Archive for the ‘Uncategorized’ Category

नवम्बर 30, 2012

दर्द

गुलाब कभी गुलाब नहीं होता

मार्च 27, 2012

गुलाब कभी गुलाब नहीं होता
गुलाब बनाया जाता है
गुलाब बुलाया जाता है
गुलाब सुंघाया जाता है
गुलाब सुखाया जाता है
फिर पानी में डाल कर गुल-ए-आब बनाया जाता है |

परीक्षा परिणाम

मार्च 27, 2012

कल परीक्षा परिणाम आना है, मुझे लगता है कि कल, पिछले वर्ष कि भांति इस वर्ष भी ३० से ४० प्रतिशत अभिभावक और बच्चे परीक्षा परिणाम प्राप्त करने के लिए नहीं आएँगे | क्योंकि जब से सी सी ई पद्धति आई है बच्चों और अभिभावकों में परीक्षा परिणाम को लेकर कोई रूचि नहीं दिखाई दे रही है | वजह , सबको पता है कि पास तो हो ही जाएँगे, फिर परिणाम लेने जाओ या न जाओ फर्क क्या पड़ेगा? अगली कक्षा में प्रवेश तो हो ही जाना है |

अच्छा लगता है ………

मई 5, 2011

अच्छा लगता है ………
जब कोई हमें अपना कहता है |
जब कोई किसी के साथ होते हुए भी –
हमें पहचान जाता है |
जब कोई रास्ते में जाते हुए –
हमें आवाज लगाकर, हमारा नाम पुकारता है|
जब कोई किसी गिरते हुए को –
अपना समय देकर उठता है |
जब कोई हमें देखकर–
गुनगुनाता है, हमें हंसाने की कोशिश करता है |
जब कोई–
हमारी लिखी कविताओं की प्रशंशा करता है |
जब कोई हमारे किसी पुराने मित्र का–
हमें पता देता है |
जब कोई —
हमें अपने घर बड़े आदर के साथ बुलाता है |
जब कोई —
हमारे साथ खाना खाता है |
जब कोई —
रोने में, हंसाने में, खिलखिलाने में हमारी मदद करता है |
जब कोई किसी दो दिन के मित्र की शादी का —-
इनविटेशन —- देता है |
बड़ा अच्छा लगता है |
इन सब बातों के होने में —-
पर जब ऐसा नहीं होता तब भी बुरा नहीं लगता |
क्योंकि यह दौर ही ऐसा है कि —-
किसी से ज्यादा अपेक्षा नहीं करनी चाहिए |
हर हाल में खुश रहना चाहिए ||
बड़ा अच्छा लगता है —
जब ऐसा होता है |||

रास्ते से जाते हुए पेड़ ने मुझसे कहा …

अप्रैल 27, 2011

रास्ते से जाते हुए पेड़ ने मुझसे कहा …
सुनो |.
यूँ मुझे अनदेखा करके मत जाओ
क्या तुमने मुझे देखा नहीं ?
या मुझे भुला दिया ?
तभी तो मुझसे नजरें मिलने से हिचकते हो
क्योंकि —
तुमने मुझे पहले छांटा ,
फिर धीरे-धीरे काटा ,
उसके बाद प्रकृति के गाल पर मारा चांटा |
शायद तुम भूल गए
मैंने ही तुम्हे छाया दी, फल दिए, पत्ते ,टहनियां , डालियाँ —
और –इंधन दिया |
उसके बदले में तुमने मुझे क्या दिया ?
मेरा जड़ से समूल नास—
और प्रकृति का सत्यानास |
अरे तुम भूल गए तुम जितना हमें मिटाओगे —
दुष्परिनाम ही पाओगे —
आज नहीं तो कल पछताओगे |
जब इस पृथ्वी पर न होगी ऑक्सीजन ,
न पानी , न जीवन में रवानी |
सोचो तब क्या करोगे ?
अरे करोगे क्या बैठ के रोवोगे —-
अपने ही आंसुओं से —
अपने आप को धोवोगे |
एक समय ऐसा भी आएगा
जब तुम्हारी आँखों में आंसू भी नहीं होंगे —
तब तुम्हे मेरी याद आएगी |
लेकिन —
तब तक देर हो चुकी होगी |
तब यह मुहावरा सटीक लगेगा —-
अब पछताए होय क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत ——-

चिलमन

मार्च 14, 2011

क्योंकर हम उनके आगोस में आ जाते हैं –
क्योंकर हम उनको देख पल में मुस्काते हैं |
चिलमन उनके पीछे बदनाम हुए जाते हैं –
क्योंकर फिर भी हम मिल नहीं पते हैं ||

क्योंकर कुछ कहने की हमारी जुर्रत नहीं होती –
क्योंकर हमसे मिलने की उनको फुर्सत नहीं होती |
जिंदगी भर उनकी खातिर बदनाम हुए चिलमन –
क्योंकर उनको हमपर उल्फत नहीं होती ||

उनकी खुशबु

मार्च 11, 2011

१- हाल में ही उनकी खुशबु यहाँ आ गयी –
जिंदगी चैन से थी और चैन पा गयी |
२-गम थे जो वो सारे कहीं खो गए —
लगता है जैसे हम किसी के हो गए |
३- अब तो उनसे मिलने को जी चाहता है —
पास आ जाने को जी चाहता है —
जितने गिले शिकवे थे हमें उनसे ,
वो सारे अब भुलाने को जी चाहता है ||
४-आ रहा है रंग होली का —
कुछ आपस में करने ठिठोली का ,
बनायें घरो में खुशियों के घरोंदे —
मौसम है आँगन में रंगोली का ||
सभी अधिकार कवि के अधीन है ||

जैसल दुनिया गोल है

फ़रवरी 26, 2011

जैसल दुनिया गोल है , जैसे गोला चाक |
ईश्वर सबका एक है , चाहे जैसे तक ||
……………………………….

मार – काट की जिंदगी अच्छी नहीं ऐ दोस्त —
मिटा दो दुश्मनी की दरो – दीवार सभी |
क्या मंदिर , क्या मस्जिद , क्या गुरुद्वारा चर्च ?
सब जगह चलती है एक ही सरकार अभी ||

सच — झूठ

फ़रवरी 26, 2011

सच — झूठ
झूठ न जाने सच को
सच न जाने झूठ
दोनों में अंतर यही
मुट्ठी हल की मूठ
झूठ तो जाने हैं सभी
सच को जाने कौन ?
जानते तो हैं सभी
फिर भी रहते मौन
रंग में डालें भंग सभी
रंग बनाये कौन ?
सभी तमाशाई जो ठहरे
इसीलिए हैं मौन …..

गुलाब चन्द जैसल

ठण्ड से

जनवरी 27, 2011
  • ठण्ड से
  • मंगरू रोया ठण्ड-से
  • बीबी रोई ठण्ड-से
  • बच्चा रोया ठण्ड-से
  • पूरा घर रोया ठण्ड-से…
  • एक-एक कर सारे रोये
  • कई दिनों तक नहीं नहाये
  • कांप-कांप कर —
  • पानी से ही कपडे धोये ..
  • कोई कटे रोज मलाई
  • नहीं किसी के पास रजाई
  • लगी ठण्ड तो भूखे रह गए
  • मिली न उनको कभी दवाई ..
  • रतिया रत में बच्चा जनी
  • हो गई लड़की, नागफनी
  • लड़का होता तो, बच्चा होता–
  • सास-ससुर की भौहें तनी …
  • सुन समाज की सोहना मर गया
  • रतिया का भी जियरा डर गया
  • लड़की थी , सो चल बसी —
  • सारा घर जैसे तर गया …
  • भूखों मरे, सुखों मरे
  • घर में सारे जातां करे
  • एक-एक कर पतन हो गए —
  • घर के सारे रतन खो गए …
  • मंगरू मर गया खेत में जाकर —
  • बीबी मर गयी घर से बाहर
  • बच्चे मर गए कांप-कांप कर
  • नहीं किसी के दंड-से —
  • सारे मर गए ठण्ड-से …
  • छूट गए सब जीवन के घमंड से
  • ठण्ड से