प्रभावशाली पाषाण प्रतिमा हैं। इसका निर्माण ईसवी सन् के आरंभ के आस-पास कुषाण युग में हुआ था।

भारतीय कला अपने आरंभिक काल में प्रकृतिवाद से भरी हैं, जो कुछ अशों में चीनी प्रभाव के कारण हो सकता है। भारतीय कला के इतिहास की विभिन्न अवस्थाओं पर चीनी प्रभाव दिखाई पड़ता हैं।

चौथी से छठी शताब्दी ईसवी में गुप्तकाल के दौरान, जिसे भारत का स्वर्ग युग कहा जाता है, अजंता की गुफ़ाएँ खोदी गईं और उनमें भित्ति चित्र बनाए गए। बाग और बादामी की गुफ़ाएँ भी इसी काल की हैं।

अजंता हमें किसी स्वप्न की तरह दूर किंतु असल में एकदम वास्तविक दुनिया में ले जाती है। इन भित्ति चित्रों को बौद्ध भिक्षुओं ने बनाया था। बहुत समय पहले उनके स्वामी ने कहा था स्त्रियों से दूर रहीं, उनकी तरफ़ देखो भी नहीं, क्योंकि वे खतरनाक हैं। इसके बावजूद इन चित्रों में स्त्रियों की कमी नहीं है-सुंदर स्त्रियाँ, राजकुमारियाँ, गायिकाएँ, नर्तकियाँ, बैठी और खड़ी, शृंगारकरती हुईं या शोभा यात्रा में जाती हुईं। ये चित्रकार भिक्षु संसार को और जीवन के गतिशील नाटक को कितनी अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने ये चित्र उतने ही प्रेम से बनाए हैं जितने प्रेम से उन्होंने बोधिसत्व को उनकी शांत, लोकोत्तर गरिमा में चित्रित किया हैं।

सातवीं आठवीं शताब्दियों में ठोस चट्टान को काटकर एलोरा की विशाल गुफ़ाएँ तैयार हुईं, जिनके बीच में कैलाश का विशाल मंदिर है। यह अनुमान करना कठिन है कि इंसान ने इसकी कल्पना कैसे की होगी या कल्पना को रूपाकार कैसे दिया होगा। एलिफ़ेंटा की गुफ़ाएँ भी इसी समय की हैं जहाँ प्रभावशाली और रहस्मयी त्रिमूर्ति बनी है। दक्षिण भारत में महाबलीपुरम् की इमारतों का निर्माण भी इसी समय हुआ था।

एलिफेंटा की गुफ़ाओं में नटराज शिव की एक खंडित मूर्ति हैं, जिसमें शिव नृत्य की मुद्रा में हैं। हैवल का कहना है कि इस क्षत-विक्षत अवस्था में भी यह मूर्ति भीमाकार शक्ति का मूर्त रूप है और इसकी कल्पना अत्यंत विशाल हैं।

ब्रिटिश सेग्रहालय में विश्व का सृजन और नाश करते हुए नटराज शिव की एक और मूर्ति है। एप्सटीन न लिखा हैं कि उनकी विशाल लयात्मकता काल के विराट युगों का आह्वान करती हैं।

जावा में बॉरीबुदुर से बोधिसत्व का एक सिर कोपेनहेगन के ग्लिपटोटेक लें जाया गया है। रूपगत सौंदर्य की दृष्टि से तो यह सिर सुदर है ही, इसमें कुछ और गहरी बात है जो बोधिसत्व की शुद्ध आत्मा को इस तरह उद्घाटित करती है जैस दर्पण में प्रतिबिंब। वह एक ऐसा चेहरा है, जिसमें समुद्र की गहराइयों की प्रशांति, निरभ्र नीले आकाश की स्वच्छता और इंसानी पहुँच से परे का परम सौंदर्य मूर्तिमान हुआ है।

ईसवी सन् के पहले एक हज़ार वर्षों के दौरान, भारत का व्यापार दूर-दूर तक फैला हुआ था और बहुत से विदेशी बाज़ारों पर भारतीय व्यापारियों का नियंत्रण था। पूर्वी समुद्र के देशों में तो उनका प्रभुत्व था ही, उधर वह भूमध्य सागर तक भी फैला हुआ था।

भारत में बहुत प्राचीन काल से कपड़े का उद्योग बहुत विकसित हो चुका था। भारतीय कपड़ा दूर दूर के देशों में जाता था। रेशमी कपड़ा भी यहाँ काफ़ी समय से बनता रहा हैं। लेकिन वह शायद उतना अच्छा नहीं होता था जितना चीनी रेशम, जिसका आयात यहाँ ई.पू. चौथी शताब्दी से ही किया जाता था। भारतीय रेशम उद्योग ने बाद में विकास किया, लेकिन बहुत नहीं। कपड़े को रँगने की कला में उल्लेखनीय प्रगति हुई और पक्के रंग तैयार करने के खास तरीके खोज निकाले गए। इनमें से एक नील का रंग था, जिसे अंग्रेज़ी में ‘इंडिगों’ कहते हैं। यह शब्द इंडिया से बना है और अंग्रेज़ीं में यूनान के माध्यम से आया है।

ईसवीं सन् की आरंभिक शताब्दियों में भारत में रसायनशास्त्र का विकास और देशों की तुलना में शायद अधिक हुआ था। भारतीय, प्राचीन काल से ही फ़ौलाद को ताव देना जानते थे। भारतीय फ़ौलाद और लोहें की दूसरे देशों में बहुत कद्र की जाती थी, विशेष रूप से युद्ध के कामों में। भारतीयों को और बहुत-सी धातुओं की भी जानकारी थी और उनका इस्तेमाल किया जाता था। औषधियों के लिए धातुओं के मिश्रण तैयार किए जाते थे। आसव और भस्म बनाना ये लोग खूब जानते थे। औषध-विज्ञान काफ़ी विकसित था। मध्य युग तक प्रयोगों में काफ़ी विकास किया जा चुका था, गरचे ये प्रयोग मुख्य रूप से प्राचीन ग्रंथों पर आधारित थे। शरीर-रचना और शरीर-विज्ञान का अध्ययन किया जाता था और हार्वे से बहुत पहले रक्त-संचार की बात सुझाई जा चुकी थी।

खगोलशास्त्र, जो विज्ञानों में प्राचीनतम हैं, विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम का नियमित विषय था और फलित ज्योतिष की इससे मिला दिया जाता था। एक निश्चित पंचांग भी तैयार किया गया था जो लोग समुद्री-यात्रा पर निकलते थे, उनके लिए खगोलशास्त्र का ज्ञान व्यवहारिक दृष्टि से बहुत सहायक होता था।

यह कहना कठिन है कि उस समय तक यंत्रों ने कितनी प्रगति की थी, लेकिन जहाज़ बनाने का उद्योग खूब चलता था। इसके अलावा, विशेष रूप से युद्ध में काम आने वाली तरह-तरह की मशीनों के हवाले भी मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय भारत औज़ारों के निर्माण एवं प्रयोग में और रसायनशास्त्र एवं धातुशास्त्र संबंधी जानकारी में किसी देश से पीछे नहीं था। इसी कारण कई सदियों तक वह कई विदेशी मंडियों को अपने वश में रख सका।

प्राचीन भारत में गणितशास्त्र

यह माना जाता है कि आधुनिक अनगणित बीजगणित की नींव भारत में ही पड़ी थी। गिनती के चौखटे की इस्तेमाल करने की फूहड़ पद्धति, रोमन और उसी तरह की संख्याओं के इस्तेमाल ने बहुत समय तक प्रगति में बाधा दी, जबकि शून्यांक मिलाकर दस भारतीय संख्याओं ने मनुष्य की बुद्धि को इन बाधाओं से बहुत पहले मुक्त कर दिया था और अंकों के व्यवहार पर अत्यधिक प्रकाश डाला था। ये अंक चिह्न बेजोड़ थे और दूसरे देशों में प्रयोग किए जाने वाले तमाम चिह्नों से एकदम भिन्न थे।

भारत में ज्यामिति, अंकगणित और बीजगणित का आरंभ बहुत प्राचीन काल में हुआ था। शायद आरंभ में वैदिक वेदियों पर आकृतियाँ बनाने के लिए एक तरह के ज्यामितिक बीजगणित का प्रयोग किया जाता था। हिंदू संस्कारों में ज्यामितिक आकृतियाँ अब भी आमतौर पर काम में लाई जाती हैं। भारत में ज्यामिति का विकास अवश्य हुआ पर इस क्षेत्र में यूनान और सिकंदरिया आगे बढ़ गए। अंकगणित और बीजगणित में भारत आगे बना रहा। जिसे ‘शून्य’ या ‘कुछ नहीं’ कहा जाता हैं वह आरंभ में एक बिंदी या नुक्ते की तरह था। बाद में उसने एक छोटे वृत्त का रूप धारण कर लिया। उसे किसी भी और अंक की तरह एक अंक समझा जाता था।

शून्यांक और स्थान मूल्य वाली दशमलव विधि को स्वीकार करने के बाद अंकगणित और बीजगणित में तेज़ी से विकास करने की दिशा में कपाट खुल गए। बीजगणित पर सबसे प्राचीन ग्रंथ ज्योतिर्विद आर्यभट्ट का है, जिनका जन्म 427 ई. में हुआ था। भारतीय गणितशास्त्र में अगला महत्वपूर्ण नाम भास्कर (522 ई.) का और उसके बाद ब्रह्मपुत्र (628 ई.) का हैं। ब्रह्मपुत्र प्रसिद्ध खगोलशास्त्री भी था जिसने शून्य पर लागू होने वाले नियम निश्चित किए और इस क्षेत्र में और अधिक उल्लेखनीय प्रगति की। इसके बाद अंकगणित और बीजगणित पर लिखने वाले गणितज्ञों की परंपरा मिलती है। इनमें अंतिम महान नाम भास्कर द्वितीय का है, जिसका जन्म 1114 ई. में हुआ था। उसने खगोलशास्त्र, बीजगणित और अंकगणित पर क्रमशः तीन ग्रंथों की रचना की। अंकगणित पर उनकी पुस्तक का नाम लीलावती हैं, जो स्त्री का नाम होने के कारण गणित की पुस्तक के लिए विचित्र लगता है। विश्वास किया जाता है की लीलावती भास्कर की पुत्री थी गोकि इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। पुस्तक की शैली सरल और स्पष्ट हैं और छोटी उम्र के लोगों की समझ के लिए उपयुक्त है। इस पुस्तक का संस्कृत विद्यालयों में अब भी कुछ हद तक अपनी शैली के कारण इस्तेमाल किया जाता है।

आठवीं शताब्दी में खलीफ़ा अल्मंसूर के राज्यकाल में (753-774 ई.) कई भारतीय विद्वान बगदाद गए और अपने साथ वे जिन पुस्तकों को ले गए उनमें खगोलशास्त्र और गणित की पुस्तकें थीं। इन्होंने अरबी जगत में गणितशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र के विकास को प्रभावित किया और वहाँ भारतीय अंक प्रचलित हुए। बगदाद उस समय विद्याध्ययन का बड़ा केंद्र था और यूनानी और यहूदी विद्वान वहाँ एकत्र होकर अपने साथ यूनानी दर्शन, ज्यामिति और विज्ञान ले गए थे। मध्य एशिया से स्पेन तक सारी इस्लामी दुनिया पर बगदाद का सांस्कृतिक प्रभाव महसूस किया जा रहा था और अरबी अनुवादों के माध्यम से भारतीय गणित का ज्ञान इस व्यापक क्षेत्र में फैल गया था।

अरबी जगत से यह नया गणित, संभवतः स्पेन के मूर विश्वविद्यालयों के माध्यम से यूरोपीय देशों में पहुँचा और इससे यूरोपीय गणित की नींव पड़ी। यूरोप में इन नए अंकों का विरोध हुआ और इनके आमतौर पर प्रचलन में कई सौ वर्ष लग गए। इनका सबसे पहला प्रयोग, जिसकी जानकारी मिलती हैं, 1134 ई. में सिसली के एक सिक्के में हुआ। ब्रिटेन में इसका पहला प्रयोग 1490 ई. में हुआ।

विकास और ह्रास

ईसवी सन् के पहले हज़ार वर्षों में, भारत में आक्रमणकारी तत्वों और आंतरिक झगड़ों के कारण बहुत उतार-चढ़ाव आए। फिर भी यह समय ऊर्जा से उफनता और सभी दिशाओं में अपना प्रसार करते हुए कर्मठ राष्ट्रीय जीवन का समय रहा हैं। ईरान, चीन, यूनानी जगत, मध्य एशिया से उसका संपर्क बढ़ता है और इस सबसे बढ़कर पूर्वी समुद्रों की ओर बढ़ने की शक्तिशाली प्रेरणा पैदा होती है। परिणामस्वरूप भारतीय उपनिवेशों की स्थापना और भारतीय सीमाओं को पार कर दूर-दूर तक भारतीय संस्कृति का प्रसार होता हैं। इन हज़ार वर्षों के बीच के समय में यानी चौथी शताब्दी के आरंभ से लेकर छठी शताब्दी तक गुप्त साम्राज्य समृद्ध होता है। यह भारत का स्वर्ण युग कहलाता है। इस युग के संस्कृत साहित्य में एक प्रकार की प्रशांति, आत्मविश्वास और आत्मभिमान की दीप्ति और उमंग दिखाई पड़ती हैं।

स्वर्ण युग के समाप्त होने से पहले ही कमज़ोरी और ह्रास के लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं। उत्तर-पश्चिम से गोरे हूणों के दल के दल आते हैं और बार-बार वापस खदेड़ दिए जाते हैं। किंतु धीरे-धीरे वे उत्तर-भारत में अपनी राह बना लेते हैं और आधी शताब्दी तक पूरे उत्तर में अपने को राज सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित कर लेते हैं। इसके बाद, अंतिम गुप्त सम्राट मध्य भारत के एक शासक यशोवर्मन के साथ मिलकर, बहुत प्रयत्न करके हूणों को निकाल बाहर करता है।

इस लंबे संघर्ष ने भारत की राजनीतिक और सैनिक दोनों दृष्टियों से दुर्बल बना दिया। हूणों के उत्तर भारत में बस जाने के कारण लोगों में धीरे-धीरे एक अंदरूनी परिवर्तन घटित हुआ। हूणों के पुराने वृत्तांत कठोरता और बर्बर व्यवहार से भरे पड़े हैं। ऐसा व्यवहार जो युद्ध और शासन के भारतीय आदर्शा से एकदम भिन्न हैं।

सातवीं शताब्दी में हर्ष के शासनकाल में उज्जयिनी (आधुनिक उज्जैन), जो गुप्त शासकों की शानदार राजधानी थी, फिर से कला, संस्कृति और एक शक्तिशाली साम्राज्य का केंद्र बनती हैं। लेकिन आने वाली सदियों में वह भी कमज़ोर पड़कर धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। नौवीं शताब्दी में गुजरात का मिहिर भोज उत्तर और मध्य भारत में छोटे राज्यों को मिलाकर एक संयुक्त राज्य कायम करके कन्नौज को अपनी राजधानी बनाता है। एक बार फिर साहित्यिक पुर्जागरण होता है जिसके प्रमुख व्यक्तित्व राजशेखर हैं। ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में एक बार फिर, एक दूसरा भोज सामने आता हैं जो बहुत पराक्रमी और आकर्षक है और उज्जयिनी फिर एक बड़ी राजधानी बनती है। यह भोज बड़ा अद्भुत व्यक्ति था जिसने अनेक क्षेत्रों में प्रतिष्ठा हासिल की। वह वैयाकरण और कोशकार था। साथ ही उसकी दिलचस्पी भेषज और खगोलशास्त्र में थी। उसने इमारतों का निर्माण कराया और कला एवं साहित्य का संरक्षण किया। वह स्वयं कवि और लेखक था जिसके नाम से कई रचनाएँ मिलती हैं। उसका नाम महानता, विद्वता और उदारता के प्रतीक के रूप में लोक-कथाओं और किस्सों का हिस्सा बन गया हैं।

इन तमाम चमकदार टुकड़ों के बावजूद एक भीतरी कमज़ोरी ने भारत को जकड़ रखा है, जिससे उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा ही नहीं, बल्कि उसके रचनात्मक क्रियाकलाप भी प्रभावित होते दिखाई पड़ते हैं। यह प्रक्रिया बहुत धीमी गति से चलती रही और इसने दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत को जल्द प्रभावित किया। वस्तुतः दक्षिण, आक्रमणकारियों के लगातार हमलों का मुकाबला करने के दबाव से बचा रहा। उत्तर भारत की अनिश्चित स्थिति से बचाव के लिए बहुत से लेखक, कलाकार और वास्तुशिल्पी दक्षिण में जाकर बस गए। दक्षिण के शक्तिशाली राज्यों ने इन लोगों की रचनात्मक कार्य के लिए ऐसा अवसर दिया होगा जो उन्हें दूसरी जगह नहीं मिला।

गरचे उत्तरी भारत छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था, पर जीवन वहाँ समृद्ध था और वहाँ कई केंद्र सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से सक्रिय थे। हमेशा की तरह बनारस धार्मिक और दार्शनिक विचारों का गढ़ था। लंबे समय तक कश्मीर भी बौद्धों और ब्राह्मणों के संस्कृत ज्ञान का बहुत बड़ा केंद्र रहा। भारत में बड़े-बड़े विश्वविद्यालय रहे। इनमें सबसे प्रसिद्ध नालंदा था, जिसके विद्वानों का पूरे भारत में आदर किया जाता था। यहाँ चीन, जापान और तिब्बत से विद्यार्थी आते थे, बल्कि कोरिया, मंगोलिया और बुखारा से भी। धार्मिक और दार्शनिक विषयों (बौद्ध और ब्राह्मण दोनों के अनुसार) के अलावा दूसरे विषयों की शिक्षा भी दी जाती थी। कला और वास्तुशिल्प के विभाग थे, वैद्यक का विद्यालय था, कृषि विभाग था, डेरी फार्म था और पशु थे। विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रसार ज़्यादातर नालंदा के विद्वानों ने किया हैं।

इसके अलावा बिहार में आजकल के भागलपुर के पास विक्रमशिला और काठियावाड़ में वल्लभी विश्वविद्यालय थे। गुप्त शासकों के समय में उज्जयिनी विश्वविद्यालय का उत्कर्ष हुआ। दक्षिण में अमरावती विश्वविद्यालय था।

ज्यों-ज्यों सहस्राब्दी समाप्ति पर आती हैं यह सब सभ्यता के तीसरे पहर जैसा लगने लगता है। दक्षिण में अब भी तेजस्विता और शक्ति शेष थी और वह कुछ और शताब्दियों तक बनी रही। पर ऐसा लगता था जैसे हृदय स्तंभित हो चला हो, उनकी धड़कनें मंद होने लगी हों। आठवीं शताब्दी में शंकर के बाद कोई महान दार्शनिक नहीं हुआ। शंकर भी दक्षिण भारतीय थे। ब्राह्मण और बौद्ध दोनों धर्मों का ह्रास होने लगता है और पूजा के विकृत रूप सामने आने लगते हैं, विशेषकर तांत्रिक पूजा और योग-पद्धति के भ्रष्ट रूप।

साहित्य में भवभूति (आठवीं शताब्दी) आखिरी बड़ा व्यक्ति था। गणित में आखिरी बड़ा नाम भास्कर द्वितीय (बारहवीं शताब्दी) का हैं। कला में ई. वी. हैवेल के अनुसार सातवी या आठवीं शताब्दी से चौदहवीं शताब्दी तक भारतीय कला का महान युग था। यही समय यूरोप में गाथिक कला के चरम स्पष्ट रूप से सोलहवीं शताब्दी में होने लगा। मेरा खयाल हैं कला के क्षेत्र में भी उत्तर की अपेक्षा दक्षिण भारत में ही पुरानी परंपरा ज़्यादा लंबे समय तक कायम रहीं।

उपनिवेशों में बसने के लिए आखिरी बड़ा दल दक्षिण से नवीं शताब्दी में गया था, लेकिन दक्षिण के चोलवंशी ग्यारहवीं शताब्दी में तब तक एक बड़ी समुद्री शक्ति बने रहे जब तक उन्हें श्रीविजय ने परास्त करके उन पर विजय नहीं प्राप्त कर ली।

समय के साथ भारत क्रमशः अपनी प्रतिभा और जीवन शक्ति को खोता जा रहा था। यह प्रक्रिया बहुत धीमी थी और कई सदियों तक चलती रही। इसका आरंभ उत्तर में हुआ और अंत में यह दक्षिण पहुँच गई। इस राजनीतिक पतन और सांस्कृतिक गतिरोध के कारण क्या थे? राधाकृष्णन का कहना हैं कि भारतीय दर्शन ने अपनी शक्ति राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ खो दी।

यह सही हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता खो जाने से सांस्कृतिक ह्रास अनिवार्य रूप से शुरू हो जाता है। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता तभी छिनती है जब उससे पहले किसी तरह का ह्रास शुरू हो जाता है। भारत जैसा विशाल, अति विकसित और अत्यंत सभ्य देश बाह्य आक्रमण के सामने तभी हार मानेगा जब या तो भीतर से खुद पतनशील हो या आक्रमणकारी युद्धकौशल में उससे आगे हो। भीतरी ह्रास भारत में इन हज़ार वर्षों के अंत में बिलकुल स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

हर सभ्यता के जीवन में ह्रास और विघटन के दौर बार-बार आते हैं पर भारत ने उनसे बचकर नए सिरे से अपना कायाकल्प कर लिया। उसमें एक ऐसा सक्रिय अंतस्तल रहा जो नए संपर्को से अपने को हमेशा ताज़ा रूप देकर फिर से अपना विकास करता रहा। भारत में हमेशा से व्यवहार में रुढिवादिता और विचारों में विस्फोट का विचित्र संयोग रहा है।

सभ्यताओं के ध्वस्त होने के हमारें सामने बहुत से उदाहरण हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय उदाहरण यूरोप की प्राचीन सभ्यता का है जिसका अंत रोम के पतन के साथ हुआ।

भारतीय सभ्यता का ऐसा नाटकीय अंत न उस समय हुआ और न बाद में, किंतु उत्तरोतर पतन साफ़ दिखाई पड़ता है। शायद यह भारतीय समाज-व्यवस्था के बढ़ते हुए कट्टरपन और गैरमिलनसारी का अनिवार्य परिणाम था जिसे यहाँ की जाति-व्यवस्था में देखा जा सकता है। जहाँ भारतीय विदेश चले गए, जैसे दक्षिण पूर्वी एशिया में, वहाँ उनकी मानसिकता, रीति-रिवाज़ और अर्थव्यवस्था किसी में इतना कट्टरपन दिखाई नहीं पड़ता। अगले चार-पाँच सौ वर्ष तक वे इन उपनिवेशों में फले-फूले और उन्होंने तेजस्विता और रचनात्मक शक्ति का परिचय दिया। स्वयं भारत में गैरमिलनसारी की भावना ने उनकी रचनात्मकता को नष्ट कर दिया। जीवन निश्चित चौखटों में बँट गया, जहाँ हर आदमी का धंधा स्थायी और नियत हो गया। देश की सुरक्षा के लिए युद्ध करना क्षत्रियों का काम हो गया। ब्राह्मण और क्षत्रिय वाणिज्य-व्यापार को नीची नज़र से देखते थे। नीची जाति वालों को शिक्षा और विकास के अवसरों से वंचित रखा गया और उन्हें अपने से ऊँची जाति के लोगों के अधीन रहना सिखाया गया।

भारत के सामाजिक ढाँचे ने भारतीय सभ्यता को अद्भुत दृढ़ता दी थी। उसने गुटों को शक्ति दी और उन्हें एकजुट किया, लेकिन यह बात बृहत्तर एकता और विकास के लिए बाधक हुई। इसने दस्तकारी, शिल्प, वाणिज्य और व्यापार का विकास किया, लेकिन हमेशा अलग-अलग समुदायों के भीतर। इस तरह खास ढंग के धंधे पुश्तैनी बन गए और नए ढंग के कामों से बचने और पुरानी लकीर पीटते रहने की प्रवृत्ति पैदा हुई। इससे बड़ी संख्या में लोगों को विकास के अवसरों से वंचित करते हुए, उन्हें स्थायी रूप से समाज की सीढ़ी में नीचा दर्जा देकर यह मूल्य चुकाया गया।

इसी कारण हर तरफ़ ह्रास हुआ – विचारों में, दर्शन में, राजनीति में, युद्ध की पद्धति में, बाहरी दुनिया के बारे में जानकारी और उसके साथ संपर्क में। साथ ही क्षेत्रीयता के भाव बढ़ने लगे, भारत की अखंडता की अवधारणा के स्थान पर सामंतवाद और गिरोहबंदी की भावनाएँ बढ़ने लगीं अद्भुत दृढ़ता बची हुई थी और इसके साथ लचीलापन एवं अपने को ढालने की क्षमता। इसीलिए वह बचा रह सका, नए संपकों एवं विचारधाराओं का लाभ उठा सका और कुछ दिशाओं में प्रगति भी कर सका, लेकिन यह प्रगति अतीत के बहुत से अवशेषों से जकड़ी रही और बाधित होती रही।

प्रस्तुति – गुलाब चंद जैसल , केंद्रीय विद्यालय हरसिंहपुरा

जब सिनेमा ने बोलना सीखा

प्रश्न-1  जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर कौन-से वाक्य छापे गए? उस फिल्म में कितने चेहरे थे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:- देश की पहली बोलती फिल्म के विज्ञापन के लिए छापे गए वाक्य इस प्रकार थे –
”वे सभी सजीव हैं, साँस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इनसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो।”
इस प्रकार  ‘आलम आरा’ में कुल मिलाकर 78 चेहरे थे अर्थात 78 कलाकार  काम कर रहे थे।

प्रश्न-2 पहला बोलता सिनेमा बनाने के लिए फिल्मकार अर्देशिर एम. ईरानी को प्रेरणा कहाँ से मिली? उन्होंने आलम आरा फिल्म के लिए आधार कहाँ से लिया?विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:- फिल्मकार अर्देशिर एम. ईरानी ने 1929 में हॉलीवुड की एक बोलती फिल्म ‘शो बोट’ देखी   थी और तभी  से उनके मन में बोलती फिल्म बनाने की इच्छा जगी। इस फ़िल्म का आधार उन्होंने पारसी रंगमंच के एक लोकप्रिय नाटक से लिया। उसके गीतों को भी इस फिल्म में ज्यों – का त्यों रखा गया । 

प्रश्न-3  विट्ठल का चयन आलम आरा फिल्म के नायक के रूप हुआ लेकिन उन्हें हटाया क्यों गया? विट्ठल ने पुन: नायक होने के लिए क्या किया? विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर:- विट्ठल को फ़िल्म से इसलिए हटाया गया कि उन्हें उर्दू बोलने में परेशानी होती थी। पुन: अपना हक पाने के लिए उन्होंने मुकदमा कर दिया।  तत्कालीन सुप्रसिद्ध वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने उनका मुक़दमा लड़ा । विट्ठल मुकदमा जीत गए और भारत की पहली बोलती फिल्म के नायक बनें।

प्रश्न-4  पहली सवाक् फिल्म के निर्माता-निदेशक अर्देशिर को जब सम्मानित किया गया तब सम्मानकर्ताओ ने उनके लिए क्या कहा था? अर्देशिर ने क्या कहा?और इस प्रसंग में लेखक ने क्या टिप्पणी की है? लिखिए।
उत्तर:- पहली सवाक्‌ फिल्म के निर्माता-निर्देशक अर्देशिर को प्रदर्शन के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर सम्मानित किया गया और उन्हें ”भारतीय सवाक्‌ फिल्मों का पिता” कहा गया तो उन्होंने उस मौके पर कहा था, – ”मुझे इतना बड़ा खिताब देने की जरूरत नहीं है। मैंने तो देश के लिए अपने हिस्से का जरूरी योगदान दिया है।” इस प्रसंग की चर्चा करते हुए लेखक ने अर्देशिर को विनम्र व्यक्ति  कहा है।

प्रश्न-5  मूक सिनेमा में संवाद नहीं होते, उसमें दैहिक अभिनय की प्रधानता होती है। पर, जब सिनेमा बोलने लगा, उसमें अनेक परिवर्तन हुए। उन परिवर्तनों को अभिनेता, दर्शक और कुछ तकनीकी दृष्टि से पाठ का आधार लेकर खोजें, साथ ही अपनी कल्पना का भी सहयोग लें।
उत्तर:- मूक सिनेमा ने बोलना सीखा तो बहुत सारे परिवर्तन हुए। बोलती फिल्म बनने के कारण अभिनेताओं पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी हो गया क्योंकि अब उन्हें संवाद भी बोलने पड़ते थे। दर्शकों पर भी अभिनेताओं का प्रभाव पड़ने लगा। नायक-नायिका के लोकप्रिय होने से औरतें अभिनेत्रियों की केशसज्जा तथा उनके कपड़ों की नकल करने लगीं। दृश्य और श्रव्य माध्यम के एक ही फ़िल्म में समिश्रित हो जाने से तकनीकी दृष्टि से भी बहुत सारे परिवर्तन हुए जैसे जहाँ पहले  शूटिंग दिन में ही पूरी कर ली जाती थी , अब वह रात में भी होने लगी ।  हिंदी – उर्दू  मेल वाली ‘ हिन्दुस्तानी भाषा ‘ की लोकप्रियता बढ़ी ।  वाद्य – यंत्रों  और गीत- संगीत का प्रयोग भी बढ़ गया।  

प्रश्न-6 डब फिल्में किसे कहते हैं? कभी-कभी डब फ़िल्मों में अभिनेता के मुँह खोलने और आवाज़ में अंतर आ जाता है। इसका कारण क्या हो सकता है?
उत्तर:- फिल्मों में जब अभिनेताओं को दूसरे व्यक्ति की आवाज़ दी जाती है तो उसे डब करना   कहते हैं।
कभी-कभी फिल्मों में आवाज़ तथा अभिनेता के मुँह खोलने में अंतर आ जाता है क्योंकि डब करने वाले और अभिनय करने वाले की बोलने की गति समान नहीं होती या  कभी किसी तकनीकी दिक्कत के कारण हो जाता है।

• भाषा की बात
प्रश्न-7 सवाक् शब्द​ वाक् के पहले लगाने से बना है। स उपसर्ग से कई शब्द​ बनते हैं। निम्नलिखित शब्दों के साथ का उपसर्ग की भाँति प्रयोग करके शब्द बनाएँ और शब्दार्थ में होनेवाले परिवर्तन को बताएँ।
हित, परिवार, विनय, चित्र, बल, सम्मान।
उत्तर:-      उपसर्ग  

उपसर्गमूल शब्द अर्थ उपसर्ग युक्त शब्द उपसर्ग युक्त शब्दों के अर्थ 
हित   भलाई           सहित के साथ 
परिवारघर के लोगों का समूह सपरिवार परिवार के साथ 
स विनय प्रार्थना सविनय विनयपूर्वक 
स चित्र तस्वीर सचित्रचित्र सहित 

प्रश्न-8 उपसर्ग और प्रत्यय दोनों ही शब्दांश होते हैं। वाक्य में इनका अकेला प्रयोग नहीं होता। इन दोनों में अंतर केवल इतना होता है कि उपसर्ग किसी भी शब्द में पहले लगता है और प्रत्यय बाद में।
हिंदी के सामान्य उपसर्ग इस प्रकार हैं – अ/अन, नि, दु, क/कु, स/सु, अध, बिन, औ आदि।
पाठ में आए उपसर्ग और प्रत्यय युक्त शब्दों के कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं

मूल शब्दउपसर्गप्रत्ययशब्द
वाक्सवाक्
लोचनासुसुलोचना
फिल्मकारफिल्मकार
कामयाबकामयाबी

इस प्रकार के 15-15 उदाहरण खोजकर लिखिए और अपने सहपाठियों को दिखाइए।
उत्तर:-

मूल शब्दउपसर्गनया शब्द
पुत्रसुसुपुत्र
घटऔघट
सारअनुअनुसार
मुखआमुख
परिवारसपरिवार
नायकअधिअधिनायक
मरणआमरण
संहारउपउपसंहार
ज्ञानअज्ञान
यशसुसुयश
कोणसमसमकोण
कर्मसत्सत्कर्म
रागअनुअनुराग
बंधनिनिबंध
पकाअधअधपका
मूल शब्दप्रत्ययनया शब्द
चाचाऐराचचेरा
लेखलेखक
कालाइमा कालिमा 
लड़आईलड़ाई
सजआवटसजावट
अंशत:अंशत:
सुनारइनसुनारिन
जलजलज
परजीवीपरजीवी
खुदआईखुदाई
ध्यानपूर्वकध्यानपूर्वक
चिकनाआहटचिकनाहट
विशेषतयाविशेषतया
चमकईलाचमकीला
भारतईयभारतीय

जब सिनेमा ने बोलना सीखा
प्रदीप तिवारी

पाठ का सारांश- इस पाठ में भारतीय सिनेमा जगत में आए महत्त्वपूर्ण बदलाव को रेखांकित किया गया है। 14 मार्च 1931 की ऐतिहासिक तारीख को पहली बोलने वाली फ़िल्म ‘आलम आरा’ का प्रदर्शन हुआ। उससे पहले मूक फ़िल्में बनती थीं जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ करती थीं। इस तिथि के बाद भारतीय सिनेमा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

भारतीय सिनेमा जगत में फ़िल्म ‘आलम आरा’ को पहली सवाक् फ़िल्म होने का गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। 14 मार्च, 1931 को जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टर पर लिखा था-“वे सभी सजीव हैं, साँस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो।” इसी दिन भारतीय सिनेमा ने बोलना सीखा था, इसलिए यह महत्त्वपूर्ण दिन था। उस समय अवाक् फ़िल्मों की लोकप्रियता अपने चरम शिखर पर थी। लोकप्रियता के इस दौर में सवाक् फ़िल्मों का नया दौर शुरू हो चुका था।

पहली सवाक् फ़िल्म ‘आलम आरा’ के निर्माता अर्देशिर एम० ईरानी थे। उन्होंने ‘शो बोट’ नामक सवाक् फ़िल्म देखी और सवाक् फ़िल्म बनाने की सोची। उन्होंने पारसी रंगमंच के नाटक के आधार पर फ़िल्म की पटकथा बनाई तथा कई गाने ज्यों-के-त्यों रखे। इस फ़िल्म में कोई संगीतकार न होने से उन्होंने उसकी धुनें स्वयं बनाई। इसके संगीत के लिए तबला, हारमोनियम और वायलिन-इन्हीं तीन वाद्य-यंत्रों का प्रयोग किया गया। डब्ल्यू० एम० खान इसके पहले पाश्र्वगायक थे। इनके द्वारा गाया गया पहला गाना ‘दे दे खुदा के नाम पर प्यारे, गर देने की ताकत है था। इस फ़िल्म में साउंड था, इस कारण इसकी शूटिंग रात में करनी पड़ती थी। रात में शूटिंग होने के कारण कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था करनी पड़ी। यही प्रकाश प्रणाली आने वाली फ़िल्मों के निर्माण का आवश्यक हिस्सा बनी। इससे पूर्व मूक फ़िल्मों की शूटिंग दिन में पूरी कर ली जाती थी। इस फ़िल्म से एक ओर जहाँ अनेक तकनीशियन और कलाकार मिले वहीं अर्देशिर की कंपनी ने डेढ़ सौ से अधिक मूक तथा एक सौ से अधिक सवाक् फिल्में बनाई।

पहली सवाक् फ़िल्म ‘आलम आरा’ में हिंदी-उर्दू के मेल वाली हिंदुस्तानी भाषा तथा गीत-संगीत और नृत्य के अनोखे संयोजन ने इसे लोकप्रिय बनाया। जुबैदा इस फ़िल्म की नायिका थीं और नायक थे-विट्ठल। विट्ठल को उर्दू बोलने में मुश्किल होती थी। अपने समय के प्रसिद्ध नायक विट्ठल को इस कमी के कारण फ़िल्म से हटाकर मेहबूब को नायक बना दिया गया। विट्ठल ने मुकदमा कर दिया। मुकदमे में उनकी जीत ने उन्हें पुनः नायक बना दिया। इससे विट्ठल की सफलता और लोकप्रियता बढ़ती गई। उन्होंने लंबे समय तक नायक और स्टंटमैन के रूप में कार्य किया। इसके अलावा इस फ़िल्म में सोहराब मोदी, पृथ्वीराज कपूर, याकूब और जगदीश सेठी जैसे अभिनेताओं ने भी काम किया। 14 मार्च, 1931 को मुंबई के ‘मैजेस्टिक’ सिनेमा में प्रदर्शित यह फ़िल्म आठ सप्ताह तक ‘हाउसफुल’ चली। दस फुट लंबी तथा चार महीनों में तैयार इस फ़िल्म को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ लगी रहती थी। इसे देखने के लिए उमड़ी भीड़ को नियंत्रित करना पुलिस के लिए मुश्किल हो जाता था।

सवाक् फ़िल्मों का विषय पौराणिक कथाएँ, पारसी रंगमंच के नाटक, अरबी प्रेम-कथाएँ आदि हुआ करती थीं। सामाजिक विषय पर बनी फ़िल्म ‘खुदा की शान’ का एक किरदार महात्मा गाँधी जैसा था। इस कारण अंग्रेजों ने इस फ़िल्म पर गुस्सा प्रकट किया। सवाक् फ़िल्मों की शुरुआत के 25 साल बाद इसके निर्माता-निर्देशक अर्देशिर को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर जब उन्हें ‘भारतीय सवाक् फ़िल्मों का पिता’ कहा गया तो उन्होंने विनम्रता से कहाँ “मुझे इतना बड़ा खिताब देने की आवश्यकता नहीं है। मैंने तो देश के लिए अपने हिस्से का जरूरी योगदान दिया है।”

सवाक् फ़िल्मों के इस दौर में पढ़े-लिखे अभिनेताओं की जरूरत महसूस की गई। अब अभिनय के साथ-साथ संवाद भी बोलना पड़ता था, इसलिए गायन प्रतिभा को भी महत्त्व दिया जाने लगा। इस दौर में अनेक ‘गायक-अभिनेता’ पर्दे प आए। फ़िल्मों में हिंदी-उर्दू के मेलजोल वाली जन प्रचलित भाषा को महत्त्व मिला। सिनेमा में दैनिक और सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिंब अब बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया जाने लगा। इस समय अभिनेता-अभिनेत्रियों की लोकप्रियता का असर भी दर्शकों पर खूब पड़ रहा था। ‘माधुरी’ फ़िल्म की नायिका सुलोचना की हेयर स्टाइल खूब लोकप्रिय हुई। औरतें अपने बाल की केश-सज्जा सुलोचना की तरह करती थीं। यह फ़िल्म भारत के अलावा श्रीलंका, बर्मा (वर्तमान म्यांमार) और पश्चिम एशिया में खूब पसंद की गई।

भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के को भी सवाक् सिनेमा के जनक अर्देशिर ईरानी की उपलब्धि का सहार लेना पड़ा, क्योंकि सिनेमा का नया युग शुरू हो चुका था।

जब सिनेमा ने बोलना सीखा (अन्य प्रश्न)

प्रश्न-1 सवाक फिल्मों के आने से देह और तकनीक की भाषा की जगह कौन-सी भाषाओँ का फिल्मों में प्रवेश हुआ?

उत्तर- सवाक फिल्मों के आने से देह और तकनीक की भाषा की जगह जन प्रचलित बोलचाल की भाषाओं का प्रवेश हुआ।

प्रश्न-2 आलमआरा फिल्म ने किस भाषा को लोकप्रिय बनाया?

उत्तर- आलमआरा ने हिंदी-उर्दू के मेल वाली हिंदुस्तानी भाषा को लोकप्रिय बनाया।

प्रश्न-3 ‘स्टंटमैन’ व ‘फैटेसी’ शब्दों से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- स्टंटमैन का अर्थ है करतब दिखाने वाला व फैंटेसी का अर्थ है मौज-मस्ती।

प्रश्न-4 भारत की पहली सवाक् फ़िल्म कौन-सी थी? इस फ़िल्म के निर्माता कौन थे?

उत्तर- भारत की पहली सवाक् फ़िल्म ‘आलम आरा’ थी। इस फ़िल्म के निर्माता अर्देशिर एम० ईरानी थे, जिन्होंने चार माह से अधिक समय की कड़ी मेहनत से यह फ़िल्म तैयार की।

प्रश्न-5 जब भारत की पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर कौन-से वाक्य छापे गए? उस फिल्म में कितने चेहरे थे? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर लिखा था-‘वे सभी सजीव हैं, साँस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए; उनको बोलते; बातें करते देखो।’
‘अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए’ यह पंक्ति दर्शाती है कि फिल्म में अठहत्तर चेहरे थे अर्थात् फिल्म में अठहत्तर लोग काम कर रहे थे।

प्रश्न-6 ‘मूक सिनेमा’ से आप क्या समझते हैं ? इसकी लोकप्रियता में कमी क्यों आने लगी?

उत्तर- ‘मूक सिनेमा’ वे फ़िल्में होती थीं जिनमें कलाकार अभिनय करते थे। उनकी उछल-कूद, कलाबाजियाँ आदि हम देखते थे किंतु उनकी हँसी एवं संवाद नहीं सुन पाते थे। इसे ही ‘मूक सिनेमा’ कहते हैं। लोगों की सवाक् सिनेमा में रूचि बढ़ी और इसकी लोकप्रियता में कमी आती गई।

प्रश्न-7 दर्शकों हेतु यह फिल्म का अनोखा अनुभव कैसे थी?

उत्तर- ‘आलम आरा’ पहली ऐसी फिल्म थी जिसमें नायक-नायिकाओं ने स्वयं बोलकर विचारों को प्रस्तुत किया। यह लोगों के लिए अनोखा अनुभव थी। इस फिल्म में गीत-संगीत एवं नृत्य का अद्वितीय संयोजन था। यह एक मौज-मस्ती वाली फिल्म थी। मशहूर अभिनेत्री जुबेदा और अभिनेता बिट्ठल ने इसमें काम किया था। लोगों ने इस फिल्म को अत्यधिक पसंद किया। यही कारण था कि आठ सप्ताह तक हाउसफुल चला और फिर बाद में दूसरे देशों श्रीलंका, बर्मा और पश्चिम एशिया में भी चर्चित रही।

प्रश्न-8 निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
सवाक् फिल्मों के लिए पौराणिक कथाओं, पारसी रंगमंच के नाटकों, अरबी प्रेम-कथाओं को विषय के रूप में चुना गया। इनके अलावा कई सामाजिक विषयों वाली फिल्में भी बनीं। ऐसी ही एक फिल्म थी-‘खुदा की शान।’ इसमें एक किरदार महात्मा गांधी जैसा था। इसके कारण सवाक् सिनेमा को ब्रिटिश प्रशासकों की तीखी नज़र का सामना करना पड़ा।

  1. सवाक् फिल्मों के विषय क्या चुने गए?
    1. “किरदार’ शब्द से आप क्या समझते हैं?
    1. सवाक् सिनेमा को ब्रिटिश प्रशासकों की तीखी नज़र का सामना क्यों करना पड़ा?
    1. ब्रिटिश शासक क्या चाहते थे?
    1. ‘खुदा की शान’ फिल्म में किस किरदार की छाप थी?

उत्तर-

  1. सवाक् फिल्मों के विषय पौराणिक कथाएँ, पारसी रंगमंच के नाटक, अरबी प्रेम कथाएँ एवं सामाजिक विषय चुने गए।
    1. सवाक् सिनेमा को ब्रिटिश प्रशासकों की तीखी नज़र का सामना करना पड़ता था क्योंकि अंग्रेजी सरकार नहीं चाहती थी कि उसकी किसी भी कार्यविधि की झलक फिल्मों में दिखाई दे जिससे लोग उनके विरूद्ध हो।
    1. ‘किरदार’ शब्द का अर्थ है-किसी विशेष की भूमिका निभानी।
    1. उनकी कार्यविधि का अंश भी सिनेमा में छाप न रखे।
    1. महात्मा गाँधी।

प्रस्तुति-गुलाब चंद जैसल

समाचार लेखन

प्रश्न-1 समाचार की परिभाषा लिखिए|

उत्तर- समाचार ऐसी सम सामयिक घटनाओ, समस्याओं और विचारों पर आधारित होते हैं जिन्हें जानने की अधिक से अधिक लोगों में दिलचस्पी होती है और जिनका अधिक से अधिक लोगों पर प्रभाव पड़ता है। 

प्रश्न-1(अ) समाचार लेखन के कितने प्रकार होते हैं?

उत्तर- समाचार लेखन के निम्नलिखित प्रकार हैं–

  • स्थानीय समाचार
  • प्रादेशिक या क्षेत्रीय समाचार
  • राष्ट्रीय समाचार
  • अंतर्राष्ट्रीय समाचार
  • विशिष्ट समाचार
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प्रश्न-2  समाचार का इंट्रो लिखते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

उत्तर-इंट्रो समाचार का प्रारम्भिक एवं महत्त्वपूर्ण भाग होता है, जिसमें समाचार का समस्त सूचनात्मक भाग निहित होता है। इंट्रो के बाद का भाग तो मात्र विस्तार के लिए ही होता है। अत: इण्ट्रो प्रभावोत्पादक होना चाहिए व क्या, कब, कौन, कहाँ के समस्त तथ्यों का समावेश इसमें होना चाहिए। भाषा सहज परन्तु प्रभावशाली होनी चाहिए।

प्रश्न-3  समाचार लेखन की प्रक्रिया में उल्टा पिरामिड सिद्धांत क्या है?

उत्तर- उल्टा पिरामिड सिद्धांत समाचार लेखन का बुनियादी सिद्धांत है। यह समाचार लेखन का सबसे सरल, उपयोगी और व्यावहारिक सिद्धांत है। समाचार लेखन का यह सिद्धांत कथा या कहनी लेखन की प्रक्रिया के ठीक उलट है। इसमें किसी घटना, विचार या समस्या के सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों या जानकारी को सबसे पहले बताया जाता है, जबकि कहनी या उपन्यास में क्लाइमेक्स सबसे अंत में आता है। इसे उल्टा पिरामिड इसलिये कहा जाता है क्योंकि इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य या सूचना सबसे पहले आती है जबकि पिरामिड के निचले हिस्से में महत्वपूर्ण तथ्य या सूचना होती है। इस शैली में पिरामिड को उल्टा कर दिया जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सूचना पिरामिड के सबसे उपरी हिस्से में होती है आरै घटते हुये क्रम में सबसे कम महत्व की सूचनाये सबसे निचले हिस्से में होती है।

प्रश्न-4  टी वी समाचार के लिए क्या आवश्यक है? इसमें किन विशेष विषयों पर विशेष वुलेटिन तैयार किए जाते हैं?

उत्तर- टीवी समाचार तथ्यों पर आधारित होने चाहिए। इनमें स्पष्टता होना अत्यंत आवश्यक है। उसके अभाव में दर्शक भ्रमित हो जायेंगे। टी वी समाचार संक्षिप्त भी होने चाहिए तथा इसमें भाषा का प्रवाह तथा ऑडियो विजुअल में साम्य भी होना चाहिए। टी वी में विशेष विषयों पर केन्द्रित विशेष बुलेटिन भी तैयार किए जाते हैं जैसे क्राइम से जुड़ी खबरों के लिए क्राइम बुलेटिन, खेल की खबरों के लिए स्पोर्ट्स बुलेटिन तथा चुनाव का खबरों को दर्शाने के लिए चुनाव बुलेटिन।

प्रश्न-5  अखबार और टी.वी. के समाचार लेखन में क्या अन्तर है?

उत्तर- अखबार एक पठन माध्यम है और टी.वी. दृश्य-श्रव्य माध्यम। अखबार का सम्बन्ध मुख्य रूप से साक्षर वर्ग से होता है, जबकि टी.वी. का सम्बन्ध साक्षर व निरक्षर दोनों वर्गों से। दोनों माध्यमों की प्रकृति में अन्तर होने के कारण दोनों के लिए समाचार लेखन में अन्तर होता है। अखबार की भाषा बहुसंख्यक लोगों द्वारा समझी जाने वाली होनी चाहिए। समाचार का आकार उपलब्ध स्पेस के अनुसार होना चाहिए। आलेख में कोई गलती या अशुद्धि नहीं होनी चाहिए। टी.वी. के लिए समाचार लेखन की बुनियादी शर्त दृश्य के साथ लेखन है। दृश्य अर्थात् बिजुअल्स के अनुसार ही समाचार लिखा जाता है। टी.वी. पर समाचार के कुछ चरण होते हैं, जैसे-ब्रेकिंग न्यूज, ड्राइ एंकर, फोन इन, एंकर विजुअल्स, एंकर बाइट, लाइव व एंकर पैकेज। इन सभी रूपों को ध्यान में रखते हुए अपेक्षानुसार समाचार लिखा जाता है।

प्रश्न-6  समाचार-पत्रों में हार्ड न्यूज व सॉफ्ट न्यूज से क्या तात्पर्य है?

उत्तर- समाचार-पत्रों में विविध प्रकार की खबरें प्रकाशित होती हैं। सामान्यत: दुर्घटना, अपराध, आदि से सम्बन्धित खबरें, रोजमर्रा के घटनाक्रम, दुर्घटनाओं और अपराध से सम्बन्धित खबरें हार्ड न्यूज कहलाती हैं तथा मानवीय रुचि व मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी खबरें सॉफ्ट न्यूज कहलाती हैं।

प्रस्तुति-गुलाब चंद जैसल

क्या निराश हुआ जाए (प्रश्नोत्तर)

क्या निराश हुआ जाए

1. लेखक ने स्वीकार किया है कि लोगों ने उन्हें भी धोखा दिया है फिर भी वह निराश नहीं हैं। आपके विचार से इस बात का क्या कारण हो सकता है?
उत्तर:- 
लेखक ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन करते हुए कहा है कि उसने धोखा भी खाया है परंतु बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात नाम की चीज मिलती है। उसका मानना है कि अगर वह इन धोखों को याद रखेगा तो उसके लिए किसी का भी विश्वास करना बेहद कष्टकारी होगा और ऐसी घटनाएँ भी बहुत कम नहीं हैं ,जब लोगों ने अकारण उसकी सहायता की है, उसके निराश मन को ढाँढस दिया है और हिम्मत बँधाई है।लेखक जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति है ।टिकट बाबू द्वारा बचे हुए पैसे लेखक को लौटाना, बस कंडक्टर द्वारा दूसरी बस व बच्चों के लिए दूध लाना आदि ऐसी घटनाएँ हैं जो उसे विश्वास दिलवाती हैं कि समाज में मानवता,प्रेम, आपसी सहयोग समाप्त नहीं हो सकते।

2. दोषों का पर्दाफ़ाश करना कब बुरा रूप ले सकता है?
उत्तर :- दोषों का पर्दाफ़ाश करना तब बुरा रूप ले सकता है जब लोग किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करके उसमें रस लेते हैं । इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे किसी की बदनामी करना , आपसी दुश्मनी या बदले की भावना आदि ।

3. आजकल के बहुत से समाचार पत्र या समाचार चैनल दोषों का पर्दाफ़ाशकर रहे हैं। इस प्रकार के समाचारों और कार्यक्रमों की सार्थकता पर तर्क सहित विचार लिखिए?
उत्तर:- आजकल के बहुत से समाचार पत्र या समाचार चैनल ‘दोषों का पर्दाफ़ाश’ कर रहे हैं। इस प्रकार के पर्दाफाश से व्यक्ति समाज में व्याप्त बुराइयों से, अपने आस-पास के वातावरण तथा लोगों से अवगत हो जाते हैं और इसके कारण समाज में जागरूकता भी आती है । समाज समय रहते ही सचेत और सावधान हो जाता है पर ये तभी सार्थक हैं जब इनमें सच्चाई , ईमानदारी और जनकल्याण की कामना हो । यदि इनमें किसी प्रकार का स्वार्थ यथा – अपनी टी आर पी बढ़ाना, चैनल को प्रसिद्ध करना या धन कमाना आदि हो तो इन कार्यक्रमों की कोई सार्थकता नहीं हैं ।

4. निम्नलिखित के संभावित परिणाम क्या-क्या हो सकते हैं? आपस में चर्चा कीजिए, जैसे – ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है।परिणाम-भ्रष्टाचार बढ़ेगा।
1. ”
सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है।” …..
2. ”
झूठ और फरेब का रोज़गार करनेवाले फल-फूल रहे हैं।” …..
3. ”
हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है, गुणी कम।” …..
उत्तर:- 1. ”सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। – तानाशाही बढ़ेगी और लोगों की सच्चाई में आस्था नहीं रह जाएगी ।
2. ”झूठ और फरेब का रोज़गार करनेवाले फल-फूल रहे हैं।” – भ्रष्टाचार बढ़ेगा और ईमानदारी में किसी का विश्वास नहीं रहेगा ।
3. ”हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है, गुणी कम।” – एक दूसरे के प्रति अविश्वास बढ़ेगा।

5. लेखक ने लेख का शीर्षक क्या निराश हुआ जाएक्यों रखा होगा? क्या आप इससे भी बेहतर शीर्षक सुझा सकते हैं?
उत्तर:- लेखक ने इस लेख का शीर्षक ‘क्या निराश हुआ जाए’ उचित रखा है। आजकल हम अराजकता की जो घटनाएँ अपने आसपास घटते देखते रहते हैं, उनसे हमारे मन में निराशा भर जाती है लेकिन लेखक ने हमें उस समय समाज के मानवीय गुणों से भरे लोगों को और उनके कार्यों को याद करने कहा है जिससे हम निराश न हो।
इसका अन्य शीर्षक ‘हम निराशा से आशा’ भी रख सकते हैं।

6. यदि क्या निराश हुआ जाएके बाद कोई विराम चिहन लगाने के लिए कहा जाए तो आप दिए गए चिह्नों में से कौन-सा चिहन लगाएँगे? अपने चुनाव का कारण भी बताइए – , । . । ? ; – , ….
उत्तर:- ‘क्या निराश हुआ जाए’ के बाद मैं प्रश्न चिन्ह ‘क्या निराश हुआ जाए?’ लगाना उचित होगा । समाज में व्याप्त बुराइयों के बीच रहते हुए भी जीवन जीने के लिए सकारात्मक दृष्टि जरूरी है।

7. ”आदर्शों की बातें करना तो बहुत आसान है पर उन पर चलना बहुत कठिन है।क्या आप इस बात से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:- ”आदर्शों की बातें करना तो बहुत आसान है पर उन पर चलना बहुत कठिन है।” – मैं इस कथन से सहमत हूँ क्योंकि व्यक्ति जब आदर्शो की राह पर चलता है ,तब उसे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। असामाजिक तत्वों का अकेले सामना करना पड़ता है। वास्तव में लेखक हमसे या समाज से ही पूछना चाहता है कि यदि हम समाज की अच्छाइयों की ओर ध्यान दे तो क्या हमें निराश होने की आवयश्कता है ।

 भाषा की बात

8. दो शब्दों के मिलने से समास बनता है। समास का एक प्रकार है – द्वंद्व समास।
इसमें दोनों शब्द प्रधान होते हैं। जब दोनों भाग प्रधान होंगे तो एक-दूसरे में द्वंद्व (स्पर्धा, होड़) की संभावना होती है। कोई किसी से पीछे रहना नहीं चाहता,
जैसे – चरम और परम = चरम-परम, भीरु और बेबस = भीरू-बेबस। दिन और रात = दिन-रात।
औरके साथ आए शब्दों के जोड़े को औरहटाकर (-) योजक चिह्न भी लगाया जाता है। कभी-कभी एक साथ भी लिखा जाता है।
द्वंद्व समास के बारह उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर:-

सुख और दुखसुख-दुख
भूख और प्यासभूख-प्यास
हँसना और रोनाहँसना-रोना
आते और जातेआते-जाते
राजा और रानीराजा-रानी
चाचा और चाचीचाचा-चाची
सच्चा और झूठासच्चा-झूठा
पाना और खोनापाना-खोना
पाप और पुण्यपाप-पुण्य
स्त्री और पुरूषस्त्री-पुरूष
राम और सीताराम-सीता
आना और जानाआना-जाना

9. पाठ से तीनों प्रकार की संज्ञाओं के उदाहरण खोजकर लिखिए।
उत्तर:- व्यक्तिवाचक संज्ञा :गाँधी ,तिलक , भारत , मदन मोहन मालवीय

जातिवाचक संज्ञा : बस, यात्री, मनुष्य, ड्राइवर, कंडक्टर,हिन्दू, मुस्लिम, आर्य, द्रविड़, पति, पत्नी आदि।
भाववाचक संज्ञा : ईमानदारी, सच्चाई, झूठ, चोर, डकैत आदि।

                                     —-प्रस्तुति-गुलाब चंद जैसल

अपठित गद्यांश

अपठित गद्यांश का नमूना-

1. मैं जिस समाज की कल्पना करता हूँ, उसमें गृहस्थ संन्यासी और संन्यासी गृहस्थ होंगे अर्थात संन्यास और गृहस्थ के बीच वह दूरी नहीं रहेगी जो परंपरा से चलती आ रही है। संन्यासी उत्तम कोटि का मनुष्य होता है, क्योंकि उसमें संचय की वृत्ति नहीं होती, लोभ और स्वार्थ नहीं होता। यही गुण गृहस्थ में भी होना चाहिए। संन्यासी भी वही श्रेष्ठ है जो समाज के लिए कुछ काम करे। ज्ञान और कर्म को भिन्न करोगे तो समाज में विषमता उत्पन्न होगी ही मुख में कविता और करघे पर हाथ, यह आदर्श मुझे पसंद था। इसी की शिक्षा में दूसरों को भी देता हूँ और तुमने सुना है या नहीं की नानक ने एक अमीर लड़के के हाथ से पानी पीना अस्वीकार कर दिया था। लोगों ने कहा- ‘गुरु जी यह लड़का तो अत्यंत संभ्रांत कुल का है, इसके हाथ का पानी पीने में क्या दोष है?” नानक बोले- ‘तलहत्थी में मेहनत के निशान नहीं हैं। जिसके हाथ में मेहनत के ठेले पड़े नहीं होते उसके हाथ का पानी पीने में मैं दोष मानता हूँ।” नानक ठीक थे। श्रेष्ठ समाज वह है, जिसके सदस्य जी खोलकर मेहनत करते हैं और तब भी जरूरत से जयादा धन पर अधिकार जमाने की उनकी इच्छा नहीं होती।

प्रश्न- (क) ‘गृहस्थ संन्यासी और संन्यासी गृहस्थ होंगे ’ से लेखक का क्या आशय है ?

(ख) संन्यासी को उतम कोटि का मनुष्य कहा गया है , क्यों ?

(ग) श्रेष्ठ समाज के क्या लक्षण बताए गए हैं ?

(घ) नानक ने अमीर लड़के के हाथ से पानी पीना क्यों अस्वीकार किया ?

(ङ) ‘मुख में कविता और करघे पर हाथ- यह उक्ति किसके लिए प्रयोग की गई है और क्यों ?

(च) श्रेष्ठ संन्यासी के क्या गुण बताए गए हैं ?

(छ) समाज में विषमता से आप क्या समझते हैं और यह कब उत्पन्न होती है ?

(ज) संन्यासी शब्द का संधि-विच्छेद कीजिए।

(झ) विषमता शब्द का विलोम लिख कर उसमें प्रयुक्त प्रत्यय अलग कीजिए।

(ञ) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर- (क) गृहस्थ जन संन्यासियों की भाँति धन-संग्रह और मोह से मुक्त रहें तथा संन्यासी जन गृहस्थों की भाँति सामाजिक कर्मों में सहयोग करें, निठल्ले न रहें।

(ख) संन्यासी लोभ, स्वार्थ और संचय से अलग रहता है।

(ग) श्रेष्ठ समाज के सदस्य भरपूर परिश्रम करते हैं तथा आवश्यकता से अधिक धन पर अपना अधिकार नहीं जमाते।

(घ) अमीर लड़के के हाथों में मेहनतकश के हाथों की तरह मेहनत करने के निशान नहीं थे और नानक मेहनत करना अनिवार्य मानते थे।

(ङ) “मुख में कविता और करघे में हाथ” कबीर के लिए कहा गया है। क्योंकि उसके घर में जुलाहे का कार्य होता था और कविता करना उनका स्वभाव था।

(च) श्रेष्ठ संन्यासी समाज के लिए भी कार्य करता है।

(छ) समाज में जब ज्ञान और कर्म को भिन्न मानकर आचरण किए जाते हैं तब उस समाज में विषमता मान ली जाती है। ज्ञान और कर्म को अलग करने पर ही समाज में विषमता फैलती है।

(ज) सम् + न्यासी

(झ) विषमता – समता, ‘ता’ प्रत्यय

(ञ) संन्यास-गृहस्थ

2. वैदिक युग भारत का प्रायः सबसे अधिक स्वाभाविक काल था। यही कारण हैं कि आज तक भारत का मन उस काल की ओर बार-बार लोभ से देखता है। वैदिक आर्य अपने युग को स्वर्णकाल कहते थे या नहीं, यह हम नहीं जानते; किंतु उनका समय हमें स्वर्णकाल के समान अवश्य दिखाई देता हैं। लेकिन जब बौद्ध युग का आरंभ हुआ, वैदिक समाज की पोल खुलने लगी और चिंतकों के बीच उसकी आलोचना आरंभ हो गई। बौद्ध युग अनेक दृष्टियों से आज के आधुनिक आंदोलन के समान था। ब्राहमणों की श्रेष्ठता के विरुद्ध बुद्ध ने विद्रोह का प्रचार किया था, बुद्ध जाति-प्रथा के विरोधी थे और वे मनुष्य को जन्मना नहीं, कर्मणा श्रेष्ठ या अधम मानते थे। नारियों की भिक्षुणी होने का अधिकार देकर उन्होंने यह बताया था कि मोक्ष केवल पुरुषों के ही निमित्त नहीं है, उसकी अधिकारिणी नारियाँ भी हो सकती हैं। बुद्ध की ये सारी बातें भारत को याद रही हैं और बुद्ध के समय से बराबर इस देश में ऐसे लोग उत्पन्न होते रहे हैं, जो जाति-प्रथा के विरोधी थे, जो मनुष्य को जन्मना नहीं, कर्मणा श्रेष्ठ या अधम समझते थे। किंतु बुद्ध में आधुनिकता से बेमेल बात यह थी कि वे निवृत्तिवादी थे, गृहस्थी के कर्म से वे भिक्षु-धर्म को श्रेष्ठ समझते थे। उनकी प्रेरणा से देश के हज़ारों-लाखों युवक जो उत्पादन बढ़ाकर समाज का भरण-पोषण करने के लायक थे, संन्यासी हो गए। संन्यास की संस्था समाज-विरोधिनी संस्था है।

प्रश्न- (क) वैदिक युग स्वर्णकाल के समान क्यों प्रतीत होता है ?

(ख) जाति प्रथा एवं नारियों के विषय में बुद्ध के विचारों को स्पष्ट कीजिए।

(ग) बुद्ध पर क्या आरोप लगता है और उनकी कौन-सी बात आधुनिकता के प्रसंग में ठीक नहीं बैठती ?

(घ) संन्यास का अर्थ स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि इससे समाज को दया हानि पहुँचती है?

(ङ) बौद्ध युग का उदय वैदिक समाज के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए किस प्रकार हानिकारक था?

(च) बौद्ध धर्म ने नारियों को समता का अधिकार दिलाने में किसे प्रकार से योगदान दिया?

(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-

(i) उपसर्ग और मूल शब्द अलग-अलग करके लिखिए-

विद्रोह , संन्यास

(ii) प्रत्यय और मूल शब्द अलग-अलग करके लिखिए-

आधुनिकता , विरोधी

(ज) प्रस्तुत गद्यांश के लिए एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर- (क) वैदिक युग भारत का स्वाभाविक काल था। हमें प्राचीन काल की हर चीज अच्छी लगती

है। इस कारण वैदिक युग स्वर्णकाल के समान प्रतीत होता है।

(ख) बुद्ध जाति-प्रथा के विरुद्ध थे। उन्होंने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का विरोध किया। वे कर्म के अनुसार मनुष्य को श्रेष्ठ या अधम मानते थे। उन्होंने नारी को मोक्ष का अधिकारी माना।

(ग) बुद्ध पर निवृत्तिवादी होने का आरोप लगता है। उनकी गृहस्थ धर्म को भिक्षु धर्म से निकृष्ट मानने वाली बात आधुनिकता के प्रसंग में ठीक नहीं बैठती।

(घ) ‘सन्यास’ शब्द ‘सम् + न्यास’ शब्द से मिलकर बना है। ‘सम्’ यानी ‘अच्छी तरह से’ और ‘न्यास’ के लिए हथियार साबित हुए। इन सिद्धांतों के सामने तत्कालीन समाज के शीर्ष पर बैठे लोगों के सिद्धांत अविश्वसनीय प्रतीत होने लगे। फलतः बौद्ध युग का उदय उनके लिए हानिकारक साबित हुआ।

(च) वैदिक युग में नारियों को मोक्ष की अधिकारिणी नहीं माना जाता था। इस सिद्धांत को बुद्ध ने नारियों के समता के अधिकार में सबसे बड़ा रोड़ा समझा। अतः उन्होंने बोद्ध धर्म के अंतर्गत नारियों को भिक्षुणी होने का अधिकार देकर यह सिद्ध किया कि मोक्ष केवल पुरुषों के ही निमित्त नहीं है। इस पर नारियों का भी हक है। यह नारियों को समता का अधिकार दिलाने में काफी प्रभावी कदम साबित हुआ।

(छ) (i) उपसर्ग– वि, सम्

मूल शब्द– द्रोह, न्यास

(ii) प्रत्यय– ता, ई

मूल शब्द– आधुनिक, विरोध

(ज) शीर्षक– बुद्ध की विचारधारा की प्रासंगिकता।


3. संस्कृतियों के निर्माण में एक सीमा तक देश और जाति का योगदान रहता है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्रायः सभी सुसंस्कृत और सभ्य देशों में एक सीमा तक समान रहते हैं, किंतु बाह्य उपादानों में अंतर अवश्य आता है। राष्ट्रीय या जातीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परंपरा से संपृक्त बनाती है, अपनी रीति-नीति की संपदा से विच्छिन्न नहीं होने देती। आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के मिलन के अवसर अति सुलभ हो गए हैं, संस्कृतियों का पारस्परिक संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ ऐसे विदेशी प्रभाव हमारे देश पर पड़ रहे हैं, जिनके आतंक ने हमें स्वयं अपनी संस्कृति के प्रति संशयालु बना दिया है। हमारी आस्था डिगने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का फल हैं। अपनी संस्कृति को छोड़, विदेशी संस्कृति के विवेकहीन अनुकरण से हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो ठेस पहुँच रही है, वह किसी राष्ट्रप्रेमी जागरूक व्यक्ति से छिपी नहीं हैं। भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है। अतः आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी भी विदेशी संस्कृति के जीवंत तत्वों को ग्रहण करने में पीछे नहीं रहना चाहेंगे, किंतु अपनी सांस्कृतिक निधि की उपेक्षा करके नहीं। यह परावलंबन राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि सूर्य की आलोकप्रदायिनी किरणों से पौधे को चाहे जितनी जीवनशक्ति मिले, किंतु अपनी ज़मीन और अपनी जड़ों के बिना कोई पौधा जीवित नहीं रह सकता। अविवेकी अनुकरण अज्ञान का ही पर्याय है।

प्रश्न- (क) आधुनिक युग में संस्कृतियों में परस्पर संघर्ष प्रारंभ होने का प्रमुख कारण बताइए।

(ख) हम अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु क्यों हो गए हैं ?

(ग) राष्ट्रीय संस्कृति की हमारे प्रति सबसे बड़ी देन क्या है?

(घ) हम अपनी सांस्कृतिक संपदा की उपेक्षा क्यों नहीं कर सकते?

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश के लिए एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(च) हम विदेशी संस्कृति से क्या ग्रहण कर सकते हैं तथा क्यों ?

(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

प्रत्यय बताइए- जातीय , सांस्कृतिक।

पर्यायवाची बताइए-देश , सूर्य।

(ज) गद्यांश में युवाओं के किस कार्य को राष्ट्र की गरिमा के अनुकूल नहीं माना गया है तथा उन्हें क्या संदेश दिया गया है?

उत्तर- (क) आधुनिक युग में संस्कृतियों में परस्पर संघर्ष प्रारंभ होने का प्रमुख कारण यह है कि भिन्न संस्कृतियों के निकट आने के कारण अतिक्रमण एवं विरोध स्वाभाविक हैं।

(ख) हम अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु इसलिए हो गए हैं, क्योंकि नई पीढ़ी ने विदेशी संस्कृति के कुछ तत्वों को स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया है।

(ग) राष्ट्रीय संस्कृति की हमारे प्रति सबसे बड़ी देन यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परंपरा और रीति-नीति से जोड़े रखती है।

(घ) हम अपनी सांस्कृतिक संपदा की उपेक्षा नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने से हम जड़विहीन पौधे के समान हो जाएँगे।

(ङ) शीर्षक– भारतीय संस्कृति का वैचारिक संघर्ष।

(च) हम विदेशी संस्कृति के जीवंत तत्वों को ग्रहण कर सकते हैं, क्योंकि भारतीय संस्कृति में त्याग व ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है।

(छ) प्रत्यय-ईय, इक

पर्यायवाची– देश– राष्ट्र, राज्य। सूर्य– रवि, सूरज।

(ज) गद्यांश में युवाओं द्वारा विदेशी संस्कृति का अविवेकपूर्ण अंधानुकरण करना राष्ट्र की गरिमा के अनुकूल नहीं माना गया है। साथ-साथ युवाओं के लिए संदेश यह है कि उन्हें भारतीय संस्कृति की अवहेलना कर विदेशी संस्कृति का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।


4. जाति-प्रथा को यदि श्रम-विभाजन मान लिया जाए, तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित है। कुशल व्यक्ति या सक्षम श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना, दूसरे ही दृष्टिकोण जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पहले से ही अर्थात् गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।

जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्व निर्धारण ही नहीं करती, बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है, भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधे की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है? हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती हैं, जो उसका पैतृक पेशा न हों, भले ही वह उसमें पारंगत है। इस प्रकार पेशा-परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

प्रश्न- (क) कुशल श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए क्या आवश्यक हैं ?

(ख) जाति-प्रथा के सिद्धांत को दूषित क्यों कहा गया है ?

(ग) “जाति-प्रथा पेशे का न केवल दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण करती हैं , बल्कि मनुष्य को जीवनभर के लिए एक पेशे से बाँध देती है”-कथन पर उदाहरण-सहित टिप्पणी कीजिए।

(घ) भारत में जाति-प्रथा बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण किस प्रकार बन जाती है ?

(ङ) जाति-प्रथा के दोषपूर्ण पक्ष कौन-कौन से है ?

(च) जाति प्रथा बेरोजगारी का कारण कैसे बन जाती है ?

(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

(i) ‘इक’ और ‘इत’ प्रत्ययों से बने शब्द गद्यांश में से छाँटकर लिखिए।

(ii) समस्तपदों का विग्रह और समास का नाम लिखिए-

श्रम-विभाजन, माता-पिता

(ज) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर- (क) कुशल या सक्षम श्रमिक-समाज़ का निर्माण करने के लिए आवश्यक हैं कि हम जातीय जड़ता को त्यागकर प्रत्येक व्यक्ति को इस सीमा तक विकसित एवं स्वतंत्र करें, जिससे वह अपनी कुशलता के अनुसार कार्य का चुनाव स्वयं करे। यदि श्रमिकों को मनचाहा कार्य मिले, तो कुशल श्रमिक-समाज का निर्माण स्वाभाविक हैं।

(ख) जाति प्रथा का सिद्धांत इसलिए दूषित कहा गया है, क्योंकि वह व्यक्ति की क्षमता या रुचि के अनुसार उसके चुनाव पर अधारित नहीं है। वह पूरी तरह माता-पिता की जाति पर ही अवलंबित और निर्भर है।

(ग) जाति-प्रथा व्यक्ति की क्षमता, रुचि और इसके चुनाव पर निर्भर न होकर गर्भाधान के समय से ही, व्यक्ति की जाति का पूर्व निर्धारण कर देती है, जैसे-धोबी, कुम्हार, सुनार आदि।

(घ) उद्योग-धंधों की प्रक्रिया और तकनीक में निरंतर विकास और परिवर्तन हो रहा है, जिसके कारण व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की जरूरत पड़ सकती हैं। यदि वह ऐसा न कर पाए, तो उसके लिए भूखें मरने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह पाता।

(ङ) जाति-प्रथा के दोषपूर्ण पक्ष निम्नलिखित हैं-

– पेशे का दोषपूर्ण निर्धारण।

– अक्षम श्रमिक-समाज का निर्माण।

– देश-काल की परिस्थिति के अनुसार पेशा-परिवर्तन पर रोक।

(च) जाति-प्रथा बेरोजगारी का कारण तब बन जाती है, जब परंपरागत ढंग से किसी जाति विशेष के द्वारा बनाए जा रहे उत्पाद को आज के औद्योगिक युग में नई तकनीक द्वारा बड़े पैमाने पर तैयार किया जाने लगता है। ऐसे में उस जाति विशेष के लोग नई तकनीक के मुकाबले टिक नहीं पाते हैं। उनका परंपरागत पेशा छिन जाता है। फिर भी उन्हें जाति-प्रथा पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती। ऐसे में बेरोजगारी का बढ़ना स्वाभाविक है।

(छ) (i) प्रत्यय– इक, इत प्रत्यययुक्त शब्द– स्वाभाविक, आधारित

(ii)

समस्तपदसमास-विग्रहसमास का नाम
श्रम-विभाजनश्रम का विभाजनतत्पुरुष समास
माता-पितामाता और पिताद्वंद्व समास

5. विद्वानों का यह कथन बहुत ठीक है कि विनम्रता के बिना स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं। इस बात को सब लोग मानते हैं कि आत्मसंस्कार के लिए थोड़ी-बहुत मानसिक स्वतंत्रता परमावश्यक है चाहे उस स्वतंत्रता में अभिमान और नम्रता दोनों का मेल हो और चाहे वह नम्रता ही से उत्पन्न हो। यह बात तो निश्चित है कि जो मनुष्य मर्यादापूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहता है, उसके लिए वह गुण अनिवार्य है, जिससे आत्मनिर्भरता आती है और जिससे अपने पैरों के बल खड़ा होना आता है। युवा को यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि वह बहुत कम बातें जानता है, अपने ही आदर्श से वह बहुत नीचे है और उसकी आकांक्षाएँ उसकी योग्यता से कहीं बढ़ी हुई हैं। उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह अपने बड़ों का सम्मान करे, छोटों और बराबर वालों से कोमलता का व्यवहार करें, ये बातें आत्ममर्यादा के लिए आवश्यक हैं। यह सारा संसार, जो कुछ हम हैं और जो कुछ हमारा है-हमारा शरीर, हमारी आत्मा, हमारे भोग, हमारे घर और बाहर की दशा, हमारे बहुत से अवगुण और थोड़े गुण सब इसी बात की आवश्यकता प्रकट करते हैं कि हमें अपनी आत्मा को नम्र रखना चाहिए नम्रता से मेंरा अभिप्राय दब्बूपन से नहीं है, जिसके कारण मनुष्य दूसरों का मुँह ताकता है जिससे उसका संकल्प क्षीण और उसकी प्रज्ञा मंद हो जाती है; जिसके कारण वह आगे बढ़ने के समय भी पीछे रहता है और अवसर पड़ने पर चट-पट किसी बात का निर्णय नहीं कर सकता। मनुष्य का बेड़ा उसके अपने ही हाथ में है, उसे वह चाहे जिधर ले जाए। सच्ची आत्मा वही हैं, जो प्रत्येक दशा में, प्रत्येक स्थिति के बीच अपनी राह आप निकालती हैं।

प्रश्न- (क) ‘विनम्रता के बिन स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं।’ इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

(ख) मर्यादापूर्वक जीने के लिए किन गुणों का होना आनिवार्य है और क्यों?

(ग) नम्रता और दब्बूपन में क्या अंतर हैं ?

(घ) दब्बूपन व्यक्ति के विकास में किस प्रकार बाधक होता है ? स्पष्ट कीजिए।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(च) आत्ममर्यादा के लिए कौन-सी बातें आवश्यक हैं ? इससे व्यक्ति को क्या लाभ होता है ?

(छ) आत्मा को नम्र रखने की आवश्यकता किनकी किनकी होती है ?

(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

(i) नम्रता , अनिवार्य का विलोम लिखिए।

(ii) ‘अभिमान’ और ‘संकल्प’ में प्रयुक्त उपसर्ग एवं मूल शब्द लिखिए।

उत्तर- (क) किसी भी व्यक्ति में स्वतंत्रता का भाव आते ही उसके मन में अहंकार आ जाता है। इस अहंकार के कारण वह अपनी मनुष्यता खो बैठता है। इससे व्यक्ति के आचरण में इतना बदलाव आ जाता है कि वह दूसरों को खुद से हीन समझने लगता है। ऐसे में स्वतंत्रता के साथ विनम्रता का होना आवश्यक हैं, अन्यथा स्वतंत्रता अर्थहीन हो जाएगी।

(ख) मर्यादापूर्वक जीवन जीने के लिए मानसिक स्वतंत्रता आवश्यक है। इस स्वतंत्रता के साथ नम्रता का मेल होना आवश्यक हैं। इससे व्यक्ति में आत्मनिर्भरता आती है। आत्मनिर्भरता के कारण वह परमुखापेक्षी नहीं रहता है। उसे अपने पैरों पर खड़ा होने की कला आ जाती है।

(ग) दब्बूपन में व्यक्ति का संकल्प व बुद्धि क्षीण होती है, वह त्वरित निर्णय नहीं ले सकता। वह अपने छोटे छोटे कार्यों तथा निर्णय लेने के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है। इसके विपरीत नम्रता में व्यक्ति स्वतंत्र होता है। वह नेतृत्व करने वाला होता है। वह अपने निर्णय खुद लेता है और दूसरे का मुँह देखने के लिए विवश नहीं होता है।

(घ) दब्बूपन व्यक्ति के विकास में बाधक होता है क्योंकि इसके कारण मनुष्य दूसरे का मुँह ताकता है। वह निर्णय नहीं ले पाता। वह अपने संकल्प पर स्थिर नहीं रह पाता है। उसकी बुद्धि कमजोर हो जाती है। इससे मनुष्य आगे बढ़ने की बजाय पीछे रह जाता है।

(ङ) शीर्षक– विनम्रता का महत्व।

(च) आत्ममर्यादा के लिए अपने बड़ो का सम्मान करना, छोटों और बराबर वालों से कोमलता का व्यवहार करना आवश्यक है। इससे व्यक्ति को यह लाभ होता है कि वह आत्मसंस्कारित होता हैं, विनम्र और मर्यादित जीवन जीता हैं तथा उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद मिलती हैं।

(छ) आत्मा को नम्र रखने की आवश्यकता इस सारे संसार के लिए, जो कुछ हम हैं और जो कुछ हमारा है, आदि से में प्रकट करते हैं। अर्थात् हमारा शरीर, हमारी आत्मा, हम जो कुछ खाते-पीते हैं, हमारे घर और बाहर की दशा, हमारे बहुत से अवगुण यहाँ तक कि कुछ गुण भी आत्मा की नम्र रखने की आवश्यकता प्रकट करते हैं।

(ज) (i) शब्द विलोम

नम्रता उद्दंडता

अनिवार्य ऐच्छिक

(ii)शब्द उपसर्ग मूलशब्द

अभिमान अभि मान

संकल्प सम् कल्प


6. तुलसी जैसा कवि काव्य की विशुद्ध, मनोमयी, कल्पना-प्रवण तथा शृंगारात्मक भावभूमियों के प्रति उत्साही नहीं हो सकता। उनका संत-हृदय परम कारुणिक राम के प्रति ही उन्मुख हो सकता है, जो जीवन के धर्ममय सौंदर्य, मर्यादापूर्ण शील और आत्मिक शौर्य के प्रतीक हैं। विजय-रथ के रूपक में उन्होंने संत जीवन की रूपरेखा उभारी हैं और अपनी रामकथा को इसी संतत्व की चरितार्थता बना दिया है। उनका काव्य भारतीय जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा मर्यादित जीवन-चर्या अथवा ‘संत-रहनि’ को वाणी देता है। धर्ममय जीवन की आकांक्षा भारतीय संस्कृति का वैशिष्ठ्य है। तुलसी के काव्य में धर्म का अनाविल, अनावरण और अक्षुण्ण रूप ही प्रकट हुआ है। मध्ययुग की आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व करते हुए भी उनका काव्य भारतीय आत्मा के चिरंतन सौंदर्य का प्रतिनिधि है, जो सत्य, तप, करुणा और मैत्री में ही आरोहण के देवधर्मी मूल्यों को अनावृत करता है। उनके काव्य में हमें श्रेष्ठ कवित्व ही नहीं मिलता, उसके आधार पर हम संत-कवित्व की रूपरेखा भी निर्धारित कर सकते हैं। भक्ति उनके संतत्व की आतरिक भाव-साधना है। इस भाव-साधना की वाणी की अप्रतिम क्षमता देकर उन्होंने निष्कम्प दीपशिखा की भाँति अपनी काव्य-कला को निःसंग और निर्वैयक्तिक दीप्ति से भरा है।

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक बताइए।

(ख) कवि तुलसी में किसके प्रति उत्साह नहीं है ? तुलसी के काव्य की विशेषता का उल्लेख कीजिए।

(ग) गद्यांश में तुलसी के राम की क्या विशेषताएँ बताई गई हैं ?

(घ) ‘संत-रहनि’ का आशय स्पष्ट करते हुए भारतीय जीवन में इसकी महत्ता स्पष्ट कीजिए।

(ङ) तुलसी के काव्य में देवधर्मी मूल्य किस प्रकार अनावृत हुए हैं ?

(च) तुलसी की भक्ति साधना पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

(छ) तुलसी के काव्य में धर्म किस रूप में प्रकट हुआ है ? स्पष्ट कीजिए।

(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

(i ) पर्यायवाची बताइए- संत, वाणी।

(ii) प्रत्यय पृथक कर मूल शब्द बताइए- करुणिव, मयादित।

उत्तर- (क) शीर्षक– संत कवि तुलसीदास।

(ख) तुलसी के काव्य में विशुद्ध मन की उपज, काल्पनिकता की अधिकता तथा शृंगारिक भावभूमियों के प्रति अत्यधिक लगाव नहीं है। उनके काव्य में राम के प्रति उन्मुखता है। तुलसी के संत हृदय का असर उनके काव्य पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

(ग) गद्यांश में तुलसी के राम को आदर्श पुरूष बताते हुए, उन्हें धर्ममय सौंदर्ययुक्त कहा गया है। उनका शील मर्यादापूर्ण तथा उनमें वीरता एवं करूणा कूट-कूटकर भरी है।

(घ) ‘संत-रहनि’ का आशय है-संतों जैसी जीवन शैली या संतों जैसा जीवन जीना। भारतीय जीवन में संतों जैसी मर्यादित जीवन-चर्या की आकांक्षा की गई है। ऐसी जीवन-चर्या भारतीय संस्कृति की विशेषता एवं धर्ममय रही है।

(ङ) तुलसी के काव्य में आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व है, जिसमें भारतीय काव्य-आत्मा के चिरंतन सौंदर्य के दर्शन होते हैं। इसमें निहित सत्य तप, करुणा और मित्रता के आरोहण में देवधर्मी मूल्यों का आरोहण किया गया है।

(च) तुलसी के काव्य में उनके संतत्व और भक्ति साधना का मणिकांचन योग है। इसी भक्ति-साधना की वाणी को अद्वतीय क्षमता से युक्त कर उसे उस दीपशिखा के समान प्रज्वलित कर दिया है, जिसकी लौ युगों-युगों तक प्रकाश फैलाती रहेगी।

(छ) तुलसी के काव्य में धर्म अपने पंकरहित, निष्कलंकित, खुले रूप में, अक्षुण्ण या अपने संपूर्ण रूप में प्रकट हुआ है। काव्य में धर्म का जो रूप है, उसके मूल में लोक कल्याण की भावना भी समाहित किए हुए है।

(ज) (i) शब्द पर्यायवाची

संत साधू, अवधूत

वाणी वचन, वाक्शक्ति

(ii) शब्द मूल शब्द प्रत्यय

कारुणिक करुणा इक

मर्यादित मर्यादा इत


7. संस्कृति ऐसी चीज़ नहीं, जिसकी रचना दस-बीस या सौ-पचास वर्षो में की जा सकती हो। हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है; यहाँ तक कि हमारे उठने-बैठने, पहनने-ओढ़ने, घूमते-फिरने और रोने-हँसने से भी हमारी संस्कृति की पहचान होती है, यद्यपि हमारा कोई एक काम हमारी संस्कृति का पर्याय नहीं बन सकता। असल में, संस्कृति जाने का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं। इसलिए, जिस समाज में हम पैदा हुए हैं अथवा जसी समाज से मिलकर हम जी रहे हैं, उसकी संस्कृति हमारी संकृति है; यद्यपि अपने जीवन में हम जो संस्कारजमा कर रहे हैं, वे भी हमारी संस्कृति के अंग बन जाते हैं और मरने के बाद हम अन्य वस्तुओं के साथ अपनी संस्कृति की विरासत भी अपनी संतानों के लिए छोड़ जाते हैं। इसलिए, संस्कृति वह चीज मानी जाती है, जो हमारे सारे जीवन को व्यापे हुए है तथा जिसकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है। यही नही, बल्कि संस्कृति हमारा पीछा जन्म-जन्मांतर तक करती है। अपने यहाँ एक साधारण कहावत है कि जिसका जैसा संस्कार है, वैसा ही पुर्नजन्म भी होती है। जब हम किसी बालक या बालिका को बहुत तेज पाते हैं, तब अचानक कह देते हैं कि वह पूर्वजन्म का संस्कार है। संस्कार या संस्कृति, असल में, शरीर का नहीं, आत्मा का गुण है; और जबकि सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छुट जाता है, तब भी हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक बताइए।

(ख) संस्कृति के बारे में लेखक क्या बताता है?

(ग) स्पष्ट कीजिए कि संस्कृति जीने का एक तरीका है।

(घ) संस्कृति एवं सभ्यता में अंतर स्पष्ट कीजिए।

(ङ) संस्कृति पूर्वजन्म का संस्कार है। इसे बताने के लिए लेखक ने क्या उदाहरण दिया है?

(च) संस्कृति की रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है-स्पष्ट कीजिए।

(छ) संस्कृति जीने का तरीका क्यों है?

(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-

(i) संस्कृति जीने का तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर समाज में छाया रहता है-मिश्र वाक्य बनाइए।

(ii) विलोम बताइए- छाया, जीवन

उत्तर- (क) शीर्षक-सभ्यता और संस्कृति।

(ख) संस्कृति के बारे में लेखक बताता है कि इसकी रचना दस-बीस या सौ-पचास साल में नहीं की जा सकती है। इसके बनने में सदियाँ लग जाती हैं। इसके अलावा हमारे दैनिक कार्य-व्यवहार में हमारी संस्कृति की झलक मिलती है।

(ग) मनुष्य के अत्यंत साधारण से काम, जैसे- उठने-बैठने, पहनने-ओढ़ने, घुमने-फिरने और रोने-हँसने के तरीके में भी उसकी संस्कृति की झलक मिलती है। यद्यपि किसी एक काम को संस्कृति का पर्याय नहीं कहा जा सकता है, फिर भी हमारे कामों से संस्कृति की पहचान होती है, अतः संस्कृति जीने का एक तरीका है।

(घ) संस्कृति और सभ्यता का मूल अंतर यह होता है कि संस्कृति हमारे सारे जीवन में समाई हुई है। इसका प्रभाव जन्म-जन्मांतर तक देखा जा सकता है। इसका संबंध परलोक से है, जबकि सभ्यता का संबंध इसी लोक से है। इसका अनुमान व्यक्ति के जीवन-स्तर को देखकर लगाया जाता है।

(ङ) संस्कृति पूर्वजन्म का संस्कार है, इसे बताने के लिए लेखक ने यह उदाहरण दिया है कि व्यक्ति का पुनर्जन्म भी उसके संस्कारों के अनुरूप ही होता है। जब हम किसी बालक-बालिका को बहुत तेज पाते हैं, तो कह बैठते हैं कि ये तो इसके पूर्वजन्म के संस्कार हैं।

(च) व्यक्ति अपने जीवन में जो संस्कार जमा करता है वे संस्कृति के अंग बन जाते हैं। मरणोपरांत व्यक्ति अन्य वस्तुओं के अलावा इस संस्कृति को भी छोड़ जाता है, जो आगामी पीढ़ी के सारे जीवन में व्याप्त रहती है। इस तरह उसकी रचना और विकास में सदियों के अनुभवों का हाथ होता है।

(छ) व्यक्ति के उठने-बैठने, जीने के ढंग उस समाज में छाए रहते हैं, जिसमें वह जन्म लेता है। व्यक्ति अपने समाज की संस्कृति को अपनाकर जीता है, इसलिए संस्कृति जीने का तरीका है।

(ज) (i) संस्कृति जीने का वह तरीका है, जो सदियों से जमा होकर समाज में छाया रहता है।

(ii) शब्द विलोम

छाया धूप

जीवन मरण


8. प्रकृति वैज्ञानिक और कवि दोनों की ही उपास्या है। दोनों ही उससे निकटम संबंध स्थापित करने की चेष्टा करते हैं, किंतु दोनों के दृष्टिकोण में अंतर है। वैज्ञानिक प्रकृति के बाह्य रूप का अवलोकन करता और सत्य की खोज करता है। परंतु कवि बाह्य रूप पर मुग्ध होकर भावों का तादात्म्य स्थापित करता है। वैज्ञानिक प्रकृति की जिस वस्तु का अवलोकन करता है, उसका सूक्ष्म निरिक्षण भी करता है। चंद्र को देखकर उसके मस्तिष्क में अनेक विचार उठते हैं। इसका तापक्रम क्या है, कितने वर्षों में वह पुर्णतः शीतल हो जाएगा। ज्वार-भाटे पर इसका क्या प्रभाव होता है, किस प्रकार और किस गति से वह सौर-मंडल में परिक्रमा करता है और किन तत्वों से इसका निर्माण हुआ है। वह अपने सूक्ष्म निरिक्षण और अनवरत चिंतन से उसको एक लोक ठहराता है और उस लोक में स्थित ज्वालामुखी पर्वतों तथा जीवनधारियों की खोज करता है। इसी प्रकार वह एक प्रफुल्लित पुष्प को देखकर उसके प्रत्येक अंग का विश्लेषण और वर्ग विभाजन की प्रधानता रहती है। वह सत्य वास्तविकता का पुजारी होता है। कवि की कविता भी प्रत्यक्षावलोकन से प्रस्फुटित होती है। वह प्रकृति के साथ अपने भावों का संबंध स्थापित करता है। वह उसमें मानव-चेतना का अनुभव करके उसके साथ अपनी आंतरिक भावनाओं का समन्वय करता है। वह तथ्य और भावना के संबंध पर बल देता है। वह नग्न सत्य का उपासक नहीं होता। उसका वस्तु-वर्णन हृदय की प्रेरणा का परिणाम होता है, वैज्ञानिक की भाँति मस्तिष्क की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं।

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(ख) प्रकृति के उपासक किन्हें कहा गया हैं ? वे यह उपासना किस रूप में करते हैं?

(ग) प्रकृति के प्रति कवि व वैज्ञानिक के दृष्टिकोण में क्या भिन्नता है?

(घ) वैज्ञानिक द्वारा पुष्प को देखने से उसके स्वभाव की किस विशेषता का ज्ञान होता है?

(ङ) चाँद के अवलोकन संबंधी कवि एवं वैज्ञानिक के दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।

(च) कवि जब प्रकृति का प्रत्यक्षावलोकन करता है , तब कविता प्रकट होती है।- स्पष्ट कीजिए।

(छ) गद्यांश के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण की चार विशेषताएँ लिखिए।

(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

(i) उपसर्ग और मूल शब्द बताइए- प्रस्फुटित, संबंध।

(ii) कवि प्रकृति के बाहय रूप पर मुग्ध होकर भावों का तादाम्य स्थापित करता है।- मिश्र वाक्य में बदलिए।

उत्तर- (क) शीर्षक– प्रकृति, कवि और वैज्ञानिक अथवा कवि और वैज्ञानिक दृष्टि में प्रकृति।

(ख) प्रकृति के उपासक वैज्ञानिक और कवि को कहा गया हैं। वें दोनों ही यह उपासना करने के क्रम में प्रकृति के करीब जाते हैं और उससे निकटतम संबंध स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

(ग) प्रकृति के प्रति कवि और वैज्ञानिक के दृष्टिकोण में यह अंतर हैं कि वैज्ञानिक प्रकृति के बाह्य रूप का सूक्ष्म निरीक्षण करता हुआ सत्य की खोज करता है। इसके विपरीत कवि प्रकृति के बाहय रूप को देखकर खुश होता है और प्रकृति के साथ अपने मनोभावों का तादात्म्य स्थापित करता है।

(घ) वैज्ञानिक जब किसी खिले फूल को देखता है, तो उसके प्रत्येक अंग का विश्लेषण करता है। उसका प्रकृति विषयक अध्ययन वस्तुगत होता है। वह सूक्ष्म दृष्टि से निरीक्षण करते हैं। इससे पता चलता है कि वह सत्य और वास्तविकता का पुजारी होता है।

(ङ) कवि एवं वैज्ञानिक दोनों ही चाँद को देखते हैं, पर उनके दृष्टिकोण में अंतर होता है। कवि चाँद के बाहय रूप पर मुग्ध होकर भावों का तादात्म्य स्थापित करता है, जबकि वैज्ञानिक चाँद का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए उसके तापमान, ज्वार-भाटे पर प्रभाव, उसकी गति, सौरमंडलकी परक्रिमा तथा उसके तत्वों को खोजता फिरता है।

(च) कवि जब प्रकृति का प्रत्यक्षावलोकन करता है, तो वह उसके साथ भावों का तादात्म्य स्थापित करता है। उसे प्रकृति में मानव चेतना की अनुभूति होती है और वह उसके साथ अपने भावों को संबंधित करता है। इस प्रकार से तथ्य और भावों पर बल देने से कविता प्रकट होती है।

(छ) गद्यांश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की निम्नलिखित विशेषताओं का ज्ञान होता है-

(i) वैज्ञानिक तथ्यों पर बल देता है, भवन। पर नहीं।

(ii) वैज्ञानिक सत्य का अन्वेषक होता है।

(iii) वैज्ञानिक द्वारा किया गया वस्तु का वर्णन मस्तिष्क की उपज होती है, हृदय की नहीं।

(iv) वैज्ञानिक किसी वस्तु का अत्यंत सूक्ष्म निरीक्षण करता हैं।

(ज) (i)

शब्दउपसर्गमूल शब्द
प्रस्फुटितप्रस्फुटित
संबंधसम्बंध

(ii) जब कवि प्रकृति के बाह्य रूप पर मुग्ध होता है, तब भावों का तादाम्य स्थापित करता है।


9. विषमता शोषण की जन है। समाज में जिन विषमता होगी, सामान्यतया शोषण उतना ही अधिक होगा। चूँकि हमार देश में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक असमानताएँ अधिक हैं जिसकी वजह से एक व्यक्ति एक स्थान पर शोषक तथा वही दूसरे स्थान पर शोषित होता है। चूँकि जब बात उपभोक्ता संरक्षण की हो तब पहला प्रश्न यह उठता है कि उपभोक्ता किसे कहते हैं? या उपभोक्ता की परिभाषा क्या है? सामान्यतः उस व्यक्ति या व्यक्ति समूह को उपभोक्ता कहा जाता है जो सीधे तौर पर किन्हीं भी वस्तुओं अथवा सेवाओं का उपयोग करते हैं। इस प्रकार सभी व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में शोषण का शिकार अवश्य होते हैं।

हमारे देश में ऐसे अशिक्षित, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से दुर्बल अशक्त लोगों की भीड़ है जो शहर की मलिन बस्तियों में, फुटपाथ पर, सड़क तथा रेलवे लाइन के किनारे, गंदे नालों के किनारे झोंपड़ी डालकर अथवा किसी भी अन्य तरह से अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। वे दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश की समाजोपयोगी ऊर्ध्वमुखी योजनाओं से वंचित हैं, जिन्हें आधुनिक सफ़ेदपोशों, व्यापारियों, नौकरशाहों एवं तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग ने मिलकर बाँट लिया है। सही मायने में शोषण इन्हीं की देन है।

उपभोक्ता शोषण का तात्पर्य केवल उत्पादकता व व्यापारियों द्वारा किए गए शोषण से ही लिया जाता है जबकि इसके क्षेत्र में वस्तुएँ एवं सेवाएँ दोनों ही सम्मिलित हैं, जिनके अन्तर्गत डॉक्टर, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी, वकील सभी आते हैं। इन सबने शोषण के क्षेत्र में जो कीर्तिमान बनाए हैं वे वास्तव में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में दर्ज कराने लायक हैं।

प्रश्न- (क) गद्यांश का समुचित शीर्षक लिखिए।

(ख) ‘विषमता’ शब्द से मूल शब्द तथा प्रत्यय छाँटकर लिखिए।

(ग) ‘ऊर्ध्वमुखी योजनाओं से वंचित है’- वाक्य का आशय समझाइए।

(घ) ‘विषमता शोषण की जननी है’- कैसे, स्पष्ट कीजिए।

(ङ) समाज में जितनी विषमता होगी, सामान्यतः शोषण उतना ही अधिक होगा। वाक्य-भेद लिखिए।

(च) उपभोक्ता शोषण से क्या आशय है? इसकी सीमाएँ कहाँ तक हैं?

(छ) देश की समाजोपयोगी योजनाओं से कौन सा वर्ग वंचित रह जाता है और क्यों?

(ज) उपभोक्ता किसे कहते हैं? उपभोक्ता शोषण का मुख्य कारण क्या है?

(झ) सामान्यतः शोषण का दोषी किसे कहा जाता है और क्यों?

उत्तर- (क) उपभोक्ता शोषण।

(ख) मूल शब्द– सम, उपसर्ग- वि, प्रत्यय- ता।

(ग) ‘ऊर्ध्वमुखी योजनाओं से वंचित है’- वाक्य का आशय यह है कि समास का एक वर्ग जो अशिक्षित, सामाजिक आर्थिक रूप से कमज़ोर है तथा गंदें स्थानों पर रहता है को उठाने के लिए योजनाएँ बनाई जाती हैं पर उसे उन योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है।

(घ) हमारे समाज में जहाँ अत्यंत गरीब, अनपढ़ लाचार और सामजिक दृष्टि से अत्यंत पिछड़े लोग हैं, वहीं अत्यंत धनी, पढ़े-लिखे, शक्ति एवं साधन संपन्न लोग हैं। इस प्रकार समाज में विषमता का बोलबाला है। यही धन-बल और साधन संपन्न लोग गरीबों की गरीबी की अनुचित फायदा उठाते हैं। इस प्रकार विषमता शोषण की जननी है।

(झ) मिश्र वाक्य।

(च) उपभोक्ता शोषण से तात्पर्य है- उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों से वंचित करना। इसकी सीमाएँ वस्तुओं के उत्पादन, उन तक पहुँचने और व्यापरियों द्वारा कम वस्तुएँ देने से लेकर डॉक्टर, इंजीनियर सफेदपोश, नौकरशाह और बुद्धिजीवियों की सोच तक है।

(छ) देश की समाजोपयोगी योजनाओं से गरीब, लाचार, अशिक्षित और कमजोर अर्थात् वह वर्ग रह जाता है, जिसकी जरुरत उसे सर्वाधिक है। यह वर्ग इन योजनाओं से इसलिए वंचित रह जाता है क्योंकि हमारे समाज के आधुनिक समाजपोश, व्यापारी, नौकरशाह तथा तथाकथित बुद्धिजीवी वर मिलकर आपस में बंदरबाँट कर लेते हैं।

(ज) उपभोक्ता वह व्यक्ति होता है जो वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग करता है। उपभोक्ताओं के शोषण का कारण है- उनका जागरूक न होना तथा सफेदपोश, व्यापारी नौकरशाह और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की नीयत में खोट होना, जिससे वे सारी योजनाओं को अपनी समझकर उनका अनुचित लाभ उठाते हैं।

(झ) सामान्यतः शोषण को दोषी उन लोगों को कहा जाता है, जिनके हाथों प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ताओं को सेवाएँ प्रदान की जाती है। इस वर्ग में व्यापारी और उत्पादक आते हैं। यह वर्ग कभी कम मात्रा में वस्तुएँ देकर, कभी वस्तुओं का दाम अधिक वसूल कर शोषण करता है। इसके अलावा उत्पादक जब उपभोक्ता वर्ग के श्रम से वस्तुएँ उत्पादित करता है तब उन्हें बहुत कम मजदूरी देकर प्रत्यक्ष रूप से शोषण करता है।


10. साहित्य की शाश्वतता का प्रश्न एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या साहित्य शाश्वत होता है? यदि हाँ, तो किस मायने में? क्या कोई साहित्य अपने रचनाकाल के सौ वर्ष बीत जाने पर भी उतना ही प्रासंगिक रहता है, जितना वह अपनी रचना के समय था? अपने समय या युग का निर्माता साहित्यकार क्या सौ वर्ष बाद की परिस्थितियों का भी युग-निर्माता हो सकता है, समय बदलता रहता है, परिस्थितियाँ और भावबोध बदलते हैं, साहित्य बदलता है और इसी के समानांतर पाठक की मानसिकता और अभिरुचि भी बदलती है। अतः कोई भी कविता अपने सामयिक परिवेश के बदल जाने पर ठीक वही उत्तेजना पैदा नहीं कर सकती, जो उसने अपने रचनाकाल के दौरान की होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि एक विशेष प्रकार के साहित्य के श्रेष्ठ अस्तित्व मात्र से वह साहित्य हर युग के लिए उतना ही विशेष आकर्षण रखे, यह आवश्यक नहीं है। यही कारण है कि वर्तमान युग में इंगला-पिंगला, सुषुम्ना, अनहद, नाद आदि पारिभाषिक शब्दावली मन में विशेष भावोत्तेजन नहीं करती। साहित्य की श्रेष्ठता मात्र ही उसके नित्य आकर्षण का आधार नहीं है। उसकी श्रेष्ठता का युगयुगीन आधार हैं, वे जीवन-मूल्य तथा उनकी अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्ति जो मनुष्य की स्वतंत्रता तथा उच्चतर मानव-विकास के लिए पथ-प्रदर्शक का काम करती है। पुराने साहित्य का केवल वही श्री-सौंदर्य हमारे लिए ग्राह्य होगा, जो नवीन जीवन-मूल्यों के विकास में सक्रिय सहयोग दे अथवा स्थिति-रक्षा में सहायक हो। कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता को अस्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि साहित्यकार निरपेक्ष होता है और उस पर कोई भी दबाव आरोपित नहीं होना चाहिए। किंतु वे भूल जाते हैं कि साहित्य के निर्माण की मूल प्रेरणा मानव-जीवन में ही विद्यमान रहती है। जीवन के लिए ही उसकी सृष्टि होती है। तुलसीदास जब स्वांतःसुखाय काव्य-रचना करते हैं, तब अभिप्राय यह नहीं रहता कि मानव-समाज के लिए इस रचना का कोई उपयोग नहीं है, बल्कि उनके अंतःकरण में संपूर्ण संसार की सुख-भावना एवं हित-कामना सन्निहित रहती है। जो साहित्यकार अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को व्यापक लोक-जीवन में सन्निविष्ट कर देता है, उसी के हाथों स्थायी एवं प्रेरणाप्रद साहित्य का सृजन हो लकता है।

प्रश्न- (क) प्रस्तुत गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(ख) पुराने साहित्य के प्रति अरुचि का क्या कारण है ?

(ग) जीवन के विकास में पुराने साहित्य का कौन-सा अंश स्वीकार्य हैं और कौन-सा नहीं?

(घ) साहित्य की शाश्वतता का आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि यह शाश्वत होता है या नहीं।

(ङ) सामयिक परिवेश बदलने का कविता पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्यों ?

(च) साहित्य की श्रेष्ठता के आधार क्या हैं?

(छ) कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता अस्वीकारने की भूल किस तरह करते हैं? यह किस तरह अनुचित है?

(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-

(i) ‘भावोत्तेजना’, ‘समानांतर’ शब्दों का संधि-विच्छेद कीजिए।

(ii) जीवन-मूल्य, साहित्यकार शब्दो का विग्रह कर समास बताइए।

उत्तर- (क) शीर्षक– साहित्य की प्रासंगिकता

(ख) वर्तमान युग में पुराने साहित्य के प्रति अरुचि हो गई है, क्योंकि पाठक की अभिरुचि बदल गई है और वर्तमान युग में पुराने साहित्य को वह अपने लिए प्रासंगिक नहीं पाता। इसके अलावा देशकाल और परिस्थिति के अनुसार साहित्य की प्रासंगिकता बदलती रहती हैं।

(ग) जीवन के विकास में पुराने साहित्य का केवल वही अंश स्वीकार्य है, जो नवीन जीवन के मूल्यों के विकास में सक्रिय सहयोग दे। पुराने साहित्य का वह अंश अस्वीकार कर दिया जाता है, जो अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खो चुका है तथा जीवन-मूल्यों से असंबद्ध हो चुका होता है।

(घ) साहित्य की शाश्वतता का तात्पर्य हैं-हर काल एवं परिस्थिति में अपनी उपयोगिता बनाए रखना एवं प्रासंगिकता को कम न होने देना। साहित्य की शाश्वत इसलिए नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि वह समय के साथ अपनी प्रासंगिकता खो बैठता है। इसके अलावा रचनाकार अपने काल की परिस्थितियों के अनुरूप ही साहित्य-सृजन करता है।

(ङ) सामयिक परिवेश के बदलाव का कविता पर बहुत प्रभाव पड़ता है। परिवेश बदलने से कविता पाठक के मन में वह उत्तेजना नहीं कर पाती है, जो वह अपने रचनाकाल के समय करती थी। इसका कारण है-समय, परिस्थितियाँ और भावबोध बदलने के अलावा पाठकों की अभिरुचि और मानसिकता में भी बदलाव आ जाना।

(च) साहित्य की श्रेष्ठता का आधार है, वे जीवन-मूल्य था उनकी अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्तियाँ, जो मनुष्य की स्वतंत्रता तथा उच्चतर मानव-विकास के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य करती हैं।

(छ) कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता अस्वीकारने की भूल यह मानकर करते हैं कि साहित्य निरपेक्ष होता है तथा उस पर दबाव नहीं होना चाहिए। चूँकि साहित्य मानव-जीवन के सापेक्ष होता हो और जीवन के लिए ही उसकी सृष्टि की जाती है, अतः कुछ लोगों द्वारा साहित्य को निरपेक्ष मानना अनुचित है।

(ज) (i)शब्द संधि-विच्छेद

भावोत्तेजना = भाव + उत्तेजना

समानांतर = समान + अंतर

(ii)

शब्दविग्रहसमास
जीवन-मूल्यजीवन के मूल्यसंबंध तत्पुरुष
साहित्यकारसाहित्य की रचना करता है जो व्यक्ति विशेषबहुब्रीहि समास

फ़ीचर लेखन

प्रश्न-1 चुनाव प्रचार का एक दिन पर एक फीचर लिखिए।

उत्तर- चुनाव प्रचार का एक दिन

चुनाव लोकतंत्र के लिए एक त्योहार से कम नहीं है।चुनाव लोकतांत्रिक प्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से ही जनता अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है, जो आगे चलकर शासन प्रणाली को सँभालते हैं। सभी प्रतिनिधि अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए चुनाव प्रचार को माध्यम बनाते हैं। चुनाव-प्रचार मतदाताओं को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाता है। चुनाव प्रचार में लाउडस्पीकर, पोस्टर, पैमपलेट आदि अन्य प्रकार की सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। चुनाव प्रचार में प्रतिनिधि जोकि भिन्न-भिन्न पार्टियो के उम्मीदवार होते हैं, वह जनता के घर-घर जाकर अपने लिए स्वयं वोट माँगते हैं। चुनाव प्रचार की अनेक प्रक्रियाएँ होती हैं, सब के प्रचार के अपने अलग अलग ढंग होते हैं। अधिकांश लोग चुनाव प्रचार के दौरान नोटों की मदद से वोट खरीदते हैं,तो कुछ लोग ईमानदारी से चुनाव प्रचार करते हैं ,परंतु ईमानदारों की संख्या बहुत कम है।
चुनाव प्रचार की प्रक्रिया चुनाव होने के दो दिन पहले ही बंद हो  जाती है। सभी उम्मीदवार अपने-अपने क्षेत्र मे नए-नए तौर तरीकों से जनता को लुभाने का कार्य करते हैं। चुनाव-प्रचार के दौरान बहुत से प्रत्याशी गलत व अनैतिकता का प्रयोग भी करते हैं। चुनाव प्रचार के समय प्रत्याशी अपना वोट पाने के लिए खरीद-फरोख़्त की राजनीति को भी जन्म देते हैं।
चुनाव प्रचार के दो पक्ष हैं, जिसमे पहला यह है कि इसके माध्यम से उम्मीदवार स्वयं को मतदाताओं से परिचित करवाता है और अपने एजेंडा को उन मतदाताओं के सम्मुख प्रस्तुत करता है।
कहा जाए तो इस सकारात्मक तरीके से वह मतदाताओं पर प्रभाव स्थापित कर अपना वोट पक्का करना चाहता है, परंतु इसका दूसरा तरीका अत्यंत बुरा है, जो समाज में कुप्रवृत्तियों को जन्म देता है तथा राजनीति को एक गंदा खेल बनाकर प्रस्तुत करता है। अंत में कहना चाहिए कि चुनाव प्रचार बहुत ही रोमांचकारी प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया को सही रूप से प्रयोग में लाया जाए, तो हम सही प्रत्याशी को चुनकर देश के भविष्य को सुनिश्चित कर सकेंगे।

प्रश्न-2 चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण विषय पर एक फीचर लिखिए।

उत्तर- चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण

चुनाव लोकतांत्रिक प्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चुनाव के माध्यम से ही जनता अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है, जो आगे चलकर शासन प्रणाली को सँभालते हैं। आजकल चुनाव को लेकर लोगों की रुचि अत्यधिक बढ़ गई है। इस बढ़ती रुचि के कारण ही आज चुनाव से पहले सर्वेक्षण किये जाने लगे हैं, जिससे ये पता लग सके कि कौन जितने के कतार में सबसे आगे है।
लोग राजनीतिक दलों एवं नेताओं की वास्तविकता जानने के लिए बहुत व्याकुल रहते हैं। ऐसे में मीडिया चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण करवाकर लोगों की इस मानसिकता का व्यावसायिक लाभ भी उठाती हैं, और एक जागरूक एवं सतर्क मीडिया की भूमिका भी निभाती है।
लेकिन यह सवाल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है कि क्या चुनाव-पूर्व होने वाले ये सर्वेक्षण विश्वसनीय होते हैं? क्या जनता अपने द्वारा किए जाने वाले मतदान का पहले ही खुलासा कर देती है?
बुद्धिजीवियों का एक वर्ग कहता है कि ऐसे सर्वेक्षण करके राजनीतिक दल जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता बरकरार नहीं रख पाते। जनता स्वयं इस दुविधा में पड़ जाती है कि किसके जीतने की संभावना सर्वाधिक है और वह अपना महत्त्वपूर्ण मत किसे दे? इस उधेड़बुन के कारण सामान्य मतदाता अपने मत का सही उपयोग नहीं कर पाता।
बद्धिजीवियों का दूसरा वर्ग मानता है कि भारत की जनता को पिछले लगभग 66 वर्षों का अनुभव है। अतः ऐसे सर्वेक्षणों से वह प्रभावित नहीं होती और न ही वह अपने मत का दुरुपयोग करती है। वस्तुतः कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि हमारे देश में चुनाव पूर्व होने वाले सर्वेक्षण विश्वसनीय होते हैं।
चुनाव से पूर्व उसके निर्णय का पता लगा पाना अत्यंत मुश्किल है। हाल ही में, एक स्टिंग ऑपरेशन में चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में पाई गई गड़बड़ियों को देखते हुए इन पर रोक लगाने के लिए चुनाव आयोग ने कानून में संशोधन करने की सिफारिश की है।

प्रश्न-3 जंक फूड की समस्या पर एक फीचर लिखिए।

उत्तर- जंक फूड की समस्या

आधुनिक रहन-सहन और दौड़-धूप से भरी जिंदगी ने मनुष्य के जीवन में कई परिवर्तन किए हैं। आज लोगों के पास समय का अभाव है। इस व्यस्त जिंदगी में सब कुछ फास्ट हो गया है और इसी जल्दबाजी ने मनुष्य को भोजन की एक नई शैली के जाल में फँसा दिया है, जिसे फास्ट फूड या जंक फूड कहते हैं। जंक फूड उस प्रकार के खाने को कहते हैं, जो चंद मिनटों में बन कर तैयार हो जाता है, पर ये स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होता है। जंक फूड़ के प्रति बच्चों के लगाव ने उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को एक चुनौती के रूप में लाकर देश के सामने खड़ा कर दिया है।
देश में चिकित्सक, शिक्षाविद्, अभिभावक सभी चितिंत हैं क्योंकि जंक फूड के सेवन से बच्चे उन बीमारियों के शिकार हो रहे हैं, जो अधिक उम्र के लोगों में हुआ करती थीं। जंक फूड बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को बुरी तरह से प्रभावित करता है, जिसके कारण उन्हें भविष्य में कई तरह की परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं। जंक फूड के अंतर्गत आलू के चिप्स, स्नैक्स, इंस्टैंट नूडल्स, कॉबनेट-पेय पदार्थ, बर्गर, पिज्जा, मोमोज, फ्राइड चिकन आदि खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।
लगभग सभी प्रकार के जंक फूड में कैलोरी की मात्रा बहुत अधिक होती है, जिससे अति पोषण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। अधिक कैलोरी के साथ-साथ जंक फूड में नमक, ट्रांस फैट, चीनी, परिरक्षक (प्रिजरवेटिव), वनस्पति घी, सोडा, कैफीन आदि भी अधिक मात्रा में होते हैं, जबकि फाइबर बहुत कम होता है।
इन सभी से मोटापे का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है और मधुमेह, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, कब्ज, सिरदर्द, पेटदर्द आदि बीमारियाँ बच्चों को छोटी उम्र में ही घेर लेती हैं। जंक फूड के कारण बच्चों का बुद्धिलब्धि स्तर (आई क्यू) कमजोर होने लगता है, जिसका परिणाम मानसिक विकलांगता के रूप में भी सामने आ सकता है।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जंक फूड का प्रयोग बच्चों के सुनहरे भविष्य में बहुत बड़ी रुकावट बन सकता है। जंक फूड कम से कम अथवा नहीं खाना चाहिए, ये अनेक प्रकार की बीमारियों को आमंत्रित करने का कार्य करता है।

आलेख तथा समीक्षा

परिभाषा

आलेख वास्तव में लेख का ही प्रतिरूप होता है। … लेख में सामान्यतः किसी एक विषय से संबंधित विचार होते हैं। आलेख में ‘आ’ उपसर्ग लगता है जो कि यह प्रकट करता है कि आलेख सम्यक् और संपूर्ण होना चाहिए। आलेख गद्य की वह विधा है जो किसी एक विषय पर सर्वांगपूर्ण और सम्यक् विचार प्रस्तुत करती है।

सार्थक आलेख के निम्नलिखित गुण हैं –

  • नवीनता एवं ताजगी।
  • जिज्ञासाशील।
  • विचार स्पष्ट और बेबाकीपूर्ण।
  • भाषा सहज, सरल और प्रभावशाली।
  • एक ही बात पुनः न लिखी जाए।
  • विश्लेषण शैली का प्रयोग।
  • आलेख ज्वलंत मुद्दों, विषयों और महत्त्वपूर्ण चरित्रों पर लिखा जाना चाहिए।
  • आलेख का आकार विस्तार पूर्ण नहीं होना चाहिए।
  • संबंधित बातों का पूरी तरह से उल्लेख हो।

प्रश्न-1 दलितों पर अत्याचार विषय पर एक आलेख लिखिए।

उत्तर- दलितों पर अत्याचार

एक तरफ हम अपने देश में अनेक प्रकार के बदलाव उसके विकास के नाम पर कर रहे हैं, और दूसरी तरफ नीचले तबके के लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं। हम भले ही 21वी सदी में जी रहे हैं, पर हमारी सोच आज भी प्राचीन काल वाली है। हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों से दलितों पर अत्याचार का विष-वृक्ष तेजी से फैलता ही जा रहा है। वर्तमान में तो इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। सामाजिक बदलाव और तरक्की की बातें और दावे चाहे जितने कर लिए जाएँ, मगर ये सच्चाई से काफी दूर है। सच यह है कि गाँवो में छुआछूत आज भी कायम हैं। इस सामाजिक विकृति की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि सरकारी स्वास्थ्यकर्मी दलितों के घर जाने से कतराते है, विद्यालयों में उनके बच्चों को अलग बिठाकर खाना दिया जाता है। डाकिये दलितों  को चिट्ठी देने नहीं जाते और उन्हें सार्वजनिक जल स्रोतों से पानी लेने से भी रोका जाता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड के अनुसार, बिहार में दलितों के प्रति अत्याचार पहले से बढ़ा है। राज्य में वर्ष 2005 में दलितों पर अत्याचार के 1,572 मामले दर्ज हुए थे, लेकिन पिछले साल इनकी संख्या 2,786 हो गई। उत्तर प्रदेश का भी हाल कुछ ऐसा ही है, जबकि राज्य में दलित आबादी कुल जनसंख्या का 21% है। खास बात यह है कि ये आँकड़े सरकार की निगाह में होने के बावजूद स्थिति बदलने के लिए कुछ खास नहीं किया जा रहा है।

प्रश्न-2 जन-धन योजना विषय पर एक आलेख लिखिए।

उत्तर- जन-धन योजना

जन-धन योजना का आशय है कि भारत के सभी नागरिकों के पास अपना बैंक खाता हो, जो खास कर गरीबों के लिए आवश्यक है। 15 अगस्त, 2014 को प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने जन-धन योजना की घोषणा की, जिसके अंतर्गत प्रत्येक परिवार को अपना एक बैंक अकाउंट बनाना होगा, जिसमें उन्हें 1 लाख रूपये की बीमा राशि एवं एक डेबिट कार्ड की सुविधा प्राप्त होगी।
प्रधानमंत्री जन-धन योजना गरीबों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, जिससे उनमे बचत की भावना का विकास हो, साथ ही उनमें भविष्य की सुरक्षा का अहम भाव जागे। इसके अतिरिक्त इस कदम से देश का पैसा भी सुरक्षित होगा और जनहित के कार्यों को बढ़ावा भी मिलेगा। यह योजना केद्र सरकार का बड़ा और अहम फैसला है, जोकि देश की नींव को मजबूत बनाएगा।
प्रधानमंत्री जन-धन योजना का नारा है ‘सबका साथ सबका विकास’ अर्थात् देश के विकास में ग्रामीण लोगों का योगदान अहम है, जिसे भूला नहीं जा सकता। अब तक जितनी भी योजनाओं को सुना जाता था वह केवल शहरों तक ही सीमित होती थीं, लेकिन देश का बड़ा भाग ग्रामीण तथा किसान परिवार हैं, जिन्हें जागरूक तथा सुरक्षित करना ही इस योजना का अहम उद्देश्य है।
इस योजना के अंतर्गत कई मूलभूत सुविधाएँ भी प्रदान की गई हैं। खाता धारकों को 30,000 रूपये का बीमा कवरेज दिया जाएगा। साथ ही किसी आपत्ति की स्थिति में बीमा राशि 1 लाख रूपये तक का कवरेज दिया जाएगा।
इस योजना में शून्य स्तर पर भी खाते खोले जा रहे हैं, जिन्हें जीरो बैलेंस की सुविधा कहा जाता है। जन-धन योजना वर्तमान सरकार द्वारा लिया गया अहम निर्णय है, जिसके तहत गरीबों को आर्थिक रूप से थोड़ा सशक्त बनाने की कोशिश की गई है, साथ ही बैंकिंग सिस्टम को देश के हर व्यक्ति तक पहुँचाने की कोशिश  की गई है। इस योजना से गरीबों और मजदूरों को लाभ मिल रहा है।

प्रश्न-3 सामाजिक सुरक्षा विषय पर एक आलेख लिखिए।

उत्तर- सामाजिक सुरक्षा

सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति को समाज के द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा से है अर्थात् समाज अपने सदस्यों को इसके माध्यम से आश्वस्त करता है कि जिंदगी को जीने में आने वाली उसकी समस्याओं की चिंता उसे है। वह इन समस्याओं को दूर करने की भरपूर कोशिश करेगा और अपना पूरा सहयोग उस व्यक्ति को देगा। किसी भी व्यक्ति के जीवन में आने वाली समस्याएँ क्या हो सकती हैं? या इसे इस तरह कहा जा सकता है कि किसी भी व्यक्ति को किस तरह की सुरक्षा की आवश्यकता पड़ती है? स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताएँ होती हैं-भोजन, वस्त्र एवं आवास। इन आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही उसे रोज़गार की आवश्यकता होती है और साथ ही सम्मानपूर्वक एवं भयहीन होकर जीने के लिए कानून के द्वारा सुरक्षा एवं समानता का वातावरण उसे चाहिए। मनुष्य इन्हीं तीनों मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही सब कुछ करता है और जब ये चीजें पूरी हो जाती हैं, तब वह बाकी चीजों पर ध्यान देता है।
जीवित रहने के लिए सबसे आवश्यक है-भोजन। समाज के सर्वाधिक निःशक्त व्यक्ति को भी जीने का अधिकार है और इसके लिए उसे भोजन की प्राप्ति होनी आवश्यक है। इसमें शामिल भोजन एवं पोषण सुरक्षा की देखभाल राष्ट्रीय स्तर पर मध्याह्न भोजन कार्यक्रम, समन्वित बाल विकास योजना, किशोरी शक्ति योजना, प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना आदि के तहत की जाती है। जन वितरण प्रणाली, अनाज भंडार, अंत्योदय अन्न योजना आदि के साथ-साथ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आवास सुरक्षा से तात्पर्य केवल आवास यानी चारदीवारी एवं छत से नहीं है। आवास की अवधारणा में बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था भी शामिल है; जैसे-पीने के लिए शुद्ध पानी, जल निकासी की उचित व्यवस्था, सामुदायिक केंद्र, बच्चों के लिए स्कूल, औषधालय आदि। समाज के दो कमजोर वर्गों-महिलाओं एवं अपंग लोगों को सुरक्षा प्रदान करना अत्यधिक आवश्यक है। इसके लिए महिला सशक्तीकरण के आंदोलन को मज़बूत करने के साथ-साथ अपंग लोगों को उचित ढंग से समाज में समायोजित किया जाना जरूरी है। इस दिशा में मुख्यतः दो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं सोशल सिक्योरिटी डिसेबिलिटी इंश्योरेंस तथा सप्लीमेंटल सिक्योरिटी इनकम।
इस तरह कहा जा सकता है कि सामाजिक सुरक्षा तब तक सार्थक एवं पर्याप्त नहीं कही जा सकती, जब तक समाज का सबसे कमज़ोर व्यक्ति भी स्वयं को सुरक्षित महसूस न करे। यह किसी भी समाज के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है।

4-कितनी महफूज है इंटरनेट की आज़ादी
क्रिसमस से बहुत पहले ही मार्क जुकरबर्ग भारत के लिए सांता क्लॉज बनने के लिए उतावले हो रहे थे। सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी का फेसबुक मुख्यालय जाना और अक्तूबर में खुद जुकरबर्ग का भारत आना, इसके लिए भूमिका बना रहे थे। अक्तूबर में भी अखबारों के पन्ने फेसबुक के विज्ञापनों से रंगे थे और अभी पिछले एक हफ्ते से विज्ञापनों की बाढ़ सी आई हुई है। अचानक ऐसा क्यों हो रहा है? भारत के 20 करोड़ से अधिक सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से 13 करोड़ लोग फेसबुक से जुड़े हैं। …और ये सब बिना किसी विज्ञापन के ही फेसबुक से जुड़े हैं। फिर विज्ञापनों के जरिये क्यों हमें ट्राई यानी भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण को लिखने के लिए बार-बार कहा जा रहा है? दरअसल, फेसबुक जिस फ्री-बेसिक्स का प्रचार कर रहा है, उसे पहले इंटरनेट डॉट ओआरजी के नाम से पेश किया गया था। एयरटेल जीरो की ही तरह इंटरनेट डॉट ओआरजी

का भी विरोध हुआ था। एयरटेल को तो पैर पीछे खींचने पड़े, पर फेसबुक ने रिलायंस कम्यूनिकेशन के साथ मिलकर इंटरनेट डॉट ओआरजी का नाम बदलकर फ्री-बेसिक्स सेवा कर दी। कहा गया कि इससे मोबाइल पर बिना डाटा प्लान लिए भी इंटरनेट से जुड़ सकते हैं। फिर दिक्कत कहाँ है? दरअसल, फ्री-बेसिक्स सिर्फ रिलायंस कम्यूनिकेशन के ग्राहकों के लिए ही उपलबध होगी। डाटा का खर्च उपभोक्ताओं से सीधे नहीं लेंगे, तो किसी अन्य रूप में ज़रूर वसूलेंगे। सबसे अहम है कि इस सुविधा से आप इंटरनेट पर उपलब्ध वही सामग्री देख पाएँगे, जो फेसबुक तय करेगा।

कितनी महफूज है इंटरनेट की आज़ादी
क्रिसमस से बहुत पहले ही मार्क जुकरबर्ग भारत के लिए सांता क्लॉज बनने के लिए उतावले हो रहे थे। सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी का फेसबुक मुख्यालय जाना और अक्तूबर में खुद जुकरबर्ग का भारत आना, इसके लिए भूमिका बना रहे थे। अक्तूबर में भी अखबारों के पन्ने फेसबुक के विज्ञापनों से रंगे थे और अभी पिछले एक हफ्ते से विज्ञापनों की बाढ़ सी आई हुई है। अचानक ऐसा क्यों हो रहा है? भारत के 20 करोड़ से अधिक सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से 13 करोड़ लोग फेसबुक से जुड़े हैं। …और ये सब बिना किसी विज्ञापन के ही फेसबुक से जुड़े हैं। फिर विज्ञापनों के जरिये क्यों हमें ट्राई यानी भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण को लिखने के लिए बार-बार कहा जा रहा है? दरअसल, फेसबुक जिस फ्री-बेसिक्स का प्रचार कर रहा है, उसे पहले इंटरनेट डॉट ओआरजी के नाम से पेश किया गया था। एयरटेल जीरो की ही तरह इंटरनेट डॉट ओआरजी

का भी विरोध हुआ था। एयरटेल को तो पैर पीछे खींचने पड़े, पर फेसबुक ने रिलायंस कम्यूनिकेशन के साथ मिलकर इंटरनेट डॉट ओआरजी का नाम बदलकर फ्री-बेसिक्स सेवा कर दी। कहा गया कि इससे मोबाइल पर बिना डाटा प्लान लिए भी इंटरनेट से जुड़ सकते हैं। फिर दिक्कत कहाँ है? दरअसल, फ्री-बेसिक्स सिर्फ रिलायंस कम्यूनिकेशन के ग्राहकों के लिए ही उपलबध होगी। डाटा का खर्च उपभोक्ताओं से सीधे नहीं लेंगे, तो किसी अन्य रूप में ज़रूर वसूलेंगे। सबसे अहम है कि इस सुविधा से आप इंटरनेट पर उपलब्ध वही सामग्री देख पाएँगे, जो फेसबुक तय करेगा।

इस सारे मसले पर हँगामा तब खड़ा हुआ, जब 12 दिसंबर को ट्राई ने एक पत्र लिखकर रिलायंस इंफोकॉम से यह सेवा फिलहाल बंद करने के लिए कहा। क्या फ्री-बेसिक्स या उसके जैसी अन्य सेवाएँ इंटरनेट की स्वतंत्रता का हनन करती हैं ? इसको लेकर ट्राई ने 30 दिसंबर तक लोगों से सुझाव माँगे थे। आप भी अपने फेसबुक पेज पर यह सूचना बार-बार देख रहे होंगे कि आपके मित्र फ्री-बेसिक्स के समर्थन में ट्राई को लिख रहे हैं, आप भी लिखिए।

पत्रकारीय लेखन

  1. समाचार शब्द को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- समाचार का अंग्रेजी पर्याय (NEWS) चारो दिशाओं को सांकेतिक करता है। अपने आस-पास के समाज एवं देश-दुनिया की घटनाओं के विषय मे त्वरित एवं नवीन जानकारी, जो पक्षपात रहित एवं सत्य हो, समाचार कहलाता है।

  • संवाददाता किसे कहते हैं?

उत्तर- समाचारों को संकलित करने वाले को संवाददाता कहा जाता है।

  • समाचार लेखन की विलोमस्तूपी पद्धति क्या है?

उत्तर- समाचार लेखन की विलोमस्तूपी पद्धति अथवा उल्टा पिरामिड पद्धति में समाचार लिखते हुए उसका चरमोत्कर्ष प्रारंभ में दिया जाता है तथा घटनाक्रम की व्याख्या करते हुए अंत किया जाता है।

  • अंशकालिक पत्रकार से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- अंशकालिक पत्रकार किसी समाचार संगठन के लिए एक निश्चित मानदेय के आधार पर काम करते है। ये एक से अधिक पत्रों के लिए भी काम करते हैं क्योंकि ये पूर्णकालिक पत्रकार नहीं होते हैं ।

  • संपादक के दो दायित्वों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर- संपादक के दो दायित्व निम्नलिखित हैं-

  1. संवाददाताओं तथा रिपोर्टरों द्वारा प्राप्त लिखित सामग्री को शुद्ध कर प्रस्तुति के योग्य बनाना।
    1. समाचार-पत्र की नीति, आचार-संहिता तथा जनकल्याण का ध्यान रखना।
  2. खोजपरक पत्रकारिता किसे कहा जाता है?

उत्तर- खोजपरक पत्रकारिता का अर्थ उस पत्रकारिता से है, जिसमें सूचनाओं को सामने लाने के लिए उन तथ्यों की गहराई से छानबीन की जाती है, जिन्हें संबंधित पक्ष द्वारा दबाने या छुपाने का प्रयास किया जा रहा हो।

  • ऐडवोकेसी पत्रकारिता क्या है?

उत्तर- किसी खास विचारधारा या उद्देश्य को आगे बढ़ाने तथा उसके लिए जनमत तैयार करने वाली पत्रकारिता ‘एडवोकेसी पत्रकारिता’ कहलाती है। भारत में कुछ समाचार-पत्र या टेलीविजन चैनल कुछ खास मुद्दों को लेकर अभियान चलाते हैं। ‘जेसिका लाल हत्याकांड’ में न्याय के लिए चलाए गए सक्रिय अभियान को उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है ।

  • इंटरनेट पत्रकारिता क्या है?

उत्तर- इंटरनेट पर समाचारों का प्रकाशन अथवा आदान-प्रदान, इंटरनेट पत्रकारिता कहलाता है।

  • वायस ओवर क्या है?

उत्तर- किसी गतिमान/चलायमान दृश्य के पीछे से आ रही आवाज को ‘वायस ओवर’ कहते हैं।

  1. संपादन के दो सिद्धांत बताइए।

उत्तर- संपादन के दो सिद्धांत निम्नलिखित हैं –

  • निष्पक्षता – संपादन में निष्पक्षता का तात्पर्य है बिना किसी का पक्ष लिए अपना कार्य करना।
    • वस्तुपरकता – संपादन में वस्तुपरकता का तात्पर्य है कि जो हम संपादित कर रहे हैं, वो विषय से जुड़ा है या नहीं ।
  • संपादकीय का महत्त्व समझाइए।

उत्तर- एक अच्छा संपादकीय किसी विषय या मुद्दे पर संपादक द्वारा प्रस्तुत उसके विचारों की सजग एवं ईमानदार प्रस्तुति है। संक्षिप्तता, विश्वसनीयता, तथ्यपरकता, निष्पक्षता एवं रोचकता एक अच्छे संपादकीय का महत्त्व है।

  1. रेडियो की लोकप्रियता के क्या कारण हैं?

उत्तर-  रेडियो के लोकप्रियता के कारण निम्नांकित हैं –

  • सस्ता व सुलभ साधन
    • अन्य कार्य करते हुए भी रेडियो का उपयोग संभव
    • व्यापक प्रसार और दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँच

पत्रकारिता के विविध आयाम

1. पत्रकारिता क्या है ?

ऐसी सूचनाओं का संकलन एवं संपादन कर आम पाठकों तक पहुँचाना, जिनमें अधिक से अधिक लोगों की रुचि हो तथा जो अधिक से अधिक लोगों को प्रभावित करती हों, पत्रकारिता कहलाता है। (देश-विदेश में घटने वाली घटनाओं की सूचनाओं को संकलित एवं संपादित कर समाचार के रूप में पाठकों तक पहुँचाने की क्रिया/विधा को पत्रकारिता कहते हैं)

2. पत्रकारीय लेखन तथा साहित्यिक सूजनात्मक लेखन में क्या अंतर है ?

पत्रकारीय लेखन की प्रमुख उद्देश्य सूचना प्रदान करना होता है, इसमें तथ्यों की प्रधानता होती है, जबकि साहित्यिक सृजनात्मक लेखन भाव, कल्पना एवं सौंदर्य-प्रधान होता है।

3. पत्रकारिता के प्रमुख आयाम कौन-कौन से हैं ?

संपादकीय, फ़ोटो पत्रकारिता, कार्टून कोना, रेखांकन और कार्टोग्राफ़।

4. समाचार किसे कहते हैं ?

समाचार किसी भी ऐसी ताजा घटना, विचार या समस्या की रिपोर्ट है जिसमें अधिक से अधिक लोगों की रुचि हो और जिसका अधिक से अधिक लोगों पर प्रभाव पड़ता हो।

5. समाचार के तत्त्वों को लिखिए।

पत्रकारिता की दृष्टि से किसी भी घटना, समस्या व विचार को समाचार का रूप धारण करने के लिए उसमें निम्न तत्त्वों में से अधिकांश या सभी का होना आवश्यक होता है-

नवीनता निकटता, प्रभाव, जनरुचि, संघर्ष, महत्त्वपूर्ण लोग, उपयोगी जानकारियाँ, अनोखापन आदि।

6. डेडलाइन से आप क्या समझते हैं ?

समाचार माध्यमों के लिए समाचारों को कवर करने के लिए निर्धारित समय-सीमा को डेडलाइन कहते हैं।

7. संपादन से क्या अभिप्राय है ?

प्रकाशन के लिए प्राप्त समाचार-सामग्री से उसकी अशुद्धियों को दूर करके पठनीय तथा प्रकाशन योग्य बनाना संपादन कहलाता है।

8. संपादकीय क्या है ?

संपादक द्वारा किसी प्रमुख घटना या समस्या पर लिखे गए विचारात्मक लेख को, जिसे संबंधित समाचारपत्र की राय भी कहा जाता है, संपादकीय कहते हैं। संपाठकीय किसी एक व्यक्ति का विचार या राय न होकर समग्र पत्र-समूह की राय होता है, इसलिए संपादकीय में संपादक अथवा लेखक का नाम नहीं लिखा जाता।

9. पत्रकारिता के प्रमुख प्रकार लिखिए।

  • खोजी पत्रकारिता
  • विशेषीकृत पत्रकारिता
  • वॉचडॉग पत्रकारिता
  • एडवोकेसी पत्रकारिता
  • पीतपत्रकारिता
  • पेज थ्री पत्रकारिता

10. खोजी पत्रकारिता क्या है ?

जिसमें आम तौर पर सार्वजनिक महत्त्व के मामलों, जैसे-भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और गड़बड़ियों की गहराई से छानबीन कर सामने लाने की कोशिश की जाती है। स्टिंग ऑपरेशन खोजी पत्रकारिता का ही एक नया रूप है।

11. वॉचडॉग पत्रकारिता से आप क्या समझते हैं ?

लोकतंत्र में पत्रकारिता और समाचार मीडिया का मुख्य उत्तरदायित्व सरकार के कामकाज पर निगाह रखना है और कोई गड़बड़ी होने पर उसका परदाफाश करना होता है, परंपरागत रूप से इसे वॉचडॉग पत्रकारिता कहते हैं।

12. एडवोकेसी पत्रकारिता किसे कहते हैं ?

इसे पक्षधर पत्रकारिता भी कहते हैं। किसी खास मुद्दे या विचारधारा के पक्ष में जनमत बनाने के लिए लगातार अभियान चलाने वाली पत्रकारिता को एडवोकेसी पत्रकारिता कहते हैं।

13. पीतपत्रकारिता से आप क्या समझते हैं ?

पाठकों को लुभाने के लिए झूठी अफ़वाहों, आरोपों-प्रत्यारोपों, प्रेमसंबंधों आदि से संबंधित सनसनीखेज समाचारों से संबंधित पत्रकारिता को पीतपत्रकारिता कहते हैं।

14. पेज थ्री पत्रकारिता किसे कहते हैं ?

ऐसी पत्रकारिता जिसमें फैशन, अमीरों की पार्टियों, महफ़िलों और जानेमाने लोगों के निजी जीवन के बारे में बताया जाता है।

15. पत्रकारिता के विकास में कौन-सा मूल भाव सक्रिय रहता है ?

जिजासा का

16. विशेषीकृत पत्रकारिता क्या है ?

किसी विशेष क्षेत्र की विशेष जानकारी देते हुए उसका विश्लेषण करना विशेषीकृत पत्रकारिता है।

17. वैकल्पिक पत्रकारिता किसे कहते हैं ?

मुख्य धारा के मीडिया के विपरीत जो मीडिया स्थापित व्यवस्था के विकल्प को सामने लाकर उसके अनुकूल सोच को अभिव्यक्त करता है उसे वैकल्पिक पत्रकारिता कहा जाता है। आम तौर पर इस तरह के मीडिया को सरकार और बड़ीपूँजी का समर्थन प्राप्त नहीं होता और न ही उसे बड़ी कंपनियों के विज्ञापन मिलते हैं।

18. विशेषीकृत पत्रकारिता के प्रमुख क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।

  • संसदीय पत्रकारिता
  • न्यायालय पत्रकारिता
  • आर्थिक पत्रकारिता
  • खेल पत्रकारिता
  • विज्ञान और विकास पत्रकारिता
  • अपराध पत्रकारिता
  • फैशन और फिल्म पत्रकारिता

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न:

1. पत्रकारिता के विकास में कौन-सा मूल भाव सक्रिय रहता है?

2. कोई घटना समाचार कैसे बनती है? सूचनाओं का संकलन, संपादन कर पाठकों तक पहुँचाने की क्रिया को क्या कहते हैं?

3. सम्पादकीय में सम्पादक का नाम क्यों नहीं लिखा जाता?

4. निम्न के बारे में लिखिए-

(क) डेड लाइन

(ख) फ्लैश ब्रेकिंग न्यूज

(ग) गाइड लाइन

(घ) लीड

विभिन्न माध्यमों के लिए लेखन

प्रिंट माध्यम (मुद्रित माध्यम)

1. प्रिंट मीडिया से क्या आशय है ?

छपाई वाले संचार माध्यम को प्रिंट मीडिया कहते हैं। इसे मुद्रण-माध्यम भी कहा जाता है। समाचार-पत्र पत्रिकाएँ, पुस्तकें आदि इसके प्रमुख रूप हैं।

2. जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम कौन-सा है ?

जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम प्रिंट माध्यम है।

3. आधुनिक छापाखाने का आविष्कार किसने किया ?

आधुनिक छापाखाने का आविष्कार जर्मनी के गुटेनबर्ग ने किया।

4. भारत में पहला छापाखाना कब और कहाँ पर खुला था ?

भारत में पहला छापाखाना सन १७७६ में गोवा में खुला, इसे ईसाई मिशनरियों ने धर्म-प्रचार की पुस्तकें छापने के लिए खोला था।

5. जनसंचार के मुद्रित माध्यम कौन-कौन से हैं ?

मुद्रित माध्यमों के अन्तर्गत अखबार, पत्रिकाएँ पुस्तके आदि आती हैं।

6. मुद्रित माध्यम की विशेषताएँ लिखिए।

  • छपे हुए शब्दों में स्थायित्व होता है, इन्हें सुविधानुसार किसी भी प्रकार से पढ़ा जा सकता है।
  • यह माध्यम लिखित भाषा का विस्तार है।
  • यह चिंतन, विचार-विश्लेषण का माध्यम है।

7. मुद्रित माध्यम की सीमाएँ (दोष) लिखिए।

  • निरक्षरों के लिए मुद्रित माध्यम किसी काम के नहीं होते।
  • ये तुरंत घटी घटनाओं को संचालित नहीं कर सकते।
  • इसमें स्पेस तथा शब्द सीमा का ध्यान रखना पड़ता है।
  • इसमें एक बार समाचार छप जाने के बाद अशुद्धि-सुधार नहीं किया जा सकता।

8. मुद्रित माध्यमों के लेखन के लिए लिखते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

  • भाषागत शुद्धता का ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • प्रचलित भाषा का प्रयोग किया जाए।
  • समय, शब्द व स्थान की सीमा का ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • लेखन में तारतम्यता एवं सहज प्रवाह होना चाहिए।

रेडियो (आकाशवाणी)

1. इलैक्ट्रानिक माध्यम से क्या तात्पर्य है ?

जिस जन संचार में इलैकट्रानिक उपकरणों का सहारा लिया जाता है इलैक्ट्रानिक माध्यम कहते हैं। रेडियो, दूरदर्शन, इंटरनेट प्रमुख इलैक्ट्रानिक माध्यम हैं।

2. ऑल इंडिया रेडियो की विधिवत स्थापना कब हुई ?

सन् १९३६ में

3. एफ़.एम. रेडियो की शुरुआत कब से हुई ?

एफ़.एम. (फ़िक्वेंसी माड्युलेशन) रेडियो की शुरुआत सन् १९९३ से हुई।

4. रेडियो किस प्रकार का माध्यम है ?

रेडियो एक इलैक्ट्रोनिक श्रव्य माध्यम है। इसमें शब्द एवं आवाज का महत्त्व होता है। यह एक रेखीय माध्यम है।

5. रेडियो समाचार किस शैली पर आधारित होते हैं ?

रेडियो समाचार की संरचना उल्टापिरामिड शैली पर आधारित होती है।

6. उल्टा पिरामिड शैली क्या है ? यह कितने भागों में बँटी होती है ?

जिसमें तथ्यों को महत्त्व के क्रम से प्रस्तुत किया जाता है, सर्वप्रथम सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण तथ्य को तथा उसके उपरांत महत्त्व की दृष्टि से घटते क्रम में तथ्यों को रखा जाता है उसे उल्टा पिरामिड शैली कहते हैं। उल्टापिरामिड शैली में समाचार को तीन भागों में बाँटा जाता है- इंट्रो, बॉडी और समापन।

7. रेडियो समाचार-लेखन के लिए किन-किन बुनियादी बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए ?

  • समाचार वाचन के लिए तैयार की गई कापी साफ़-सुथरी ओ टाइप्ड कॉपी हो।
  • कॉपी को ट्रिपल स्पेस में टाइप किया जाना चाहिए।
  • पर्याप्त हाशिया छोड़ा जाना चाहिए।
  • अंकों को लिखने में सावधानी रखनी चाहिए।
  • संक्षिप्ताक्षरों के प्रयोग से बचा जाना चाहिए।

टेलीविजन (दूरदर्शन):

1. दूरदर्शन जनसंचार का किस प्रकार का माध्यम है ?

दूरदर्शन जनसंचार का सबसे लोकप्रिय व सशक्त माध्यम है। इसमें ध्वनियों के साथ-साथ दृश्यों का भी समावेश होता है। इसके लिए समाचार लिखते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि शब्द व पर्दे पर दिखने वाले दृश्य में समानता हो।

2. भारत में टेलीविजन का आरंभ और विकास किस प्रकार हुआ ?

भारत में टेलीविजन का प्रारंभ १७ सितंबर १९७९ को हुआ। यूनेस्को की एक शैक्षिक परियोजना के अन्तर्गत दिल्ली के आसपास के एक गाँव में दो टी.वी. सैट लगाए गए, जिन्हें २०० लोगों ने देखा। १९६७ के बाद विधिवत टीवी सेवा आरंभ हुई। १९७६ में दूरदर्शन नामक निकाय की स्थापना हुई।

3. टी०वी० खबरों के विभिन्न चरणों को लिखिए।

दूरदर्शन मे कोई भी सूचना निम्न चरणों या सोपानों को पार कर दर्शकों तक पहुँचती है।

(1) फ़्लैश या ब्रेकिंग न्यूज (समाचार को कम-से-कम शब्दों में दर्शकों तक तत्काल पहुँचाना)

(2) ड्राई एंकर (एंकर द्वारा शब्दों में खबर के विषय में बताया जाता है)

(3) फ़ोन इन (एंकर रिपोर्टर से फ़ोन पर बात कर दर्शकों तक सूचनाएँ पहुँचाता है)

(4) एंकर-विजुअल (समाचार के साथ-साथ संबंधित दृश्यों को दिखाया जाना)

(5) एंकर-बाइट (एंकर का प्रत्यक्षदर्शी या संबंधित व्यक्ति के कथन या बातचीत द्वारा प्रामाणिक खबर प्रस्तुत करना)

(6) लाइव (घटनास्थल से खबर का सीधा प्रसारण)

(7) एंकर-पैकेज (इसमें एंकर द्वारा प्रस्तुत सूचनाएँ; संबंधित घटना के दृश्य, बाइट, ग्राफ़िक्स आदि द्वारा व्यवस्थित ढंग से दिखाई जाती हैं)

इंटरनेट

1. इंटरनेट क्या है ? इसके गुण-दोषों पर प्रकाश डालिए।

इंटरनेट विश्वव्यापी अंतर्जाल है, यह जनसंचार का सबसे नवीन व लोकप्रिय माध्यम है। इसमें जनसंचार के सभी माध्यमों के गुण समाहित हैं। यह जहाँ सूचना, मनोरंजन, ज्ञान और व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक संवादों के आदान-प्रदान के लिए श्रेष्ठ माध्यम है, वहीं अश्लीलता, दुष्प्रचारव गंदगी फ़ैलाने का भी जरिया है।

2. इंटरनेट पत्रकारिता क्या है ?

इंटरनेट (विश्व्यापी अंतर्जाल) पर समाचारों का प्रकाशन या आदान-प्रदान इंटरनेट पत्रकारिता कहलाता है। इंटरनेट पत्रकारिता दो रूपों में होती है। प्रथम- समाचार संप्रेषण के लिए नेट का प्रयोग करना। दूसरा- रिपोर्टर अपने समाचार को ई-मेल द्वारा अन्यत्र भेजने व समाचार को संकलित करने तथा उसकी सत्यता, विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए करता है।

3. इंटरनेट पत्रकारिता को और किन-किन नामों से जाना जाता है ?

ऑनलाइन पत्रकारिता, साइबरपत्रकारिता, वेब पत्रकारिता आदि नामों से।

4. विश्व-स्तर पर इंटरनेट पत्रकारिता का विकास किन-किन चरणों में हुआ ?

विश्व-स्तर पर इंटरनेट पत्रकारिता का विकास निम्नलिखित चरणों में हुआ

  • प्रथम चरण ——- १९८२ से १९९२
  • द्वितीय चरण ——- १९९३ से २००१
  • तृतीय चरण ——- २००२ से अब तक

5. भारत में इंटरनेट पत्रकारिता का प्रारम्भ कब से हुआ ?

पहला चरण १९९३ से तथा दूसरा चरण २००३ से शुरू माना जाता है। भारत में सच्चे अर्थों में वेब पत्रकारिता करने वाली साइटें ‘रीडिफ़ डॉट कॉम’, ‘इंडियाइंफ़ोलाइन’ व ‘सीफ़ी’ हैं। रीडिफ को भारत की पहली साइट कहा जाता है।

6. वेबसाइट पर विशुद्धपत्रकारिता शुरू करने का श्रेय किसको जाता है ?

‘तहलका डॉटकॉम’

7. भारत में सच्चे अर्थों में वेब पत्रकारिता करने वाली साइटों के नाम लिखिए।

‘रीडिफ़ डॉट कॉम’, ‘इंडियाइंफ़ोलाइन’ व ‘सीफ़ी’

8. भारत में कौन-कौन से समाचार-पत्र इंटरनेट पर उपलब्ध हैं ?

टाइम्स आफ़ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रैस, हिंदू, ट्रिब्यून आदि।

9. भारत की कौन-सी नेट-साइट भुगतान देकर देखी जा सकती है ?

‘इंडिया टुडे’

10. भारत की पहली साइट कौन-सी है , जो इंटरनेट पर पत्रकारिता कर रही हैं ?

रीडिफ

11. सिर्फ़ नेट पर उपलब्ध अखबार का नाम लिखिए।

“प्रभा साक्षी” नाम का अखबार प्रिंट रूप में न होकर सिर्फ़ नेट पर उपलब्ध है।

12. पत्रकारिता के लिहाज से हिंदी की सर्वश्रेष्ठ साइट कौन-सी है ?

पत्रकारिता के लिहाज से हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ साइट बीबीसी की हैं, जो इंटरनेट के मानदंडों के अनुसार चल रही है।

13. हिंदी वेब जगत में कौन-कौनसी साहित्यिक पत्रिकाएँ चल रही हैं ?

हिंदी वेब जगत में ‘अनुभूति’, अभिव्यक्ति, हिंदी नेस्ट, सराय आदि साहित्यिक पत्रिकाएँ चल रही हैं।

14. हिंदी वेब जगत की सबसे बढ़ी समस्या क्या है ?

हिन्दी वेब जगत की सबसे बड़ी समस्या मानक की-बोर्ड तथा फोंट की है। डायनमिक फोंट के अभाव के कारण हिन्दी की ज्यादातर साइटें खुलती ही नहीं हैं।

अभ्यासार्थ प्रश्नः

1. भारत में पहला छापाखान किस उद्देश्य से खोला गया?

2. गुटेनबर्ग को किस क्षेत्र में योगदान के लिए याद किया जाता है?

3. रेडियो समाचर किस शैली में लिखे जाते हैं?

4. रेडियो तथा टेलीविजन माध्यमों में मुख्य अंतर क्या है?

5. एंकर बाईट क्या है?

6. समाचार को संकलित करने वाला व्यक्ति क्या कहलाता है?

7. नेट साउंड किसे कहते हैं?

8. ब्रेकिंग न्यूज से आप क्या समझते हैं?

पत्रकारीय लेखन के विभिन्न रूप और लेखन प्रक्रिया

1. पत्रकारीय लेखन क्या है ?

समाचार माध्यमों मे काम करने वाले पत्रकार अपने पाठकों तथा श्रोताओं तक सूचनाएँ पहुँचाने के लिए लेखन के विभिन्न रूपों का इस्तेमाल करते हैं, इसे ही पत्रकारीय लेखन कहते हैं। पत्रकारीय लेखन का संबंध समसामयिक विषयों, विचारों व घटनाओं से है। पत्रकार को लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए वह सामान्य जनता के लिए लिख रहा है, इसलिए उसकी भाषा सरल व रोचक होनी चाहिए। वाक्य छोटे व सहज हों। कठिन भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। भाषा को प्रभावी बनाने के लिए अनावश्यक विशेषणों, जार्गन्स (अप्रचलित शब्दावली) और क्लीशे (पिष्टोक्ति , दोहराव) का प्रयोग नहीं होना चहिए।

2. पत्रकारीय लेखन के अंतर्गत क्या-क्या आता है ?

पत्रकरिता या पत्रकारीय लेखन के अन्तर्गत समपादकीय, समाचार, आलेख, रिपोर्ट, फीचर, स्तम्भ तथा कार्टून आदि आते हैं।

3. पत्रकारीय लेखन का मुख्य उद्देश्य क्या होता है ?

पत्रकारीय लेखन का प्रमुख उद्देश्य है- सूचना देना, शिक्षित करना तथा मनोरंजन करना आदि होता है।

4. पत्रकारीय लेखन के प्रकार लिखए।

पत्रकारीय लेखन के कई प्रकार हैं यथा- ‘खोजपरक पत्रकारिता’, वॉचडॉग पत्रकारिता और एड्वोकैसी पत्रकारिता आदि।

5. पत्रकार कितने प्रकार के होते हैं ?

पत्रकार तीन प्रकार के होते हैं-

  • पूर्ण कालिक
  • अंशकालिक (स्ट्रिंगर)
  • फ्रीलांसर या स्वतंत्र पत्रकार

6. समाचार किस शैली में लिखे जाते हैं ?

समाचार उलटा पिरामिड शैली में लिखे जाते हैं, यह समाचार लेखन की सबसे उपयोगी और लोकप्रिय शैली है। इस शैली का विकास अमेरिका में गृह युद्ध के दौरान हुआ। इसमें महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन पहले प्रस्तुत किया जाता है, उसके बाद महत्त्व की दृष्टि से घटते क्रम में घटनाओं को प्रस्तुत कर समाचार का अंत किया जाता है। समाचार में इंट्रो, बॉडी और समापन के क्रम में घटनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।

7. समाचार के छह ककार कौन-कौन से हैं ?

समाचार लिखते समय मुख्य रूप से छह प्रश्नों- क्या , कौन , कहाँ , कब , क्यों और कैसे का उत्तर देने की कोशिश की जाती है। इन्हें समाचार के छह ककार कहा जाता है। प्रथम चार प्रश्नों के उत्तर इंट्रो में तथा अन्य दो के उत्तर समापन से पूर्व बॉडी वाले भाग में दिए जाते हैं।

8. फ़ीचर क्या है ?

फ़ीचर एक प्रकार का सुव्यवस्थित, सृजनात्मक और आत्मनिष्ठ लेखन है।

9. फ़ीचर लेखन का क्या उद्देश्य होता है ?

फ़ीचर का उद्देश्य मुख्य रूप से पाठकों को सूचना देना, शिक्षित करना तथा उनका मनोरंजन करना होता है।

10. फ़ीचर और समाचार में क्या अंतर है ?

समाचार में रिपोर्टर को अपने विचारों को डालने की स्वतंत्रता नहीं होती, जबकि फ़ीचर में लेखक को अपनी राय, दृष्टिकोण और भावनाओं को जाहिर करने का अवसर होता है। समाचार उल्टा पिरामिड शेली में लिखे जाते हैं, जबकि फ़ीचर लेखन की कोई सुनिश्चित शैली नहीं होती। फ़ीचर में समाचारों की तरह शब्दों की सीमा नहीं होती। आमतौर पर फ़ीचर, समाचार रिपोर्ट से बड़े होते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः २५० से २००० शब्दों तक के फ़ीचर छपते हैं।

11. विशेष रिपोर्ट से आप क्या समझते हैं ?

सामान्य समाचारों से अलग वे विशेष समाचार जो गहरी छान-बीन, विश्लेषण और व्याख्या के आधार पर प्रकाशित किए जाते हैं, विशेष रिपोर्ट कहलाते हैं।

12. विशेष रिपोर्ट के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।

(1) खोजी रिपोर्ट: इसमें अनुपल्ब्ध तथ्यों को गहरी छान-बीन कर सार्वजनिक किया जाता है।

(2) इन्डेप्थ रिपोर्ट: सार्वजानिक रूप से प्राप्त तथ्यों की गहरी छान-बीन कर उसके महत्त्वपूर्ण पक्षों को पाठकों के सामने लाया जाता है।

(3) विश्लेषणात्मक रिपोर्ट: इसमें किसी घटना या समस्या का विवरण सूक्ष्मता के साथ विस्तार से दिया जाता है। रिपोर्ट अधिक विस्तृत होने पर कई दिनों तक किस्तों में प्रकाशित की जाती है।

(4) विवरणात्मक रिपोर्ट: इसमें किसी धटना या समस्या को विस्तार एवं बारीकी के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

13. विचारपरक लेखन किसे कहते हैं ?

जिस लेखन में विचार एवं चिंतन की प्रधानता होती है, उसे विचार परक लेखन कहा जाता है। समाचार-पत्रों में समाचार एवं फ़ीचर के अतिरित संपादकीय, लेख, पत्र, टिप्पणी, वरिष्ठ पत्रकारों व विशेषज्ञों के स्तंभ छपते हैं। ये सभी विचारपरक लेखन के अंतर्गत आते हैं।

14. संपादकीय से क्या अभिप्राय है ?

संपादक द्वारा किसी प्रमुख घटना या समस्या पर लिखे गए विचारात्मक लेख को, जिससे संबंधित समाचार पत्र की राय भी कहा जाता है, संपादकीय कहते हैं। संपादकीय किसी एक व्यक्ति का विचार या राय न होकर समग्र पत्र-समूह की राय होता है, इसलिए संपादकीय में संपादक अथवा लेखक का नाम नहीं लिखा जाता।

15. स्तंभलेखन से क्या तात्पर्य है ?

यह एक प्रकार का विचारात्मक लेखन है। कुछ महत्त्वपूर्ण लेखक अपने खास वैचारिक रुझान एवं लेखन शैली के लिए जाने जाते हैं। ऐसे लेखकों की लोकप्रियता को देखकर समाचरपत्र उन्हें अपने पत्र में नियमित स्तंभ-लेखन की जिम्मेदारी प्रदान करते हैं। इस प्रकार किसी समाचार-पत्र में किसी ऐसे लेखक द्वारा किया गया विशिष्ट एवं नियमित लेखन जो अपनी विशिष्ट शैली एवं वैचारिक रुझान के कारण समाज में ख्याति-प्राप्त हो, स्तंभ लेखन कहा जाता है।

16. संपादक के नाम पत्र से आप क्या समझते हैं ?

समाचार पत्रों में संपादकीय पृष्ठ पर तथा पत्रिकाओं की शुरुआत में संपादक के नाम आए पत्र प्रकाशित किए जाते हैं। यह प्रत्येक समाचारपत्र का नियमित स्तंभ होता है। इसके माध्यम से समाचार-पत्र अपने पाठकों को जनसमस्याओं तथा मुद्दों पर अपने विचार एवम् राय व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।

17. साक्षात्कार/इंटरव्यू से क्या अभिप्राय है ?

किसी पत्रकार के द्वारा अपने समाचारपत्र में प्रकाशित करने के लिए, किसी व्यक्ति विशेष से उसके विषय में अथवा किसी विषय या मुद्दे पर किया गया प्रश्नोत्तरात्मक संवाद साक्षात्कार कहलाता है।

अन्य महत्त्वपूर्णं प्रश्नः

1. सामान्य लेखन तथा पत्रकारीय लेखन में क्या अंतर है?

2. पत्रकारीय लेखन के उद्देश्य लिखिए।

3. पत्रकार कितने प्रकार के होते हैं?

4. उल्टा पिरामिड शैली का विकास कब और क्यों हुआ?

5. समाचार के प्रकारों के नाम लिखिए।

6. बाड़ी क्या है?

7. फ़ीचर किस शैली में लिखा जाता है?

8. फ़ीचर व समाचार में क्या अंतर है?

9. विशेष रिपोर्ट से आप क्या समझते हैं?

10. विशेष रिपोर्ट के भेद लिखिए।

11. इन्डेप्थ रिपोर्ट किसे कहते हैं?

12. विचारपरक लेखन क्या है तथा उसके अन्तर्गत किस प्रकार के लेख आते हैं?

13. स्वतंत्र पत्रकार किसे कहते है?

14. पूर्णकालिक पत्रकार से क्या अभिप्राय है?

15. अंशकालिक पत्रकार क्या होता है?

विशेष लेखन: स्वरूप और प्रकार

1. विशेष लेखन किसे कहते हैं ?

विशेष लेखन किसी खास विषय पर सामान्य लेखन से हट कर किया गया लेखन है; जिसमें विषय से संबंधित विस्तृत सूचनाएँ प्रदान की जाती हैं।

2. डेस्क क्या है ?

समाचारपत्र, पत्रिकाओं, टीवी और रेडियो चैनलों में अलग-अलग विषयों पर विशेष लेखन के लिए निर्धारित स्थल को डेस्क कहते हैं और उस विशेष डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों का भी अलग समूह होता है। यथा-व्यापार तथा कारोबार के लिए अलग तथा खेल की खबरों के लिए अलग डेस्क निर्धारित होता है।

3. बीट से क्या तात्पर्य है ?

विभिन्न विषयों से जुड़े समाचारों के लिए संवाददाताओं के बीच काम का विभाजन आम तौर पर उनकी दिलचस्पी और ज्ञान को ध्यान में रख कर किया जाता है। मीडिया की भाषा में इसे बीट कहते हैं।

4. बीट रिपोर्टिंग तथा विशेषीकृत रिपोर्टिंग में क्या अन्तर है ?

बीट रिपोर्टिग के लिए संवाददाता में उस क्षेत्र के बारे में जानकारी व दिलचस्पी का होना पर्याप्त है, साथ ही उसे आम तौर पर अपनी बीट से जुड़ी सामान्य खबरें ही लिखनी होती हैं। किन्तु विशेषीकृत रिपोर्टिंग में सामान्य समाचारों से आगे बढ़कर संबंधित विशेष क्षेत्र या विषय से जुड़ी घटनाओं, समस्याओं और मुद्दों का बारीकी से विश्लेषण कर प्रस्तुतीकरण किया जाता है। बीट कवर करने वाले रिपोर्टर को संवाददाता तथा विशेषीकृत रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर को विशेष संवाददाता कहा जाता है।

5. विशेष लेखन की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

विशेष लेखन की भाषा-शैली सामान्य लेखन से अलग होती है। इसमें संवाददाता को संबंधित विषय की तकनीकी शब्दावली का जान होना आवश्यक होता है, साथ ही यह भी आवश्यक होता है कि वह पाठकों को उस शब्दावली से परिचित कराए जिससे पाठक रिपोर्ट को समझ सकें। विशेष लेखन की कोई निश्चित शैली नहीं होती।

6. विशेष लेखन के क्षेत्र कौन-कौन से हो सकते हैं ?

विशेष लेखन के अनेक क्षेत्र होते हैं, यथा- अर्थ-व्यापार, खेल, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, कृषि, विदेश, रक्षा, पर्यावरण शिक्षा, स्वास्थ्य, फ़िल्म-मनोरंजन, अपराध, कानून व सामाजिक मुद्दे आदि।

अभ्यासार्थ महत्त्वपूर्ण प्रश्न:

1. किसी खास विषय पर किए गए लेखन को क्या कहते हैं?

2. विशेष लेखन के क्षेत्र लिखिए।

3. पत्रकारीय भाषा में लेखन के लिए निर्धारित स्थल को क्या कहते है?

4. बीट से आप क्या समझते हैं?

5. बीट रिपोर्टिग क्या है?

6. बीट रिपोर्टिंग तथा विशेषीकृत रिपोर्टिंग में क्या अंतर है?

7. विशेष संवाददाता किसे कहते हैं?

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्न एवं अन्य महत्त्वपूर्ण पृष्ठव्य प्रश्नों का कोश:

1. प्रिंट माध्यम किसे कहते हैं?

2. जनसंचार के प्रचलित माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम क्या है?

3. किन्हीं दो मुद्रित माध्यमों के नाम लिखिए।

4. छापाखाने के आविष्कार का श्रेय किसको जाता है?

5. हिंदी का पहला समाचार-पत्र कब, कहाँ से किसके द्वारा प्रकाशित किया गया?

6. हिंदी में प्रकाशित होने वाले दो दैनिक समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं के नाम लिखिए।

7. रेडियो की अपेक्षा टीवी समाचारों की लोकप्रियता के दो कारण लिखिए।

8. पत्रकारीय लेखन तथा साहित्यिक सृजनात्मक लेखन का अंतर बताइए।

9. पत्रकारिता का मूलतत्व क्या है?

10. स्तंभलेखन से क्या तात्पर्य है?

11. पीत पत्रकारिता किसे कहते हैं?

12. खोजी पत्रकारिता का आशय स्पष्ट कीजिए।

13. समाचार शब्द को परिभाषित कीजिए।

14. उल्टा पिरामिड शैली क्या हैं?

15. समाचार लेखन में छह कारको का क्या महत्त्व है?

16. मुद्रित माध्यमों की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

17. डेड लाइन क्या है?

18. रेडियो नाटक से आप क्या समझते हैं?

19. रेडियो समाचार की भाषा की दो विशेषताएँ लिखिए।

20. एंकर बाईट किसे कहते हैं?

21. टेलीविजन समाचारों में एंकर बाईट क्यों जरूरी है?

22. मुद्रित माध्यम को स्थायी माध्यम क्यों कहा जाता है?

23. किन्हीं दो समाचार चैनलों के नाम लिखिए।

24. इंटरनेट पत्रकारिता के लोकप्रिय होने के क्या कारण हैं?

25. भारत के किन्हीं चार समाचार-पत्रों के नाम लिखिए जो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं?

26. पत्रकारिता की भाषा में बीट किसे कहते हैं?

27. विशेष रिपोर्ट के दो प्रकारों का उल्लेख कीजिए।

28. विशेष लेखन के किन्हीं दो प्रकारों का नामोल्लेख कीजिए।

29. विशेष रिपोर्ट के लेखन में किन बातों पर अधिक बल दिया जाता है?

30. बीट रिपोर्टर किसे कहते हैं?

31. रिपोर्ट लेखन की भाषा की दो विशेषताएँ लिखिए।

32. संपादकीय के साथ संपादन-लेखक का नाम क्यों नहीं दिया जाता?

33. संपादकीय लेखन क्या होता है?

अथवा

संपादकीय से क्या तात्पर्य है?

34. संपादक के दो प्रमुख उत्तरदायित्वों का उल्लेख कीजिए।

35. ऑप-एड पृष्ठ किसे कहते हैं?

36. न्यूजपेग क्या है?

37. आडिएंस से आप क्या समझते हैं?

38. इलेक्ट्रोनिक मीडिया क्या है?

39. कार्टून कोना क्या है?

40. भारत में नियमित अपडेट साइटों के नाम बताइए।

41. कम्प्यूटर के लोकप्रिय होने का प्रमुख कारण बताइए।

42. विज्ञापन किसे कहते हैं?

43. फीडबैक से क्या अभिप्राय है?

44. जनसंचार से आप क्या समझते हैं?

45. समाचार और फीचर में क्या अंतर है?

(ख) आलेख/रिपोर्ट- निर्धारित अंक:

आलेख

आलेख-लेखन हेतु महत्वपूर्ण बातें:

1. किसी विषय पर सर्वांगपूर्ण जानकारी जो तथ्यात्मक, विश्लेषणात्मक अथवा विचारात्मक हो आलेख कहलाती है।

2. आलेख का आकार संक्षिप्त होता है।

3. इसमें विचारों और तथ्यों की स्पष्टता रहती है, ये विचार क्रमबद्ध रूप में होने चाहिए।

4. विचार या तथ्य की पुनरावृत्ति न हो।

5. आलेख की शैली विवेचन, विश्लेषण अथवा विचार-प्रधान हो सकती है।

6. ज्वलंत मुद्दों, समस्याओं, अवसरों, चरित्र पर आलेख लिखे जा सकते हैं।

7. आलेख गंभीर अध्ययन पर आधारित प्रामाणिक रचना होती है।

नमूना आलेख:

शेर का घर जिमकार्बट नेशनल पार्क-

जंगली जीवों की विभिन्न प्रजातियों को सरंक्षण देने तथा उनकी संख्या को बढाने के उद्देश्य से हिमालय की तराई से लगे उत्तराखंड के पौड़ी और नैनीताल जिले में भारतीय महाद्वीप के पहले राष्ट्रीय अभयारण्य की स्थापना प्रसिद्ध अंगरेजी लेखक जिम काबेंट के नाम पर की गई। जिम काबेंट नेंशनल पार्क नैनीताल से एक सौ पन्द्रह किलोमीटर और दिल्ली से 290 किलोमीटर दूर है। यह अभयारण्य पाँच सौं इक्कीस किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। नवम्बर से जून के बीच यहाँ घूमने-फिरने का सर्वोतम समय है।

यह अभयारण्य चार सौं से ग्यारह सौ मीटर की ऊँचाई पर है। ढिकाला इस पार्क का प्रमुख मैदानी स्थल है और कांडा सबसे ऊँचा स्थान हैं। जंगल, जानवर, पहाड़ और हरी-भरी वादियों के वरदान से जिमकार्बट पार्क दुनिया के अनूठे पार्को में है। रायल बंगाल टाइगर और एशियाई हाथी पसंदीदा घर है। यह एशिया का सबसे पहला संरक्षित जंगल हैं। राम गंगा नदी इसकी जीवन-धारा है। यहाँ एक सौ दस तरह के पेड़-पौधे, पचास तरह के स्तनधारी जीव, पच्चीस प्रजातियों के सरीसृप और छह सौं तरह के रंग-बिरंगे पक्षी हैं। हिमालयन तेंदुआ, हिरन, भालू, जंगली कुत्ते, भेड़िये, बंदर, लंगूर, जंगली भैंसे जैसे जानवरों से यह जंगल आबाद है। हर वर्ष लाखों पर्यटक यहाँ आते हैं। शाल वृक्षों से घिरे लंबे-लंबे वन-पथ और हरे-भरे घास के मैदान इसके प्राकृतिक सौंदर्य में चार चाँद लगा देते हैं।

निम्नलिखित विषयों पर आलेख लिखिए

  • बढ़ती आबादी: देश की बरबादी
  • सांप्रदायिक सद्भावना
  • कर्ज में डूबा किसान
  • आतंकवाद की समस्या
  • डॉक्टर हड़ताल पर, मरीज परेशान
  • वर्तमान परीक्षा-प्रणाली
  • बजट और बचत
  • शक्ति, संयम और साहस
  • रिश्वत का रोग
  • सपना सच हो अपना

रिपोर्ट\प्रतिवेदन

रिपोर्ट/प्रतिवेदन का सामान्य अर्थ: सूचनाओं के तथ्यपरक आदान-प्रदान को रिपोर्ट या रिपोर्टिंग कहते हैं। प्रतिवेदन इसका हिंदी रूपांतरण है। रिपोर्ट किसी संस्था, आयोजन या कार्यक्रम की तथ्यात्मक जानकारी है। बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने अंशधारकों को वार्षिक/अर्द्धवार्षिक प्रगति रिपोर्ट भेजा करती हैं।

रिपोर्ट के गुणः

  • तथ्यों की जानकारी स्पष्ट, सटीक, प्रामाणिक हो।
  • संस्था/विभाग के नाम का उल्लेख हो।
  • अध्यक्ष आदि पदाधिकारियों के नाम।
  • गतिविधियाँ चलानेवालों के नाम।
  • कार्यक्रम का उद्देश्य।
  • आयोजन-स्थल, दिनांक, दिन तथा समय।
  • उपस्थित लोगों की जानकारी।
  • दिए गए भाषणों के प्रमुख अंश।
  • लिये गए निर्णयों की जानकारी।
  • भाषा आलंकारिक या साहित्यिक न होकर सूचनात्मक होनी चाहिए।
  • सूचनाएँ अन्यपुरुष शैली में दी जाती हैं। मैं या हम का प्रयोग नहीं होता।
  • संक्षिप्तता और क्रमिकता रिपोर्ट के गुण हैं।
  • नई बात नए अनुच्छेद से लिखें।
  • प्रतिवेदक या रिपोर्टर के हस्ताक्षर।

निम्नलिखित विषयों पर रिपोर्ट तैयार कीजिए-

1. पूजा-स्थलों पर दर्शनार्थियों की अनियंत्रित भीड़

2. देश की महॅगी होती व्यावसायिक शिक्षा

3. मतदान केन्द्र का दृश्य

4. आए दिन होती सड़क दुर्घटनाएँ

5. आकस्मिक बाढ़ से हुई जनधन की क्षति

फीचर लेखन-निर्धारित अंक: 5

समकालीन घटना तथा किसी भी क्षेत्र विशेष की विशिष्ट जानकारी के सचित्र तथा मोहक विवरण को फीचर कहते हैं। फीचर मनोरंजक ढंग से तथ्यों को प्रस्तुत करने की कला है। वस्तुतः फीचर मनोरंजन की उंगली थाम कर जानकारी परोसता है। इस प्रकार मानवीय रूचि के विषयों के साथ सीमित समाचार जब चटपटा लेख बन जाता है तो वह फीचर कहा जाता है।

अर्थात- “ज्ञान + मनोरंजन = फीचर”।

फीचर में अतीत, वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा होती है। फीचर लेखक पाठक को वर्तमान दशा से जोड़ता है, अतीत में ले जाता है और भविष्य के सपने भी बुनता है। फीचर लेखन की शैली विशिष्ट होती है। शैली की यह भिन्नता ही फीचर को समाचार, आलेख या रिपोर्ट से अलग श्रेणी में ला कर खड़ा करती है।

फीचर लेखन को अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें –

1. समाचार साधारण जनभाषा में प्रस्तुत होता है और फीचर एक विशेष वर्ग व विचारधारा पर केंद्रित रहते हुए विशिष्ट शैली में लिखा जाता है।

2. एक समाचार हर एक पत्र में एक ही स्वरुप में रहता है परन्तु एक ही विषय पर फीचर अलग-अलग पत्रों में अलग-अलग प्रस्तुति लिये होते हैं। फीचर के साथ लेखक का नाम रहता है।

3. फीचर में अतिरिक्त साज-सज्जा, तथ्यों और कल्पना का रोचक मिश्रण रहता है।

4. घटना के परिवेश, विविध प्रतिक्रियाएँ व उनके दूरगामी परिणाम भी फीचर में रहा करते हैं।

5. उद्देश्य की दृष्टि से फीचर तथ्यों की खोज के साथ मार्गदर्शन और मनोरंजन की दुनिया भी प्रस्तुत करता है।

6. फीचर फोटो-प्रस्तुति से अधिक प्रभावशाली बन जाता है।

नमूना फीचर:

पियक्कड़ तोता:

संगत का असर आता है, फिर चाहे वह आदमी हो या तोता। ब्रिटेन में एक तोते को अपने मालिक की संगत में शराब की ऐसी लत लगी कि उसने घर वालों और पड़ोसियों का जीना बेहाल कर दिया। जब तोते को सुधारने के सारे हथकंडे फेल हो गए तो मजबूरन मालिक को ही शराब छोड़नी पड़ी। मार्क बेटोकियो ने अफ्रीकी प्रजाति का तोला मर्लिन पाला मार्क यदा-कदा शराब पी लेते। गिलास में बची शराब मर्लिन चट कर जाता। धीरे-धीरे मर्लिन की तलब बढ़ने लगी। वह वक्त-बेवक्त शराब माँगने लगा।———————

निम्नलिखित विषयों पर फीचर लिखिए:

  • चुनावी वायदे
  • महँगाई के बोझतले मजदूर
  • वाहनों की बढ़ती संख्या
  • वरिष्ठ नागरिकों के प्रति हमारा नजरिया
  • किसान का एक दिन
  • क्रांति के स्वप्न-द्रष्टा अब्दुल कलाम
  • क्रिकेट का नया संस्करण ट्वेंटी-ट्वेंटी
  • बेहतर संसाधन बन सकती है जनसंख्या

जनसंचार माध्यम

1. संचार किसे कहते हैं ?

‘संचार’ शब्द चर् धातु के साथ सम् उपसर्ग जोड़ने से बना है- इसका अर्थ है चलना या एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना संचार संदेशों का आदान-प्रदान है।

सूचनाओं, विचारों और भावनाओं का लिखित, मौखिक या दृश्य-श्रव्य माध्यमों के जरिये सफ़लता पूर्वक आदान-प्रदान करना या एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना संचार है।

2. “संचार अनुभवों की साझेदारी है”- किसने कहा है ?

प्रसिद्ध संचार शास्त्री विल्बर श्रेम ने।

3. संचार माध्यम से आप क्या समझते हैं ?

संचार-प्रक्रिया को संपन्न करने में सहयोगी तरीके तथा उपकरण संचार के माध्यम कहलाते हैं।

4. संचार के मूल तत्व लिखिए।

  • संचारक या स्रोत
  • एन्कोडिंग (कूटीकरण)
  • संदेश (जिसे संचारक प्राप्तकर्ता तक पहुँचाना चाहता है)
  • माध्यम (संदेश को प्राप्तकर्ता तक पहुँचाने वाला माध्यम होता है जैसे- ध्वनि-तरंगें, वायु तरंगें, टेलीफोन, समाचारपत्र, रेडियो, टी वी आदि)
  • प्राप्तकर्ता (डीकोडिंग कर संदेश को प्राप्त केरने वाला)
  • फीडबैक (संचार प्रक्रिया में प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया)
  • शोर (संचार प्रक्रिया में आने वाली बाधा)

5. संचार के प्रमुख प्रकारों का उल्लेख कीजिए:

  • सांकेतिक संचार
  • मौखिक संचार
  • आमौखिक संचार
  • अंतः वैयक्तिक संचार
  • अंतरवैयक्तिक संचार
  • समूह संचार
  • जनसंचार

6. जनसंचार से आप क्या समझतेहैं ?

प्रत्यक्ष संवाद के बजाय किसी तकनीकी या यांत्रिक माध्यम के द्वारा समाज के एक विशाल वर्ग से संवाद कायम करना जनसंचार कहलाता है।

7. जनसंचार के प्रमुख माध्यमों का उल्लेख कीजिए।

अखबार, रेडियों, टीवी, इंटरनेट, सिनेमा आदि।

8. जनसंचार की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

  • इसमें फ़ीडबैक तुरंत प्राप्त नहीं होता।
  • इसके संदेशों की प्रकृति सार्वजनिक होती है।
  • संचारक और प्राप्तकर्ता के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता।
  • जनसंचार के लिए एक औपचारिक संगठन की आवश्यकता होती है।
  • इसमें ढेर सारे द्वारपाल काम करते हैं।

9. जनसंचार के प्रमुख कार्य कौन-कौन से हैं ?

  • सूचना देना
  • शिक्षित करना
  • मनोरंजन करना
  • निगरानी करना
  • एजेंडा तय करना विचार-विमर्श के लिए मंच उपलब्ध करांना

10. लाइव से क्या अभिप्राय है ?

किसी घटना का घटना-स्थल से सीधा प्रसारण लाइव कहलाता हैं।

11. भारत का पहला समाचार वाचक किसे माना जाता है ?

देवर्षि नारद।

12. जनसंचार का सबसे पहला महत्त्वपूर्ण तथा सर्वाधिक विस्तृत माध्यम कौन-सा था ?

समाचार-पत्र और पत्रिका

13. प्रिंट मीडिया के प्रमुख तीन पहलू कौन-कौन से हैं ?

  • समाचारों को संकलित करना
  • संपादन करना
  • मुद्रण तथा प्रसारण

14. समाचारों को संकलित करने का कार्य कौन करता है ?

संवाददाता

15. भारत में पत्रकारिता की शुरुआत कब और किससे हुई ?

भारत में पत्रकारिता की शुरुआत सन १७८० में जेम्स आगस्ट हिकी के बंगाल गजट से हुई जो कलकत्ता से निकला था।

16. हिंदी का पहला साप्ताहिक पत्र किसे माना जाता है ?

हिंदी का पहला साप्ताहिक पत्र ‘उदंत मार्तड’ को माना जाता है जो कलकता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकला था।

17. आजादी से पूर्व कौन-कौन प्रमुख पत्रकार हुए ?

महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रताप नारायण मिश्र, बाल मुकुंद गुप्त आदि हुए।

18. आजादी से पूर्व के प्रमुख समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के नाम लिखिए।

केसरी, हिन्दुस्तान, सरस्वती, हंस, कर्मवीर, आज, प्रताप, प्रदीप, विशाल भारत आदि।

19. आजादी के बाद की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं तथा पत्रकारों के नाम लिखए।

प्रमुख पत्र- नव भारत टाइम्स, जनसत्ता, नई दुनिया, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण आदि।

प्रमुख पत्रिकाएँ- धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, रविवार, इंडिया टुडे, आउट लुक आदि।

प्रमुख पत्रकार- अज्ञेय, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी आदि।

अन्य महत्त्वपूर्णं प्रश्नः

1. जनसंचार और समूह संचार का अंतर स्पष्ट कीजिए?

2. कूटवाचन से आप क्या समझते हैं?

3. कूटीकरण किसे कहते हैं?

4. संचारक की भूमिका पर प्रकाश डालिए।

5. फीडबैक से आप क्या समझते हैं?

6. शोर से क्या तात्पर्य है?

7. औपचारिक संगठन से आप क्या समझते हैं?

8. सनसनीखेज समाचारों से सम्बंधित पत्रकारिता को क्या कहते हैं?

9. कोई घटना समाचार कैसे बनती है?

10. संपादकीय पृष्ठ से आप क्या समझते हैं?

11. मीडिया की भाषा में द्वारपाल किसे कहते हैं?